ट्रंप और मोदीः राम मिलाई जोड़ी!

 

 

(श्रुति व्यास)

हाथों में हाथ डाले, पचास हजार लोगों की झूमती भीड़ में बाईस सितंबर को अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में मोदी और ट्रंप का वह वक्त, वह क्षण, वह माहौल अर्से तक नहीं भुलाया जा सकेगा जिसे कई लोगों ने बहुत मुदित भाव, खुशी के आंसू के साथ देखा और बूझा। सचमुच वह ऐसा दिन था जो याद रहेगा। मौका था भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सम्मान और उसमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का शरीक होना। फिर दोनों का भीड़ को संबोधन और लोगों की तालियां।

लेकिन समारोह की भव्यता, ह्यूस्टन के भव्य शो के बाद अब विषय यह है कि क्या नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य नहीं हो गए हैं? दोनों में वह क्या-क्या खूबी है जिससे दोनों को ले कर देश-दुनिया में प्यार और नफरत, समर्थन व विरोध के संदर्भ में समान रूप से देखा-समझा जा रहा है?

हकीकत में नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप दो ही ऐसे नेता आज हैं जिनकी देश-दुनिया में, लोगों के बीच एक सी स्थिति है। जैसा कि दोनों के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया का दावा होता है या दोनों एक ही मंच को जैसे साझा करते हैं और एक-दूसरे को अपने दोस्त के रूप में जैसे पेश करते हैं, उस सबसे वे समानताएं उभरती हैं जिन्हें जानना-बूझना मुश्किल नहीं है।

वर्ष 2017 में ट्रंप जब अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति बने थे तब दुनिया को जरा झटका-सा लगा था। हालांकि वह चले आ रहे विश्व ट्रेंड और नरेंद्र मोदी की जीत (2014 में नरेंद्र मोदी का जीतना लोगों के लिए अनहोना था तो राष्ट्रवादी लोकलुभावनवाद में जनादेश वाले ट्रेंड का भी प्रमाण था) जैसा ही था। उस वक्त भारत में लोगों ने अमेरिका के चुनाव पर फोकस बनाया और ट्रंप जब जीते तो लोगों ने उसी उत्साह और लड्डुओं के साथ जीत की खुशी दिखाई जैसे नरेंद्र मोदी की जीत पर दिखाई थी।

जीत के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अपने शासन में हरकतें कम चौंकाने वाली नहीं की हैं। जब उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का फैसला किया था, तब तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा और सेठ मेयर्स ने पत्रकारों के साथ रात्रिभोज के दौरान ट्रंप का मखौल उड़ाया था। ( वैसे ही 2002 से मोदी को ले कर कहा जाता रहा था)। लेकिन ट्रंप पर असर नहीं हुआ। वे अपने इरादे में डटे रहे। रूस की चुनावी दखल के आरोपों से लेकर अपने वकील माइकल कोहेन पर एफबीआइ के छापों और हाल में महाभियोग की कार्रवाई और मीडिया के हमलों के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप बेखटके सत्ता पर, निश्चिततता से डटे हुए है। अमेरिका महान बनने के बजाय ट्रंप की हरकतों से उलटे अमेरिका की महानता का वैश्विक निगाहों में ह्रास है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अमेरिका उपहास पात्र है। वे और अमेरिका दोनों ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बेगाने, गैर-जिम्मेवार होने की हंसी के पात्र हैं। दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने की संभावना दुनिया के लिए कानों को चुभने वाली भुतही बनी हुई हैं।

ट्रंप ने जून में ओरलैंडो (फ्लोरिडा) से धूमधड़ाके और सबसे बड़ी चुनावी सभा के साथ अपना चुनाव प्रचार शुरू किया। यह कहते हुए कि मैंने फिर अमेरिका को महान बनाया है, इसलिए एक बार फिर मुझे वोट दें ताकि मैं अमेरिका को महान बनाए रख सकूं। यह बड़बोलापन तब जब हकीकत में उनके खाते में उपलब्धि नहीं है। वे मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने, लोगों को रोजगार देने (मध्य-पश्चिम में कोयला खानों से लेकर फैक्टरियों तक में), ओबामाकेयर की तुलना में ज्यादा सस्ती और अच्छी स्वास्थ्य योजना लागू करने, विदेशियों को वापस उनके देश भेजने, अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी जैसे तमाम वादों में एक पर भी खरे नहीं उतरे हैं। बावजूद इसके उनका क्रेज है और वे भक्तों में हल्ला बनाए हुए हैं कि वाशिंगटन का गैर-अमेरिकी अभिजात्य वर्ग उन्हे काम नहीं करने दे रहा है। लोगों को बरगलाने, बड़बोले बोलों से ट्रंप ने औसत अमेरिकी नागरिकों में हवा बनाई है कि उनका विकल्प नहीं है। उन्हे फिर राष्ट्रपति बनाना है। मतलब अमेरिका में वह सब होता दिख रहा हैं जो कुछ महीनों पहले हमने भारत में होता देखा है। भौंडी कूटनीति, विदेशी नेताओं के साथ ढींग, फोटो शूट, बेतुकी बातें, भावशून्य मुस्कुराहट, विद्वेष और उकसाने वाले अंहकारी संवाद की तमाम वे बाते है जिससे हम भी गुजरे है। डोनाल्ड ट्रंप भी वहीं नुस्खे अपना रहे है जैसे नरेंद्र मोदी ने अपनाए थे।

