छात्रसंघ चुनाव को लेकर असमंजस

 

 

 

 

अब तक नहीं बने नियम

(ब्यूरो कार्यालय)

भोपाल (साई)। प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग के कॉलेजों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों को लेकर अब भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी ने घोषणा की थी कि अकादमिक कैलेंडर के अनुसार छात्रसंघ चुनाव कराए जाएंगे, लेकिन तय समय बीतने के बावजूद अब तक चुनाव होना तो दूर इसके नियम तक नहीं बन सके हैं। वहीं इस मामले में उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव का कहना है कि वे इस मामले में कोई बात नहीं करेंगे।

दरअसल, प्रदेश में सरकार बनाने के पहले कांग्रेस ने अपने वचन पत्र में कहा था कि उच्च शिक्षा विभाग के सभी सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव कराए जाएंगे। यह चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से आयोजित किए जाएंगे। इसके बाद मंत्री जीतू पटवारी ने घोषणा की थी कि सरकार इस साल अपना वचन पत्र निभाते हुए सभी सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में छात्र संघ चुनाव कराएगी। यह चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होंगे।

इसके साथ उन्होंने इसकी समयावधि तय करते हुए कहा था कि छात्र संघ चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होंगे। उच्च शिक्षा विभाग के अकादमिक कैलेंडर के अनुसार सितंबर-अक्टूबर के बीच यह चुनाव हो जाने चाहिए थे, लेकिन अक्टूबर आधा बीतने के बावजूद अब तक चुनाव होना तो दूर नियम ही बनकर तैयार नहीं हुए हैं।

सरकार बच रही चुनाव से  : सूत्रों के मुताबिक भले ही कांग्रेस के वचन पत्र और मंत्री पटवारी ने छात्र संघ चुनाव कराने की बात कही हो, लेकिन इस साल कॉलेजों में छात्र संघ चुनाव से बच रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है चुनाव के दौरान होने वाले विवाद।

सरकार का मानना है कि यदि चुनाव के दौरान कोई बड़ी घटना हो जाती है तो इसका दोष सरकार को ही दिया जाएगा। वहीं यदि कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को एबीवीपी से कम कॉलेजों में जीत हासिल होती है तो इससे भी सरकार की ही किरकिरी होगी। ऐसे में सरकार इस साल छात्रसंघ चुनावों को टालना ही बेहतर समझ रही है।

पिछले साल भी नहीं हुए थे चुनाव : पिछले साल भाजपा सरकार ने भी विधानसभा चुनाव नजदीक होने की वजह से प्रदेश के कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव आयोजित नहीं कराए थे। भाजपा को भी डर था कि एबीवीपी से ज्यादा कॉलेजों में कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई जीत हासिल कर सकता है। जिसका सीधा असर विधानसभा चुनावों पर होगा और भाजपा को नुकसान हो सकता है। इसी वजह से सरकार ने चुनाव टालना ही बेहतर समझा था।

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