ट्रंप से कैसी मध्यस्थता, क्यों मंजूर?

 

 

(हरीशंकर व्यास)

भारत राष्ट्र-राज्य का यक्ष प्रश्न है कि जम्मू-कश्मीर के इलाके पर कब्जा जमाए पाकिस्तान और चीन को भारत कैसे हटाए या हटवाए? मतलब मेरा मानना है कि भारत के नजरिए से दोनों देश जम्मू-कश्मीर के कब्जाए हिस्से को छोड़ें तभी कश्मीर समस्या का समाधान है। क्या नहीं? मगर भारत में क्या कोई ऐसे सोचता है? भारत का नियंता (आईके गुजराल से ले कर नरेंद्र मोदी तक) ख्याल ही नहीं बनाता कि चीन या पाकिस्तान से कश्मीर के कब्जाए इलाकों को कैसे मुक्त कराएं! भारत के सारे प्रधानमंत्रियों की एनर्जी इतना भर सोचते हुए गुजरी है और गुजर रही है कि जैसे भी हो पाकिस्तान और कश्मीर लेने की न सोचे! वह यथास्थिति मान कश्मीर की और देखना बंद करे। यहीं भारतीय नेताओं के राष्ट्रवाद, भारत सरकार, विदेश मंत्रालय की रीति-नीति का सार है। नरेंद्र मोदी अपने को कितना ही राष्ट्रवादी कहें लेकिन उनकी लाल किले के प्राचीर से कहने की हिम्मत नहीं है कि जब तक पाकिस्तान व चीन से जम्मू-कश्मीर के अपने इलाकों को मुक्त नहीं करा लेंगे तब तक वे चौन से नहीं बैठेंगे।

क्यों? इसलिए कि हिंदू नाम के डीएनए में इतनी हिम्मत होती और भेड़ की जगह शेर का दिल होता तो न हम रूस के भरोसे रहे होते और न अमेरिका के। कथित राष्ट्रवादी हिंदुओं का यह सामान्य ज्ञान भी नहीं होगा कि 1947 से पहले जो जम्मू-कश्मीर था उसका भारत के पास आज सिर्फ 45 प्रतिशत हिस्सा है। जबकि बीस प्रतिशत हिस्सा चीन के पास है और 35 प्रतिशत पाकिस्तान के पास। मैं कभी समझ नहीं पाया और आज भी समझ नहीं पा रहा हूं कि शास्त्री, इंदिरा गांधी से ले कर नरेंद्र मोदी तक किसी प्रधानमंत्री ने क्यों नहीं कभी मुद्दा बनाया कि चीन ने बाले-बाले सीधे या पाकिस्तान के जरिए जम्मू-कश्मीर का हिस्सा कब्जाया है तो उसे छुड़वाना कैसे प्राथमिकता में हो? बुधवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान था कि राष्ट्र के स्वाभिमान का सवाल है और हमें पाक अधिकृत कश्मीर पर भी बात करनी है। बात क्यों भला, सीधे क्यों नहीं कहते कि हम मर मिटेंगे पाकिस्तान का कब्जा खत्म कराने के लिए और साथ में चीन अधिकृत 20 प्रतिशत कश्मीरी इलाके को भी वापिस लेना है! पर ऐसा बोलने की हिम्मत तब बने जब सोचा हो, निश्चय हो!

चीन पर तो मोदी सरकार सोच ही नहीं सकती। सिट्टी-पिट्टी गुम रहती है। हमने मान लिया है कि चीन से कभी लड़ कर या कूटनीति से अपनी जमीन वापिस नहीं ले सकते। चीन सांड है, ड्रेगन है तो भेड़ों का समाज, उसके गड़ेरियों में भला बोलने की भी हिम्मत कैसे होगी? यहीं स्थिति हिसाब से पाकिस्तान के आगे भी है। नरेंद्र मोदी हिंदुओं की वाहवाही के लिए सच्चे-झूठे सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते हैं लेकिन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को मुक्त कराने के लिए जंग का ऐलान तो दूर उसको विश्व राजनीति का नंबर एक भारत मुद्दा बनाने का हल्ला भी नहीं होगा। हमें पाकिस्तान के सिर्फ आंतकी छाया युद्व से निजात चाहिए। वहीं हमारा मुद्दा है वहीं हमारी वैश्विक कूटनीति है।

सोचें, भारत की सरकार ने, भारत के प्रधानमंत्रियों ने कब भारत की जनता को यह राष्ट्रवादी ज्ञान दिया कि अपने जम्मू-कश्मीर का 55 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान और चीन के पास है और जब तक उसे मुक्त नहीं कराएंगे तब तक भारत चौन से नहीं बैठेगा। लेकिन ऐसे सोचें तो कहा जाएगा यह जंगखोरी है। क्या अब लड़ना-भिड़ना! पाकिस्तान-चीन ने कब्जा कर लिया तो भूलो कब्जे को और जो नियंत्रण रेखा है उसे अंतरराष्ट्रीय सीमा मान समझौता करो, झंझट खत्म करो।

यही सवा सौ करोड़ लोगों के देश, राष्ट्र-राज्य की सैनिक-सामरिक-कूटनीतिक-विदेश नीति के समग्र विचार मंथन के मनोविश्व का सार है। कब्जा सच्चा बाकी सब बेकार के डरपोक मनोविज्ञान में भारत ने जम्मू-कश्मीर का 55 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान और चीन का अघोषित तौर पर माना हुआ है। आगरा में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति मुशर्रफ में जो बात हुई थी उसमें समझौते का ड्राफ्ट यहीं बन रहा था कि तुम तुम्हारा कश्मीर संभालो और हम हमारा। और संर्घषविराम की रेखा होगी अंतरराष्ट्रीय सीमा!

