कभी अपने गिरेबां में भी झांक लें सियासतदार!

 

 

(लिमटी खरे)

मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्रियों सहित मंत्रियों को कोसने वाले सियासी बियावान के नुमाईंदों ने क्या कभी अपनी गिरेबान में झांककर देखा है! क्या उन्होंने कभी इस बात पर मनन किया है कि बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक जिस सिवनी के विकास को देखकर आसपास के जिलों के निवासी रश्क करते थे, उस सिवनी को क्या किसी की नज़र लग गयी, या फिर ऐसा क्या हुआ कि बीसवीं सदी के अंतिम दशक से अब तक तीन दशकों में सिवनी में विकास का कलश रीता क्यों है! आखिर क्या वजह थी, किसकी खामोशी थी कि बिना प्रस्ताव के ही सिवनी की लोकसभा का विलोपन कर दिया गया! क्या इन बातों के जवाब हैं किसी नुमाईंदे के पास! अगर हों तो उन्हें सार्वजनिक करने की बजाय सिर्फ एक काम करें कि आईने के सामने खड़े होकर इसका जवाब खुद को दें। जाहिर है आदमी सबसे झूठ बोल सकता है पर अपने आप से वह झूठ कैसे बोल पायेगा!

सिवनी में स्व.सुश्री विमला वर्मा जब तक सक्रिय राजनीति में रहीं तब तक सिवनी में विकास की गागर कभी भी रीति नहीं रही। हर बार उनके प्रयासों से सिवनी को कुछ न कुछ मिलता ही रहा। उनके द्वारा जब से सक्रिय राजनीति से किनारा किया गया उसके बाद से सिवनी को मानो किसी को नज़र ही लग गयी।

एक समय था जब सिवनी में तीन-तीन मंत्री और न जाने कितने निगम, मण्डलों के अध्यक्ष हुआ करते थे। सिवनी के विधायकों का प्रदेश में इतना दबदबा रहता था कि प्रदेश के महत्वपूर्ण विभागों पर सिवनी के विधायक आसीन रहा करते थे। काँग्रेस के अलावा भाजपा के शासनकाल में भी यह परंपरा चलती ही रही।

सिवनी से प्रदेश में मंत्रियों की फेहरिस्त में आखिरी नाम वर्तमान सांसद डॉ.ढाल सिंह बिसेन का रहा है। वे उमा भारती के मुख्यमंत्री रहते हुए मंत्री बने थे। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमत्रंी बनने के बाद सिवनी से मंत्री बनाने का सिलसिला टूटा और लगभग डेढ़ दशक से ज्यादा समय से सिवनी से निगम मण्डल के अध्यक्ष बनाये जाने की परंपरा भी मानो समाप्त हो गयी।

सिवनी का दबदबा प्रदेश में क्यों कम हुआ है इस बात पर सियासत करने वालों को आत्म मंथन करने की आवश्यकता है। भाजपा के शासनकाल में एक बात की चर्चा भोपाल स्तर पर हमेशा होती आयी। अनेक वरिष्ठ नेताओं ने भी भोपाल में इस बात को स्वीाकर किया था कि सिवनी के लिये सौगातें लाने के लिये तो कोई नेता नहीं गया पर एक दूसरे की शिकायतों के लिये अवश्य नेताओं ने दिल्ली भोपाल एक कर दिया। उस दौरान सिवनी से भोपाल जाने वाले नेताओं को देखते ही वरिष्ठ नेता मन ही मन बुदबुदा उठते कि पता नहीं किसकी शिकायत लेकर आये हैं। यह परंपरा सत्ता परिवर्तन के बाद वर्तमान समय में भी जारी है। प्रदेश में काँग्रेस की सरकार बने नौ माह का समय बीत चुका है, इसके बाद भी अब तक काँग्रेस के किसी विधायक या जिला स्तरीय नेता के द्वारा प्रदेश सरकार से सिवनी के लिये किसी तरह की सौगात की माँग शायद ही की गयी हो।

सिवनी के सियासी बियावान में विकास न हो पाने पर दूसरे जिलों के नेताओं पर तोहमत लगाने का आसान काम बहुत ही करीने से किया जाता रहा है। किसी ने सिवनी के सांसद विधायकों से यह पूछने की जहमत नही उठायी कि आखिर दूसरे जिले के सांसद या विधायक इतने प्रभावशाली कैसे हो जाते रहे कि वे अपने क्षेत्र में सौगातों का पिटारा खुलवा लेते! क्या सिवनी के सांसद या विधायक इस तरह का काम नहीं कर सकते!

ज़ाहिर है स्थानीय स्तर पर कोई भी नेता किसी दूसरे नेता को कटघरे में खड़ा करके उस नेता की जवाबदेही को जनता के बीच रखना नहीं चाहता। यह परंपरा आपसी नूरा कुश्ती का नायाब उदाहरण मानी जा सकती है। एक आरोप सियासी बियावान में जमकर लगता आया है कि भाजपा के शासनकाल में काँग्रेस के नेताओं की तो काँग्रेस के शासनकाल में भाजपा के नेताओं की पूछ परख अचानक ही बढ़ जाती है!

सिवनी में न तो उद्योग धंधे हैं, न रोजगार के साधन। स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन जैसे मामलों में जिला पिछड़ा हुआ है। जिले में केंद्र या राज्य सरकारों के द्वारा जो भी काम करवाये जा रहे हैं, उनका श्रेय किसी नेता को इसलिये नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह सब कुछ नीतिगत फैसलों के कारण ही हो रहा है। यह अलहदा बात है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कथित उदासीनता के कारण ये काम भी मंथर गति से ही संचालित हैं।

इस तरह हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश के मार्ग प्रशस्त करेंगे! क्या सिवनी को इन्हीं जर्जर हालातों में छोड़कर आने वाली पीढ़ी का स्वर्णिम भविष्य तैयार करना चाह रहे हैं हम! सिवनी के आसपास के हर जिले में एक मंत्री है। मंत्री के रहने से कम से उस विभाग का जिसका प्रभार उस मंत्री के पास है का कुछ लाभ तो जिले को मिल सकता है।

कुल मिलाकर सिवनी के सियासी बियावान में रहकर जनसेवा का दंभ भरने वाले नेताओं को इस बात पर आत्म अवलोकन अवश्य करना चाहिये कि वे कम से कम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिये किस तरह का सिवनी छोड़कर जाने वाले हैं! हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि जिले के दो सांसद और चारों विधायक सहित काँग्रेस-भाजपा संगठन के नेता अगर मिलकर, एकजुट होकर दलगत भावना से ऊपर उठकर सिवनी के विकास का ताना बाना बुनें तो महज़ एक साल में ही जिले की तस्वीर बदली-बदली नज़र आ सकती है, पर इसके लिये प्रयास ईमानदारी से किये जाने की जरूरत है . . .!

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