आखिर अब भी क्यों जारी हैं एसिड अटैक

 

 

(संजय कुंदन)

बिहार में हाल में हुई एसिड अटैक की कई घटनाओं से दिल दहल गया। वहां कहीं छेड़खानी के मामले में तेजाब से हमले किये जा रहे हैं तो कहीं आपसी विवाद में। पिछले दिनों अररिया में कुछ युवकों ने एक युवती के चेहरे पर तेजाब फेंककर जख्मी कर दिया। उससे पहले वैशाली में आपसी विवाद में 14 लोगों पर तेजाब से हमला कर दिया था। इसी साल अप्रैल में भागलपुर में एक लड़की को तेजाब से मनचलों ने नहला दिया था। बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। आश्चर्य है कि इतने नियम-कानून बनने के बाद भी तेजाब फेंकने की घटना रुक नहीं रही। आम तौर पर लड़कियों का चेहरा बर्बाद करने की मंशा से उन पर एसिड अटैक होता है। इसके पीछे यह मानसिकता काम कर रही होती है कि वह लड़की मेरी नहीं हुई तो किसी और की भी न हो। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक सैडिस्ट लोग दूसरों को तकलीफ में देखकर संतुष्ट होते हैं। इनमें सब्र नहीं होता, जिसे डीले ऑफ ग्रैटिफिकेशन कहते हैं।

इन्हें हर चीज उसी वक्त चाहिए होती है और न मिलने पर ये हिंसा करने से भी नहीं हिचकते। इन्हें हिंसा से ही संतुष्टि मिलती है। इन्हें लगता है कि हिंसा करने पर लोग उनसे डरेंगे। ये भावनात्मक रूप से काफी कमजोर होते हैं। जिन देशों में औरत-मर्द के बीच समानता रहती है, वहां ऐसी घटनाएं न के बराबर होती हैं। दुर्भाग्य से भारतीय समाज में आज भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था कायम है। इसके तहत पुरुष की श्रेष्ठता बनी हुई है। पुरुष के अचेतन मन में यह बात बैठी हुई है कि स्त्री उससे कमतर है और उस पर पुरुषों का एक स्वाभाविक अधिकार है। अगर कोई स्त्री किसी पुरुष को नापसंद करती है तो इसे वह सहजता से लेने के बजाय अपने पौरुष के अपमान के रूप में लेता है। इसे वह अपनी हार मानकर बौखला उठता है। इस स्थिति में कुछ पुरुष हताश होकर कुंठित हो आते हैं तो कुछ आपराधिक प्रवृत्ति के लोग एसिड अटैक जैसा अमानवीय कदम उठा लेते हैं।

चिंताजनक बात तो यह है कि सामाजिक बदलाव के बावजूद यह समस्या कम होने के बजाय लगातार बढ़ती जा रही है। जबकि इस संबंध में कानून और सख्त बनाए गए हैं। इस मामले में जागरूकता फैलाने की कोशिशें भी तेज हुई हैं फिर भी तेजाबी हमले कम नहीं हो रहे। एसिड अटैक के मामले में पहले आईपीसी में अलग से कोई प्रावधान नहीं था और आईपीसी की धारा-326 (गंभीर रूप से जख्मी करना) के तहत ही केस दर्ज किया जाता था। दोषी पाए जाने पर 10 साल तक कैद या फिर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान था लेकिन जस्टिस जे. एस. वर्मा कमिशन की सिफारिशों के मद्देनजर वर्ष 2013 में सरकार ने आईपीसी में नए कानूनी प्रावधान किए और इसी के तहत आईपीसी की धारा-326-ए और 326-बी अस्तित्व में आया।

आईपीसी की धारा-326 ए के तहत प्रावधान किया गया है कि अगर कोई शख्स किसी दूसरे पर एसिड से हमला करता है और इस वजह से उस शख्स के शरीर का अंग खराब होता है या शरीर पर जख्म होता है या जलता है या झुलसता है, तो ऐसे शख्स का दोष साबित होने पर कम-से-कम 10 साल कैद और ज्यादा-से-ज्यादा उम्रकैद की सजा दी जा सकती है। अगर कोई शख्स किसी और पर अंग खराब करने या उसे नुकसान पहुंचाने की नीयत से एसिड फेंकने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा-326 बी के तहत केस दर्ज किया जाएगा। इस मामले में दोषी पाए जाने पर कम-से-कम 5 साल और ज्यादा से ज्यादा 7 साल कैद की सजा हो सकती है।

एसिड अटैक को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि वह तेजाब की बिक्री को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाएं। अटैक की शिकार महिला के इलाज और पुनर्वास के लिए 3 लाख रुपये का मुआवजा देने का प्रावधान भी है। कई राज्यों में एसिड अटैक और उससे जुड़ी घटनाओं पर लगाम कसने के लिए राज्य सरकार ने राज्य के सभी जिलों के डीएम को निर्देश जारी किया है कि एसिड रखने और बेचने की प्रक्रिया पर कड़ी नजर रखें। साथ ही एसिड खरीदने वालों के नाम और पते रिकॉर्ड में दर्ज होना आवश्यक है। उस रिपोर्ट में एक व्यक्ति ने कितनी मात्रा में एसिड खरीदा है उसकी भी जानकारी अनिवार्य है। यह तय किया गया है कि हर महीने की सात तारीख को एसडीएम एसिड विक्रेताओं की जांच करेंगे और उसकी रिपोर्ट राज्य के गृह मंत्रालय को सौंपेंगे। एसडीएम द्वारा जांच के दौरान अगर किसी की रिपोर्ट गलत पाई गई तो विक्रेता के स्टॉक को सील कर दिया जाएगा। साथ ही उसे 50,000 रुपये का जुर्माना भी देना पड़ेगा। बिहार में भी निश्चित तौर पर इस तरह की व्यवस्था होगी। फिर भी अगर एसिड अटैक जारी हैं, तो निश्चय ही यह प्रशासन की लापरवाही है।

(साई फीचर्स)

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