करवा चौथ आज, जानंे पूजन विधि व मुहूर्त

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। हिन्दू् पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ मनाया जाता है। यह महिलाओं के सौभाग्य की वृद्धि करने वाला व्रत माना गया है। इस साल करवा चौथ 17 अक्टूयबर को है।

इस बार ये है खास : ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार करवा चौथ पर 70 साल बाद रोहिणी नक्षत्र और मंगल का विशेष योग बना है। यह संयोग करवा चौथ के पूजन को और अधिक मंगलकारी बना रहा है। रोहिणी नक्षत्र का होना अपने आप में अद्भुत संयोग है। चंद्रमा में रोहिणी का योग होने से मार्कंडेय और सत्यभासा योग बन रहा है।

यह योग चंद्रमा की 27 पत्नियों में सबसे प्रिय पत्नी रोहिणी के साथ होने से बन रहा है। सुहागिनों के लिये यह बेहद फलदायी है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखण्ड सौभाग्य की कामना से निर्जला व्रत करतीं हैं।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार चतुर्थी 17 अक्टूबर को की सुबह 06.48 आरंभ होगी और अगले सुबह 07.29 बजे तक रहेगी।

खरीददारी आरंभ : करवा चौथ व्रत आने में बुधवार को भले ही 01 दिन शेष था, लेकिन बाज़ार में महिलाओं ने खरीददारी आरंभ कर दी है। ऐसे में इस व्रत की तैयारी करने में महिलाएं कुछ दिन पहले से लग जाती हैं और सजने – संवरने से लेकर पूजा सामग्री तक को इकट्ठा करने में जुट जातीं हैं।

करवा चौथ की पूजन सामग्री : पूजन के लिये पीतल या मिट्टी का टोंटीदार करवा। करवा के लिये ढक्कन, दीप, बाती, कपूर, हल्दी, लोटा, करवा के ढक्कन में रखने गेहूँ, लकड़ी का आसन, छलनी, कांस की तीलियां, दूध, अगरबत्ती, फूल, चंदन, शहद, शक्कर, प्रसाद, फल, मिठाई, दही, चूड़ी, कंघी सहित शृंगार की आवश्यक सामग्री। बाज़ार में ये सामग्री एक साथ भी मिलने लगी है।

करवा चौथः ये हैं शुभ मुहूर्त : करवा चौथ प्रारंभ 17 अक्टूबर को सुबह 06 बजकर 48 मिनिट से, करवा चौथ समापन 18 अक्टूबर को सुबह 07 बजकर 29 मिनिट पर, करवा चौथ कुल अवधि 13 घण्टे 50 मिनिट, पूजा का शुभ मुहूर्त 17 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 46 मिनिट से 07 बजकर 02 मिनिट तक।

करवा चौथः पूजन विधि : करवा चौथ वाले दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठ जायें और इस मंत्र का उच्चारण करते हुए संकल्प लें। मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये!!

सूर्याेदय के पहले सरंगी लें और उसके बाद दिन भर निर्जला व्रत का पालन करें। दीवार पर गेरू से फलक तैयार करें और भीगे हुए चावलों को पीसकर घोल बनायें। फलक पर इस घोल से करवा का चित्र बनायें। ऐसा न कर सकें तो बाज़ारों में रेडीमेड फोटो भी मिल जाते हैं। उसको लगाकर पूजा कर सकते हैं।

भोजन में आठ पूरियों की अठावरी बनायें और मिठाई में हल्वा या खीर बनायें। साथ कुछ और मिठाई भी बना सकतीं हैं। अब पीली मिट्टी और गोबर की मदद से माता पार्वती की प्रतिमा का निर्माण करें। माता की मूर्ति को पाट पर विराजित कर सुहाग सामग्री समर्पित करें। जल से भरा हुआ कलश रखें। करवे में गेहूँ और ढक्कन में शक्करर का बूरा भरें। रोली से करवा पर स्वास्तविक बनायें। इसके बाद गौरी – गणेश के साथ करवा के चित्र की पूजा करें।

अब पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए ओम नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे मंत्र का उच्चारण करें।

करवा पर तेरह बिंदी रखें और गेहूँ या चावल के तेरह दाने उसक ऊपर रखकर करवा कथा कहें या सुनें। कथा श्रवण के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपने सभी बड़े – बुजुर्गों का आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें। चंद्रमा जब दिखायी दे तब छलनी की ओट से पति को देखकर चन्द्रमा को अर्घ्य दें। चंद्रमा को अर्घ्य देते समय पति की लंबी उम्र और जन्म – जन्मांतर के साथ की कामना करें। पति के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें और उनके हाथ से जल ग्रहण कर, पति के साथ भोजन ग्रहण करें।

