दो जर्जर नावों पर हर रोज सवार होती है सैंकड़ों जिंदगियां

 

 

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

बैतूल (साई)। भोपाल के खटलापुरा की तरह जिले के सारणी क्षेत्र में तवा नदी के राजडोह घाट पर भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। यहां जर्जर हो चुकी दो नावों (डोंगे) पर ही नदी पार के आधा दर्जन गांवों के हजारों लोग आवागमन के लिए आश्रित हैं। बड़ों से लेकर बच्चों तक के लिए संपर्क में रहने के लिए यह नावें ही एकमात्र माध्यम हैं।

ग्रामीणों की आवाजाही को आसान बनाने के लिए शासन ने 7 साल पहले पुल बनाया था लेकिन वह पहली बारिश में ही बह गया। इससे ग्रामीण एक बार फिर पहले की तरह नाव के भरोसे हो गए। जिले के वैसे तो कई गांव बाढ़ के दौरान पहुंचविहीन हो जाते हैं लेकिन सारणी क्षेत्र की लोनिया पंचायत के अंतर्गत आने वाले ग्राम लोनिया, बिकलई, राजेगांव, खापा, ब्रह्मणवाड़ा सहित इनके कई ढाने पूरे साल भर टापू बने रहते हैं। इन गांवों का रास्ता 2 तरफ से तवा नदी, 1 तरफ से सतपुड़ा डैम और 1 तरफ से घने जंगल और पहाड़ी रोके हुए हैं।

इन गांवों में लगभग 5 हजार की आबादी रहती है। ग्रामीणों को सारणी या बैतूल जाने के लिए राजडोह घाट से तवा नदी पार कर जाना होता है। इसके अलावा और कोई भी रास्ता नहीं है। यहां तवा नदी की चौड़ाई और गहराई काफी अधिक है और पूरे साल भर इसमें पानी भरा रहता है। ऐसे में आवागमन के लिए यहां मौजूद 2 नावों का ही उन्हें सहारा रहता है। गांव में केवल हाईस्कूल तक पढ़ाई हो पाती है और उसके बाद हायर सेकेंडरी की पढ़ाई के लिए बच्चों को 5-6 किलोमीटर दूर सारणी आना होता है।

इसके अलावा ग्रामीणों को भी रोजमर्रा के सभी कामों के लिए सारणी ही आना होता है। गांव में पदस्थ विभिन्ना विभागों के सरकारी कर्मचारियों को भी गांव तक पहुंचने नाव का ही सहारा लेना होता है। ग्रामीणों से लेकर उनकी मोटर साइकिल और शेष सभी सामान इन नावों के सहारे ही इस पार से उस पार पहुंचाया जाता है। नाव की सुविधा भी केवल दिन में मिल पाती है। रात में नाव नहीं चलती। ऐसे में रात में कोई बीमार हो जाए या किसी गर्भवती को अस्पताल पहुंचाना पड़े तो इन परिस्थितियों में केवल ऊपर वाले का ही ग्रामीणों को सहारा रह जाता है।

सुरक्षा के नहीं कोई इंतजाम

हजारों लोगों की जिंदगी जिन नावों पर निर्भर हैं, उन नावों की हालत बेहद जर्जर हो चुकी है। एक नाव में तो पानी भी भरते रहता है जिसे बाहर फेंकते रहना पड़ता है। नाव तो है, लेकिन सुरक्षा के इंतजाम न तो पार करने वालों के लिए हैं और न ही खुद नाविकों के पास है। नाव पर लाइफ जैकेट या और कोई भी सुरक्षा इंतजाम नहीं है। ऐसे में यदि कोई हादसा हुआ तो बचने की कोई गुंजाईश तक नहीं रहेगी। वर्ष 2012 में आई भारी बाढ़ के दौरान एक नाव यहां बह भी गई थी। हालांकि उस समय किस्मत से कोई जनहानि नहीं हुई थी। बारिश और बाढ़ के दौरान पूरी तरह संपर्कविहीन होने से इन क्षेत्रों में इस बीच बीमारियां भी खूब फैलती है।

पहली ही बारिश में बहे ग्रामीणों के अरमान

ग्रामीणों की इस समस्या को देखते हुए ही यहां पर 2012 में शासन ने 4 करोड़ की लागत का पुल बनाया था। पुल के निर्माण के दौरान ग्रामीणों को उम्मीद थी कि पुल बनते ही उनकी सारी समस्याएं भी खत्म हो जाएगी, लेकिन पहली बारिश में ही उनके सारे अरमान बह गए थे। इस पुल की गुणवत्ता के हाल यह थे कि यह पहली बारिश में ही बह गया। कई सालों तक इंतजार करने के बाद अब 10 करोड़ की लागत का दूसरा पुल यहां बन रहा है। यह पुल 210 मीटर लंबा बन रहा है। संभावना जताई जा रही है कि अगली बारिश के पहले यह पुल बन कर तैयार हो जाएगा।

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