ट्रंप का तमाचा व बेशर्म पत्रकार!

 

 

(अजित द्विवेदी)

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी मीडिया बदतमीज और झूठा नेता मानता है। उन्होंने न्यूयार्क में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दोपक्षीय वार्ता के बाद मोदी को भारत का पिता और एल्विस प्रेस्ले जैसा रॉक स्टार कहा। इससे कुछ दिन पहले पांच अगस्त को जब ट्रंप के राष्ट्रपति के रूप में 928 दिन हुए थे तब अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार द वाशिंगटन पोस्ट ने बताया था कि इन 928 दिन में ट्रंप ने 12,019 झूठ बोले हैं। वे हर दिन औसतन 13 झूठ बोलते हैं। इसलिए अमेरिका के लोग उनकी बातों पर यकीन नहीं करते। पर भारत में लोग झूम रहे हैं कि ट्रंप ने मोदी को एल्विस प्रेस्ले और भारत का पिता कहा है।

बहरहाल, जिस समय ट्रंप ने मोदी को भारत का पिता होने का प्रमाणपत्र दिया उसी समय उन्होंने भारतीय मीडिया को देशभक्ति का सर्टिफिकेट भी दिया। उससे एक दिन पहले उन्होंने पाकिस्तानी मीडिया को भी देशभक्ति का सर्टिफिकेट दिया था। इस तरह उन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों की मीडिया की औकात को एक जैसा बताया और इस बात पर खुशी जताई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को इतने अच्छे पत्रकार मिल जा रहे हैं, जो उन्हीं की लाइन पर सवाल पूछते हैं और पत्रकारिता करते हैं।

ऐसा लग रहा है कि वहां मौजूद पत्रकारों ने अपनी गाल पर पड़े इस जोरदार तमाचे का अपमान महसूस नहीं किया। क्योंकि उसके बाद से कुछ भी बदला हुआ नहीं दिख रहा है। सब कुछ पहले की तरह ही चल रहा है। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि 16 साल की ग्रेटा थनबर्ग की तरह कह सके कि हाऊ डेयर यू! बहरहाल, ट्रंप मजे लेते हैं। वे प्रधानमंत्रियों के साथ मजे लेते हैं तो पत्रकारों का क्या कहना है। वह भी ऐसे पत्रकारों का, जिन्होंने पहले ही लाज, शर्म, कर्तव्य, दायित्व, नैतिकता आदि को सरकार के यहां गिरवी रख दिया है।

तभी ऐसा मानना चाहिए कि जिन पत्रकारों को दिखा कर ट्रंप ने मोदी से पूछा कि आपको ऐसे पत्रकार कहां से मिल जाते हैं, वे पत्रकार निश्चित रूप से गर्व से भरे होंगे। उनको लग रहा होगा कि प्रधानमंत्री की नजरों में उनकी अहमियत कितनी बढ़ गई है। उन्हें इस बात का भी गर्व होगा कि उन्हें ट्रंप ने देशभक्त होने का सर्टिफिकेट दिया है। अब खतरा यह है कि देशभक्ति के इस सर्टिफिकेट को लेकर वे कहीं खुद ही पाकिस्तान पर हमला करने न चल दें। बहरहाल, मजाक छोड़ें तो ट्रंप के बयान से यह हकीकत जाहिर हुई है कि पाकिस्तान के पत्रकारों के लिए भारत विरोध देशभक्ति है और भारत के पत्रकारों के लिए पाकिस्तान विरोध। साथ ही यह भी जाहिर हुआ है कि देशभक्ति का तमगा दिलाने वाला एकमात्र मुद्दा कश्मीर है।

भारत के जो पत्रकार वहां मौजूद थे क्या उनको पता था कि उस प्रेस कांफ्रेंस से कुछ घंटों पहले ही 16 साल की ग्रेटा थनबर्ग ने जलवायु परिवर्तन को लेकर कितनी बड़ी चिंता जाहिर की थी और सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले पांच देशों की शिकायत संयुक्त राष्ट्र से की थी? क्या उन्होंने इस बारे में ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी से पूछना जरूरी समझा? भारत और अमेरिका के बीच कारोबार का समझौता अटका हुआ था पर क्या इस बारे में कुछ पूछना या देश के लोगों को बताना जरूरी समझा गया? सबने यह मान लिया कि प्रधानमंत्री का अमेरिका दौरा इमरान खान को जवाब देने के लिए था, जो उन्होंने बखूबी दे दिया।

देश में भी भारतीय मीडिया यहीं काम पूरी प्रतिबद्धता और समर्पण के साथ कर रहा है। उसका एकमात्र एजेंडा सामयिक विमर्श को असली मुद्दों से भटकाने का है। लोगों को देशभक्ति, राष्ट्रवाद, कश्मीर, पाकिस्तान, आतंकवाद, मंदिर, गौरक्षा आदि की अफीम सुंघाते रहने का है। देश में इस समय असली मुद्दा अर्थव्यवस्था के संकट का है। असली चिंता पिछले 72 साल में अर्जित की गई देश की सारी संपत्तियों को निजी हाथों में दे दिए जाने की है। असली खतरा अभिव्यक्ति की आजादी को नियंत्रित करने और संगठित विपक्ष को पूरी तरह से खत्म कर दिए जाने का है। असली बहस मॉब लिंचिंग की घटनाओं और टूटते सामाजिक ढांचे की है।

पर भारतीय मीडिया को सब कुछ वैसे ही अच्छा दिखाई दे रहा है, जैसे प्रधानमंत्री को दिखाई देता है। आखिर उन्होंने 22 सितंबर को ह्यूस्टन के एनआरजी स्टेडियम में 50 हजार भारतीयों की मौजूदगी में दस भाषाओं में कहा कि भारत में सब कुछ ठीक है। भारत के पत्रकार तो प्रधानमंत्री की बातें बिना कहे समझ जाते हैं तो जो बात उन्होंने दस भाषाओं में कही उसे कैसे नहीं समझेंगे। वह तो उनके लिए ब्रह्म वाक्य है!

(साई फीचर्स)

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