पूर्वजों की तीन पीढ़ियों के नाम भी याद नहीं!

 

 

(विवेक सक्सेना)

जब पढ़ता था तब हमारे साथ अनिल बांगा नाम का एक छात्र भी पढ़ता था। एक दिन मैं कुछ दूसरे दोस्तो के साथ उसके घर गया। मेरे साथी ने उनके घर की घंटी बजाई। एक बुजुर्ग बाहर निकले तो साथ के उसके मित्र ने उनसे पूछा- बांगा है? हम लोग आदतन अपने साथियों को उनके सरनेम से बुलाते थे। उस बुजुर्ग ने हमें गौर से देखा और कहने लगे कि इस घर में कई बांगा रहते हैं। सबसे बड़ा बांगा तो मैं हूं। अगर तुम्हें सबसे छोटा बांगा या मेरे बेटे से बात करनी हो तो मैं उसे बुलवा देता हूं।

मेरे साथी ने क्षमा मांगने के अंदाज में कुछ कहा तो उन्होने मुस्कुरा कर देखा और वो अंदर चले गए और उन्होंने हमारे मित्र को बाहर भेज दिया। नामों को लेकर हमारे साथ ऐसा ही कुछ हो जाता है। मुझे आज भी अपनी सोसायटी में रहने वाले अनेक निवासियों के पूरे नाम नहीं पता है। मैं उन्हें शर्माजी, गुप्ताजी, साहनीजी के नाम से जानता हूं। कई बार तो यही लगता है कि हम लोग कितनी सीमित जानकारी रखते हैं व हम बहुत कम लोगों के पूरे नाम जानते हैं।

इसका एक और अहम उदाहरण हाल में तब मिला जबकि मैंने अपने दिवंगत पिताजी का श्राद्ध किया। पूजा कराते हुए पंडितजी ने दिवंगत बुजुर्गाे को तर्पण के लिए उनके नाम पूछने शुरू कर दिए। सच कहूं तो अपने बाबाजी के नाम के अलावा उनसे पहले के बुजुर्गाे के नाम मुझे पता ही नहीं थे। मुझे तो अपनी दादी, ताऊजी व ताईजी के नाम भी याद नहीं थे। वह तो संयोग था कि मेरे बड़े भाई भी पूजा में मौजूद थे और उन्होंने लोगों के नाम लेकर तर्पण में मदद की। नाना, नानी व मामा आदि के नाम तो मुझे बिलकुल पता ही नहीं थे।

खैर इसके बाद बड़े भाई ने मुझसे कागज मांग कर उस पर परिवार का वृक्ष बनाते हुए तमाम दिवंगत बुजुर्गाे के नाम लिख डाले ताकि भविष्य में खासतौर से अगले साल तर्पण के समय मैं उनका उपयोग कर सकूं। हालांकि मुझे खुद पर शर्म भी आई और बेहद अजीब भी लगा कि मुझे अपनी तीसरी पीढ़ी के पितामह लोगों का नाम तक याद नहीं है। अतः मेरी इतिहास, भूगोल की जानकारी पूरी तरह से व्यर्थ है।

इससे पहले जब से अपने ससुराल के संबंधियो की अस्थियां प्रवाहित करने के लिए हरिद्वार गया तो पूछते हुए हम उनके खानदानी पुरोहित के पास पहुंचे। वह एक युवक था व उसने उनके पुरखों तक की जानकारी हमें दे दी।

मेरे बड़े साले ने बताया कि वे लोग बटाला के शर्मा थे और उस पुरोहित ने अपने तमाम रिकार्ड छान मारे जोकि कागजो के बहुत लंबे व मौटे रोल में लिखे हुए थे। उसमें उसने लंबी चौड़ी छानबीन करके बताया कि हमसे पहले वहां इस परिवार का कौन-कौन सा सदस्य कब किस सिलसिले में आया था। मुझे उसकी यह बात बहुत अच्छी लगी कि उसने अपनी मेहनत से एक समानांतर पारिवारिक गूगल तैयार कर रखा था।

उसने हमारे बारे में भी जानकारी उसमें भर दी कि मेरा साला सीमा सुरक्षा बल में डीआईजी था व मैंने उस परिवार की इकलौती बेटी से शादी की थी व मैं पंडारा रोड़ में रहता था। उसने बताया कि उसके जैसे तमाम पुरोहित सदियो से अपने यजमानों के परिवारों का रिकार्ड तैयार करके संजो कर रख रहे हैं। जब आप हरिद्वार पहुंचते हैं तो वहां यह काम करने वाले पुरोहित सबसे पहले यह पूछते है कि आप कहां के रहने वाले हैं। उन्होंने इस देश को भौगोलिक व जातीय आधार में बांटते हुए सबका रिकार्ड तैयार कर रखा है।

खैर मेरे बाबा तो नास्तिक थे व मुझे यह नहीं पता कि उनकी मृत्यु के बाद मेरे पिताजी उनके अंतिम संस्कार से संबंधित कर्म पूरे करने के लिए हरिद्वार गए थे या नहीं। खैर वहां की बहियो में अपना नाम व पता दर्ज करवाने के बाद हम लोग वापस लौट आए। हरिद्वार में खासियत यह है कि आपके खानदान का पुरोहित ही आपके कर्मकांड करवाता है। वह आपको घर में बैठा कर आपको पुराना रिकार्ड दिखाते हुए आपको संतुष्ट करता है कि आप सही जगह पर आए हुए हैं। वह उसमें अपने आने की वजह व ब्यौरा जैसे मौजूदा पता व फोन नंबर भी नोट कर लेता है जोकि आपका एक तरह की निजी ब्यौरा बन जाता है।

मुझे पारिवारिक वृक्ष बनाने व इस तरह का रिकार्ड रखने की परंपरा बहुत अच्छी लगी। मैंने पहले भी एक बार लिखा था कि जिस तरह से हमारे परिवार छोटे हो रहे हैं। उससे मुझे डर लगता है कि एक दिन हमारे तमाम रिश्ते ही खत्म हो जाएंगे। जैसे दो बच्चे होने पर मामा, बुआ, मौसी सरीखे रिश्ते खत्म हो सकते हैं। अगर दोनों बच्चे एक ही लिंग के हुए तो यह समस्या और भी व्यापक हो जाएगी। भविष्य में उनके चाचा, मामा नहीं होंगे।

पहले तो हम बच्चे एक दूसरे की शादियों में मिल लिया करते थे मगर अब बच्चे आपस में बिलकुल भी नहीं मिलते हैं। वे रिश्तेदारों की शादियों में नहीं जाते हैं। वे घंटों सेलफोन पर लगे रहते हैं। पर उन्हें अपने सगे मामा, चाचा, मौसा व चचेरे भाई-बहनों के बारे में कुछ पता नहीं होता है। इसका सबसे बड़ा खतरा तो भविष्य में रिश्ते-नाते खत्म होने का है। कई बार तो मुझे यह खतरा लगता है कि पता नहीं भविष्य में हमारे बच्चे हमारा पिड़दान भी करेंगे या नहीं। इसलिए आजकल गया में पंडितो ने लोगों द्वारा जीवित रहते हुए ही अपना पिड़दान करने की परंपरा शुरू कर दी है।

(साई फीचर्स)