जानिये नरक चौदस का महत्व एवं इसकी पौराणिक कथा

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। हर वर्ष शरद ऋतु में मनाया जाने वाला पाँच दिवसीय रौशनी का पर्व दीपावली एक प्राचीन हिंदू त्यौहार है। 05 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन रूप चौदस या नर्क चौदस, तीसरे दिन मुख्य त्यौहार दीपावली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा व पाँचवें व आखिरी दिन भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है।

इस पर्व के दूसरे दिन का त्यौहार नरक चौदस या नर्क चतुर्दशी या नर्का पूजा या रूप चौदस के नाम से भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में तेल लगाकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। वहीं इस दिन शाम को दीपदान की प्रथा है, जिसे यमराज के लिये किया जाता है।

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि दीपावली महापर्व के दूसरे दिन नरक चौदस को मनाया जाने वाला एक त्यौहार है। इसे रूप चौदस और रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। दीपावली के मुख्य पर्व दीपावली से ठीक एक दिन पहले मनाये जाने के कारण नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहा जाता है। वहीं नरक चौदस की शाम को दीये जलाये जाते हैं। इस दिन यमराज की पूजा कर अकाल मृत्यु से मुक्ति और बेहतर स्वास्थ्य की कामना की जाती है।

इसके अलावा मान्यता के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन प्रातः काल सूर्य उदय से पहले शरीर पर तिल्ली का तेल मलकर स्नान करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है और मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

परंपरा के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी मनायी जाती है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन चंद्र उदय या अरुणोदय (सूर्य उदय से सामान्यतः 01 घण्टे 36 मिनिट पहले का समय) होने पर नरक चतुर्दशी मनायी जाती है। हालांकि अरुणोदय पर चतुर्दशी मनाने का विधान सबसे ज्यादा प्रचलित है।

यदि दोनों दिन चतुर्दशी तिथि अरुणोदय या चंद्र उदय का स्पर्श करती है तो नरक चतुर्दशी पहले दिन मनाने का विधान है। इसके अलावा अगर चतुर्दशी तिथि अरुणोदय या चंद्र उदय का स्पर्श नहीं करती है तो भी नरक चतुर्दशी पहले ही दिन मनानी चाहिये। नरक चतुर्दशी के दिन सूर्याेदय से पहले चंद्र उदय या फिर अरुणोदय होने पर तेल अभ्यंग (मालिश) और यम तर्पण करने की परंपरा है।

नरक चतुर्दशी की कथा : पौरणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक रन्तिदेव नामक राजा था। वह हमेशा धर्म-कर्म के काम में लगा रहता था। जब उनका अंतिम समय आया तब उन्हें लेने के लिये यमराज के दूत आये और उन्होंने कहा कि राजन अब आपका नरक में जाने का समय आ गया हैं।

नरक में जाने की बात सुनकर राजा हैरान रह गये और उन्होंने यमदूतों से पूछा कि मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया। मैंने हमेशा अपना जीवन अच्छे कार्यों को करने में व्यतीत किया तो आप मुझे नरक में क्यों ले जा रहे हो।

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि एक बार राजन तुम्हारे महल के द्वार पर एक ब्राह्मण आया था जो भूखा ही तुम्हारे द्वार से लौट गया। इस कारण ही तुन्हें नरक में जाना पड़ रहा है। यह सब सुनकर राजा ने यमराज से अपनी गलती को सुधारने के लिये एक वर्ष का अतिरिक्त समय देने की प्रार्थना की।

यमराज ने राजा के द्वारा किये गये नम्र निवेदन को स्वीकार कर लिया और उन्हें एक वर्ष का समय दे दिया। यमदूतों से मुक्ति पाने के बाद राजा ऋषियों के पास गये और उन्हें पूर्ण वृतांत विस्तार से सुनाया। यह सब सुनकर ऋषियों ने राजा को एक उपाय बताया।

जिसके अनुसार ही उसने कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन व्रत रखा और ब्राह्मणों को भोजन कराया जिसके बाद उसे नरक जाने से मुक्ति मिल गयी। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति के लिये भूकृलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।