गरीबों की कमर टूट रही लेकिन जनप्रतिनिधियों की मोटाई पर असर नहीं!

 

इस स्तंभ के माध्यम से मैं यह जानना चाहता हूँ कि सिवनी से गुजरने वाले रेल खण्ड के लिये मेगा ब्लॉक लगाने के बाद क्या शासन-प्रशासन के साथ ही साथ जनप्रतिनिधिगण भी यह भूल गये हैं कि सिवनी में रेल सेवाएं बाधित हुए एक लंबा अरसा बीत चुका है।

इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि सिवनी में यातायात के विकल्पों के लिये ज्यादा चिंतन नहीं किया जाता है। ऊपर से जो व्यवस्थाएं सिवनी के लिये थोप दी जाती हैं, यहाँ के जनप्रतिनिधि उसे वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं। वर्तमान में सिवनी के पास जो जनप्रतिनिधि हैं उनके कारण सिवनी की छवि में कोई खास सुधार लंबे समय से नहीं देखा गया है।

ऐसा प्रतीत होता है कि सिवनी के जनप्रतिनिधि जनसेवा नहीं बल्कि स्वयं की रोजी रोटी चलाने और संपत्ति में इज़ाफा करने के लिये ही शायद राजनीति में कूदते हैं। वरना क्या कारण है कि कुरई घाटी जैसे क्षेत्र में फोरलेन का काम कई वर्षों तक बाधित रहा लेकिन उसे आरंभ करवाने की दिशा में कोई खास प्रयास नहीं किये गये। अभी भी स्थिति में खास प्रगति नहीं है। फोरलेन का काम आरंभ तो हो चुका है लेकिन उसका कार्य इतनी धीमी गति से चल रहा है कि निकट भविष्य में उसके पूर्ण होने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है।

इसी तरह मेगा ब्लॉक के नाम पर सिवनी में रेल सेवाएं बंद किये हुए कई वर्ष बीत चुके हैं जबकि यह मेगा ब्लॉक दो वर्षों के बाद हट जाना चाहिये था। यह मेगा ब्लॉक कहीं-कहीं तो खुल चुका है लेकिन सिवनी में चूँकि जनप्रतिनिधियों में ही गंभीरता नहीं है इसलिये इस रेल खण्ड में अत्यंत धीमी गति से काम किया जा रहा है। रेल सेवाएं बाधित रहने के कारण चमचमाती गाड़ियों में घूमने वालों पर तो कोई असर नहीं पड़ता है लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के गरीब वर्ग इससे बेहद परेशान हो चुका है।

सड़क मार्ग से आना-जाना करना, लोगों के लिये काफी महंगा पड़ रहा है और इसके चलते उनकी कमर आर्थिक रूप से टूटी जा रही है लेकिन जनप्रतिनिधियों की मोटाई पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे सब कुछ सामान्य ही है। सिवनीवासी अपने प्रतिनिधियों को ढोने पर जैसे मजबूर हो गये हैं क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प भी नहीं दिख रहा है। रेल सेवाएं बंद होने के बाद यात्री बसों में किराये के नाम पर यात्रियों को लूटा जा रहा है लेकिन उसका भी कोई हल नहीं निकाला जा रहा है। लोग असहाय नजर आ रहे हैं। व्यवस्थाओं के पटरी पर आने की उम्मीद फिर भी बनी हुई है।

अनिल यादव