हिंदी से न सधे तो उर्दू से ही साध लीजिए

(देवी प्रसाद मिश्र)
अमिताभ बच्चन जिन्हें इस बार का दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला है, अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का दृ उन कविताओं की मौलिकता और गुणवत्ता को लेकर सवाल हो सकते हैं- प्रभावशाली पाठ करने के लिए भी जाने जाते हैं। लेकिन हिंदी का समकालीन कवि कविता- पाठ की कला में बहुत पिछड़ा है। इस संदर्भ में कहना पड़ेगा कि इस समय हिंदी की सबसे ज्यादा सुनी जाने वाली कविता अगर कोई है, तो वह नवीन चौरे उर्फ मुकम्मल की वास्तविक कानून जो लिंचिंग संस्कृति की अमानवीयता, हिंसा और क्रूरता को अपना निशाना बनाती है। यह जरूरी काम करते हुए यह कविता कलात्मक पेचोखम पर भी बराबर नजर रखती है। तो कोई यह नहीं कह सकता कि देखिए नज्म में नारा तो है, लेकिन फनकारी का नाड़ा ढीला है। नवीन की कविता, जिसे हम हिंदुस्तानी जबान कहते हैं, उसमें लिखी गई है, जिसे वह फर्राटे से सुनाते हैं। अदम गोंडवी को ठीक ही वह अपना आदर्श मानते हैं, जिन्होंने हिंदी समाज मैं फैले सामंती चाल-चलन, ताकत और लोकतंत्र के रोज बिगड़ते चेहरे पर बड़ी मानीखेज चोट की और एक गुस्सैल कविता लिखी, जिसके तौर-तरीके उर्दू कविता से आते हैं। नवीन की कविता कह लीजिए कि समकालीन लिखित हिंदी कविता का प्रत्याख्यान है, जिसके पाठक लगातार कम होते गए हैं।
हिंदी की लिखित कविता के सामने पाठक का संकट सोशल मीडिया के जमाने में भी बहुत कम नहीं हुआ है। यहां घूम-घाम कर वही चार-पांच सौ बंदे कविता को लाइक करने का इनसेस्टुअस और कौटुंबिक अभिसार का खेल खेलते रहते हैं। इसे विडंबना ही कह लीजिए कि हिंदी कविता ज्यों-ज्यों सोचती हुई कविता बनने की तरफ बढ़ी, वह पाठकों से दूर होती गई। आज की हिंदी कविता अपनी संवेदना और विवेक के लिए सराही जाती है, लेकिन किसी भी शहर के कविता-पाठ में सवा सौ लोग आ आएं, तो उसे सफल घोषित कर दिया जाता है। जैसा कि मैं कहता रहा हूं हिंदी कवि नैतिक अल्पसंख्यक है। जाहिर है, इस कविता को बेचा- खरीदा नहीं जा सकता और कवि इस कविता को लिखते हुए बाजार-मुक्त रहता है। वह भीड़-मुक्त भी होता है। मतलब कि लोकप्रियतावाद के सम्मोहन उसे नहीं भटका पाते। लेकिन इसकी बड़ी कीमत उसे चुकानी पड़ती है पाठकों को खोकर।
कह लीजिए कि उर्दू कविता के सामने इस तरह का संकट कभी नहीं रहा। उसे सुनने-पढ़ने वाले कमोबेश बने रहे। इसकी दो-तीन वजहें जान पड़ती हैं। उर्दू कविता ने गजल और नज्म के प्रारूप को लगभग यथावत बनाए रखा। अगर शिल्प में वह कुछ भटकी भी, तो उसने लय और प्रवाह से अमूमन समझौता नहीं किया। उसके बड़े से बड़े कवि ने बड़े और भरे मंचों से गुरेज नहीं किया और इस तरह उनका हाथ पाठक और श्रोता की नब्ज पर रहा। इसके चलते उसकी संप्रेषणीयता बरकरार रहती थी, लेकिन तब उसे लोकप्रियतावाद की सजा भी भुगतनी पड़ती थी। कह लीजिए कि उर्दू कविता में ललकार, अवसाद, परायापन, मोहभंग जैसे भावबोध को कहने में कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन इस कविता में जांच, विश्लेषण, विवेक, बौद्धिकता के तत्व लगभग नदारद रहते हैं, जो हिंदी कविता का शक्ति-क्षेत्र रहा है। विवेकाधिक्य के चलते हिंदी कविता ने छंद को तो त्यागा ही, उसने लय और प्रवाह से कन्नी काट ली और यह सब ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दबावों के चलते हुआ। कह लीजिए कि हिंदी कविता विवेक-निर्माण के काम में अपनी भूमिका देखने लग गई और निरी कविताई के रिझाऊ कारोबार से बाहर आ गई।
इस प्रसंग में याद आता है कि शमशेर बहादुर सिंह, जिन्हें उर्दू कविता की हर बारीकी का गहरा अंदाजा था, ने अंततः हिंदी में कविता लिखने का चयन करके इतिहास के एक दौर में यह ऐलान किया था कि प्रगति, विवेक और परिवर्तन की खांटी अंतर्वस्तु हिंदी के पास है। कई बार तानाकशी करते हुए लोग कहते भी है कि अगर निबंध ही लिखना है तो उसके लिए कविता का प्रारूप क्यों जरूरी हो? लेकिन फिर तरन्नुम वाली उर्दू कविता के कान फिल्मी गाना काटता है, जिसे लाखों की संख्या में सुना जाता है। स्वीकार कर लीजिए कि फिलहाल तो हिंदी कविता को पाठक नहीं मिलने वाले और उर्दू कविता के श्रोता कम नहीं होने वाले। यह भी मान लीजिए कि हिंदी जाति की ये दो भुजाएं हैं: जो काम एक हाथ से नहीं सध रहा, उसे दूसरे से करने की कोशिश कीजिए। क्योंकि, अंततः हिंदी हैं हम वतन हैं।
(साई फीचर्स)