यदि वैसा होता या आगे होने वाला है तो मेरी अपनी पुरानी थीसिस है कि हम समझौता करके भले घर में बैठेंगे लेकिन इस्लामाबाद के एक मिशन के पूरे होने के बाद उसके अगले मिशन की शुरुआत होगी। 1947 में जिस धर्म ने अपना अलग पाकिस्तान बनाया, उसने बनते ही अपना अगला मिशन जम्मू-कश्मीर का बना भारत से कश्मीर का बड़ा हिस्सा छीन लिया। उस कब्जे पर भारत ने नियति मान समझौता किया तो वह पाकिस्तानी जीत की मंजूरी हुई या नहीं? 55 प्रतिशत कश्मीर यदि पाकिस्तान, चीन ने खा लिया और भारत ने उसे समझौते के साथ मंजूर किया तो पाकिस्तानी धर्म की पताका बाकी 35 प्रतिशत के लिए क्यों यह हौसला लिए हुए नहीं होगी कि जब भारत पहले कुछ नहीं बिगाड़ सका तो कश्मीर घाटी में तो यों भी उसके लिए लड़ाके है।

जान ले यह सब सोचना पांच-दस साल के परिप्रेक्ष्य में नहीं होता। ऐसे मामले इतिहास की ग्रंथियों, कई पीढ़ियों का द्वंद लिए होते हैं। इसे एक-दो प्रधानमंत्रियों का वक्त मतलब नहीं रखता है। फिर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और लंगूरों की सेना का तात्कालिकता में राजकाज यों भी उस दिशा में ले जा रहा है, जिससे एक धर्म विशेष की वैश्विक नजरें भारत को लड़ाई के मैदान में देखने वाली है। उसमें 45 प्रतिशत जम्मू-कश्मीर इलाके का घाटी क्षेत्र असंख्य चिंगारियां लिए उकसाने वाला होगा।

तभी अमोरिका और डोनाल्ड ट्रंप हमारे लिए उपयोगी है। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप को मध्यस्थ बनने का आग्रह पाकिस्तान और चीन से जम्मू-कश्मीर के कब्जाए इलाके को खाली करवाने की रणनीति, उद्देश्य के विचार में किया है तो हम सबको हौसला बढ़ाना चाहिए। अमेरिका यदि जिद्द करे, डोनाल्ड ट्रंप यदि यरूशलेम को इजराइली राजधानी मानने जैसे हिम्मती फैसले की तरह पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का हिस्सा मानते (घोषित कर) हुए मध्यस्थ का रोल बनाए तो उससे समस्या समाधान (भारत की कसौटी में) संभव बनेगा। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद में खम ठोक यह बयान देना चाहिए कि वे ट्रंप को पंच या मध्यस्थ इसलिए बना रहे है क्योंकि उन्होंने माना है कि जम्मू-कश्मीर के हिस्से पर पाकिस्तान का अनधिकृत कब्जा है। वे उस कब्जे को हटवाने की सहमति के साथ मध्यस्थता करेंगे।

क्या ऐसा कुछ ग्राउंडवर्क प्रधानमंत्री मोदी व विदेश मंत्री जयशंकर ने तैयार किया है? मैं जानता हूं कि ऐसे सोचना और सवाल बूझना बहुत बेतुकापन, हवा हवाई है। भारत में किसकी हिम्मत है जो कब्जाए कश्मीरी इलाके से पाकिस्तान और चीन को हटवाने का ख्याल बनाए। प्रधानमंत्री मोदी का जीवन इतने भर से धन्य है कि इमरान खान को वाशिंगटन में ट्रंप ने वैसे गले नहीं लगाया जैसे वे उनसे गले मिले! अन्यथा यह कहने में क्या हर्ज है कि डोनाल्ड ट्रंप भारत प्रेमी राष्ट्रपति हैं और उनके कारण दुनिया जम्मू-कश्मीर के इलाके पर से पाक और चीन के कब्जे को गलत मानने लगी है। इसलिए वे ट्रंप को पंच बना कर कोशिश कर रहे हैं जो कश्मीर मामले में पंद्रह अगस्त 1974 वाली स्थिति लौटे। पर क्या कभी ऐसे सोचा भी गया? और बतौर भारतीय अपना सवाल है कि क्या ऐसे सोचा जाना चाहिए या नहीं?

(साई फीचर्स)

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