जानिए, हैदराबाद राज्य के भारत में विलय की पूरी कहानी

 

 

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली (साई)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर गुजरात के केवडिया में एक सभा को संबोधित करते हुए हैदराबाद मुक्ति दिवस का जिक्र किया।

पीएम ने कहा कि यह दिन सरदार साहब (सरदार वल्लभभाई पटेल) और भारत की एकता के लिए किए गए उनके प्रयासों का स्वर्णिम पृष्ठ है। पीएम ने कहा कि कल्पना कीजिए अगर सरदार पटेलजी की वह दूरदर्शिता तब ना रहती, तो आज भारत का नक्शा कैसा होता और भारत की समस्याएं कितनी अधिक होतीं। साल 1948 में आज के ही दिन हैदराबाद का भारत में विलय कराया गया था। हालांकि हैदराबाद को भारत में शामिल कराना इतना आसान नहीं था और काफी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। आइए जानते हैं हैदराबाद के भारत में शामिल होने की पूरी कहानी….

हैदराबाद के निजाम विलय न कराने पर अड़े

राष्ट्रीय उत्पादन की दृष्टि से हैदराबाद को देश का सबसे बड़ा राजघराना होने का रुतबा हासिल था और उसका क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी बड़ा था। देश की आजादी के बाद ज्यादातर रजवाड़े भारत में शामिल हो गए लेकिन जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद भारत में शामिल होने को तैयार नहीं थे। ये अलग देश के रूप में मान्यता पाने की कोशिश में थे।

हैदराबाद के निजाम ओसमान अली खान आसिफ ने फैसला किया कि उनका रजवाड़ा न तो पाकिस्तान और न ही भारत में शामिल होगा। भारत छोड़ने के समय अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम को या तो पाकिस्तान या फिर भारत में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। अंग्रेजों ने हैदराबाद को स्वतंत्र राज्य बने रहने का भी प्रस्ताव दिया था। हैदराबाद में निजाम और सेना में वरिष्ठ पदों पर मुस्लिम थे लेकिन वहां की अधिसंख्य आबादी हिंदू (85ः) थी। शुरू में निजाम ने ब्रिटिश सरकार से हैदराबाद को राष्ट्रमंडल देशों के अंर्तगत स्वतंत्र राजतंत्र का दर्जा देने का आग्रह किया। हालांकि ब्रिटिश निजाम के इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुए।

निजाम ने जिन्ना से भी किया था संपर्क

कहा जाता है कि निजाम भारत में हैदराबाद का विलय बिल्कुल नहीं कराना चाहते थे। के एम मुंशी ने अपनी किताब ऐंड ऑफ एन एरा में लिखा है कि निजाम ने मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की थी क्या वह भारत के खिलाफ उनके राज्य का समर्थन करेंगे। दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा बियॉन्ड द लाइंस में जिन्ना को निजाम के प्रस्ताव के आगे की कहानी लिखी है। नैयर ने अपनी किताब में लिखा है कि जिन्ना ने निजाम कासिम के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह मुट्ठीभर एलीट लोगों के लिए पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे।

निजाम ने हैदराबाद को घोषित किया स्वतंत्र

मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एमआईएम) के पास उस वक्त 20 हजार रजाकार थे जो निजाम के लिए काम करते थे और हैदराबाद का विलय पकिस्तान में करवाना चाहते थे या स्वतंत्र रहना। रजाकार एक निजी सेना थी जो निजाम के शासन को बनाए रखने के लिए थी। हैदराबाद के निजाम के ना-नुकुर करने के बाद भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनसे सीधे भारत में विलय का आग्रह किया। लेकिन निजाम ने पटेल के आग्रह को खारिज करते हुए 15 अगस्त 1947 को हैदराबाद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।

माउंटबेटन ने बल प्रयोग से बचने की दी सलाह

भारत के दिल में स्थित हैदराबाद के निजाम के इस कदम से पटेल चौंक गए और उन्होंने उस समय के गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन से संपर्क किया। माउंटबेटन ने पटेल को सलाह दी कि इस चुनौती को भारत बिना बल प्रयोग के निपटे। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू माउंटबेटन की सलाह से सहमत थे और वह भी इस मसले का शांतिपूर्ण समाधान करना चाहते थे। हालांकि पटेल इससे बिल्कुल असहमत थे। उनका कहना था कि हैदराबाद की हिमाकत को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

हैदराबाद के निजाम ने पाकिस्तान से साधा संपर्क

इसके बाद हैदराबाद के निजाम हथियार खरीदने और पाकिस्तान के साथ सहयोग करने की कोशिश में लग गए। सरदार पटेल को जैसे ही इसकी भनक लगी तो उन्होंने कहा कि हैदराबाद भारत के पेट में कैंसर के समान है और इसका समाधान सर्जरी से ही होगा। इस समय तक भारत और हैदाराबाद के बीच बातचीत टूट चुकी थी और भारत ने उसपर हमला करने की तैयारी कर ली थी।

ऑपरेशन पोलो के तहत सैन्य कार्रवाई, 17 सितंबर को कामयाबी

जब भारत के पास कोई और विकल्प नहीं बचा है तो हैदराबाद पर सैन्य कार्रवाई का फैसला किया गया। 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने हैदराबाद पर हमला कर दिया। भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा 17 पोलो के मैदान थे। भारतीय सेना का नेतृत्व मेजर जनरल जेएन चौधरी कर रहे थे। भारतीय सेना को पहले और दूसरे दिन कुछ परेशानी हुई और फिर विरोधी सेना ने हार मान ली। 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद की सेना ने हथियार डाल दिए। पांच दिनों तक चली कार्रवाई में 1373 रजाकार मारे गए थे। हैदराबाद के 807 जवान भी मारे गए। भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए।

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