कुल मिलाकर दोनों नेताओं में ऐसी कई खूबियां हैं जो एक दूसरे से मिलती हैं। दोनों ही वन-मैन शो वाले, भीड़ समर्थन खींचने वाले या नफरत पैदा करने वाले और लोगों के बीच खौफ का माहौल बनाए रखने वाले हैं। जब प्रचार करते हैं तो जुबा से मैं के सिवाय कुछ नहीं निकलता है। अपनी-अपनी गाते हैं। जिस पार्टी के हैं, उसका कहीं कोई मतलब नहीं रह जाता। यानी अपनी पार्टी की पूरी तरह से उपेक्षा। असीम-उर्जा और ताकत से भीड़ को लगातार उन्मादी बनाए रखते हुए विरोधी के खिलाफ नफरत, उन्हे कमतर बतलाने के लिए किसी भी हद तक चले जाना। संदेह नहीं कि इस सबसे ह्यूस्टन बढ़िया तमाशे का तब चश्मदीद बना जब दोनों नेता वहां एक साथ पहुंचे और दोनों ने जुमलों से लोंगों को मंत्रमुग्ध बनाया।

जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के फैसले से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में मोदी-2 सरकार की छवि को धक्का लगा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने दुनिया भर में भारत के खिलाफ जिस तरह से अभियान छेड़ा हुआ है और दोनों देशों के बीच युद्ध के जैसे हालात बने हैं उसे लेकर नरेंद्र मोदी को कूटनीतिक रूप से काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। लेकिन ह्यूस्टन के आयोजन ने उनमें भरोसा बनाया है। मामूली बात नहीं जो मोदी के साथ खड़े होकर ट्रंप ने ऐलान किया कि रेडिकल इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ अमेरिका खड़ा है। इससे पाकिस्तान को संकेत मिला तो मोदी अपने आप भारत के रक्षक की धमक लिए हुए हो गए।

ह्यूस्टन में ट्रंप ने अपना चुनावी फायदा भी कराया। रिपब्लिकन टेक्सास में ह्यूस्टन शहर डेमोक्रेट पार्टी का गढ़ है। इसलिए ट्रंप के दूसरी बार के राष्ट्रपति चुनाव में यह शहर कड़े मुकाबले वाला रणक्षेत्र होगा। दिल्ली को इस बात की जानकारी थी। इसलिए जैसे ही ट्रंप को ह्यूस्टन आयोजन के लिए न्योता भेजा गया तो उन्होंने तुरंत मौका लपका। फिर नरेंद्र मोदी का अबकी बार ट्रंप सरकार कहना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए मौजूद भारतीय अमेरिकियों को बड़ा संदेश था।

इसे चतुराई, होशियारी या निर्लज्जता कुछ भी माने लेकिन दोनों नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक और कूटनीतिक स्वार्थों को हासिल करने के लिए एक दूसरे का इस्तेमाल बिना किसी संकोच से किया। इस तरह का दोस्ताना आने वाले वक्त की राजनीति में एक दूसरे का पीछा करेगा, खासतौर से नरेंद्र मोदी का। हमें नहीं भूलना चाहिए कि डोनाल्ड ट्रंप बहुत धूर्त और चालाक किस्म के कारोबारी हैं जो अपने अहम के लिए कभी भी किसी को भी धोखा दे सकते हैं और इसके लिए वे कुख्यात भी हैं। यदि आज वे मोदी के दोस्त हैं तो कल वे इमरान खान के दोस्त भी बन जाएंगे।

बहरहाल दुनिया में दक्षिणपंथ का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। चुनावी राजनीति के लिए खुल कर एकजुटता दिखलाई जा रही है। न्यू इंडिया, मेक इन इंडिया और अमेरिका फर्स्ट, अमेरिका ग्रेट जैसे नारे और जुमले सिर्फ एक दूसरे से गठजोड़ के फार्मूले है। इसमें इस बात का कोई मतलब नहीं है कि आप कितने सही और सच्चे हैं।

(साई फीचर्स)