नज़रें चाँद के दीदार के लिये बेताब : हालांकि तकरीबन पूरे भारतवर्ष में हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोग बड़ी धूम-धाम से इस त्यौहार को मनाते हैं लेकिन उत्तर भारत खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि में तो इस दिन अलग ही नज़ारा होता है।

करवा चौथ व्रत के दिन एक और जहाँ दिन में कथाओं का दौर चलता है तो दूसरी और दिन ढलते ही विवाहिताओं की नज़रें चाँद के दीदार के लिये बेताब हो जाती हैं। चाँद निकलने पर घरों की छतों का नज़ारा भी देखने लायक होता है। दरअसल सारा दिन पति की लंबी उम्र के लिये उपवास रखने के बाद आसमान के चमकते चाँद का दीदार कर अपने चाँद के हाथों से निवाला खाकर अपना उपवास खोलतीं हैं।

करवा चौथ की कथा : एक साहूकार था। उसके सात बेटे थे। बेटी एक थी, जिसका नाम करवा था। करवा शादीशुदा थी। वह अपने मायके आयी हुई थी। एक बार की बात है कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को उनके घर पर व्रत रखा गया।

रात को पूरा परिवार जब भोजन करने लगा तो भाईयों ने करवा से भी उसी समय भोजन करने का आग्रह किया। करवा ने भाईयों की बात यह कह कर टाल दी कि अभी चाँद नहीं निकला है, इसलिये मैं भोजन नहीं करुंगी। मैं सर्वप्रथम चंद्रमा का दर्शन करुंगी और उन्हें अर्ध्य देने के बाद ही भोजन ग्रहण करुंगी।

भाईयों से बहन की भूखी प्यासी हालत देखी नहीं जा रही थी। उधर बहन थी जो जिद्द पर अड़ी थी, वह कुछ भी सुनने समझने को तैयार नहीं थी। सबसे छोटे भाई के दिमाग में एक तरकीब आयी। डसने पीपल के वृक्ष में एक दीप प्रज्ज्वलित कर दिया और अपनी बहन से कहा कि वो देखो, चाँद निकल आया है। चलो, अब अपना व्रत तोड़ दो। बहन को भाई की चतुराई समझ नहीं आयी।

उसने चाँद को देखते ही अर्ध्य दिया और मुख में खाने का निवाला डाल लिया। इधर मुख में खाने का निवाला गया और उधर से उसके पति की मृत्यु का समाचार प्राप्त हो गया। करवा का बुरा हाल हो चुका था। पर वह जिद्दी थी। शोकाकुल होकर एक वर्ष तक वह अपने पति के शव को लेकर बैठी रही और शव के उपर उगने वाली घास इकट्ठा करती रही। अगले वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को उसने पुनः पूरे विधि विधान से करवा चौथ का व्रत किया। ईश्वर उस पर प्रसन्न हुए और उसका मरा हुआ पति जीवित हो गया। तब से ही करवा चौथ की यह परंपरा चली आ रही है।

करवा चौथ व्रत के नियम : यह व्रत पूरे दिन करना चाहिये। सूर्याेदय से पहले से आरंभ कर रात में चाँद निकलने तक उपवास रखने पर ही यह व्रत संपूर्ण होता है। आसमान में चंद्रमा के दर्शन के उपरांत ही व्रत खोला जाता है। यह व्रत सिर्फ सौभाग्यवती अर्थात सुहागन महिलाओं के लिये है।

आसमान में चंद्रमा के उदय से लगभग घण्टे भर पूर्व संपूर्ण शिव परिवार की आराधना करनी चाहिये। भगवान शंकर, माता पार्वती, विध्नहर्ता गणेश जी, नंदी जी और कार्तिकेय जी की सच्ची मन से पूजा करनी चाहिये। पूजा के समय जातक का मुख पूर्व की तरफ होना चाहिये जबकि देवी देवताओं की प्रतिमा अथवा चित्र को पश्चिम की तरफ रखना चाहिये।

शिव परिवार के लिये बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी बनाकर उन्हें स्थापित करना चाहिये। शु़द्ध घी में आटे को सेंक कर और उसमें शक्कर मिला कर नैवेद्य हेतु लड्डू बनाना चाहिये। काली मिट्टी में शक्कर की चासनी मिलायें। उस मिट्टी से करवे तैयार करें। अपनी शारीरिक और आर्थिक क्षमता अनुसार 10 अथवा 13 करवा चौथ का व्रत रखें।