निराश न हों कि अदालत कायम है अभी

 

 

 

 

(प्रकाश भटनागर)

यह उस राजा की कहानी है, जिसके कुछ बहुत खास दरबारी वेश्यागमन के दौरान अचानक कीचड़ में गिर गये। सबके चेहरे सने हुए थे। रात-भर में ही इसका प्रचार पूरी रियाया के बीच हो गया कि दरबार में जो खास लोग हैं, उनमें से पतित चरित्र वालों का चेहरा कीचड़ से सना है। खबर राजा तक पहुंची। उसने तुरंत सारे दरबारियों को एकत्र किया। उन सभी को उसी कीचड़ वाले गड्ढे में धक्का दे दिया गया। फिर जब दरबार सजा तो प्रजा ने पाया कि दरबार का हरेक चेहरा कीचड़ में सना हुआ था। इससे हुआ यह कि सारा का सारा दरबार कलंकित की श्रेणी में आ गया। जिन्होंने वेश्यागमन किया और जो इससे दूर रहे, दोनों के ही बीच अब कोई अंतर नहीं रह गया था। जापान में एक स्वयंभू भगवान था शोको आसेहारा। विवादित पंथ संचालित करता था। नब्बे के दशक में उसके गोरखधंधे की कलई खुली तो एक खास बात सामने आयी। वह यह कि आश्रम में सजा बहुत विचित्र दी जाती थी। किसी गुनहगार को लोगों के मल-मूत्र में लेटने को विवश किया जाता। फिर उसे नहाने नहीं देते थे

सारी गंदगी तब तक उसके शरीर से लिपटी रहती थी, जब तक कि वह सूखकर झड़ न जाए। भारी-भरकम अपराधों की फेहरिस्त से सुसज्जित जीवन शैली वाले आसेहारा को बीते साल फांसी पर लटका दिया गया। तो ये राजा और स्वयंभू भगवान वाकई किसी भी हद तक जा सकते हैं। राजा चाहे तो कुछ गंदों को बचाने के लिए बाकियों को भी गंदगी में उतार दे और खुद को ईश्वर कहने वाला चाहे तो इसी गंदगी को अपने इंसाफ का जरिया बना लें। ऐसे में शुक्र मनाना चाहिए कि देश में जैसी भी है, अदालत नामक संस्था अस्तित्व में है और लोगों का उस पर अभी भरोसा कायम है। और उसके होते ही यह संभव दिख रहा है कि घिनपने से लबरेज हनी ट्रैप कांड में सच का सूरज व्याभिचार के काले बादलों के बीच से निकलेगा। कीचड़ में लिपटे चेहरे बेनकाब हो जाएंगे। उनका बेनकाब होना इसलिए जरूरी है ताकि उजले चेहरों पर लोगों का भरोसा कम से कम कायम रह पाए। कोर्ट ने मामले की जांच अपने निर्देश के तहत कराने की बात कही है। एसआईटी के प्रमुख पद को फुटबॉल बना लेने जैसी प्रवृत्ति पर नाराजगी जतायी है।

इससे पहले तक जो हो रहा था, वह वाकई घबराहट से भर देने वाला रहा। यह आशंका किसी दैत्य की तरह लगातार बड़ा आकार लेती रही कि इस मामले का किसी अंधी गुफा में जाकर रुक जाना तय है। जाहिर है कि जिस घटनाक्रम में नौकरशाह, राजनेता तथा पत्रकारों जैसे प्रभावी चेहरे शामिल हों, उस घटनाक्रम को नंगे सच की तरह उजागर करना आसान नहीं है। अब कम से कम उम्मीद तो की ही जा सकती है। मेरी कामना इस मामले में लिप्त लोगों के चेहरे देखकर गुदगुदाने वाली नहीं है। इच्छा यही है कि इस तरह के छोटे स्तर के मामलों में जैसे आरोपियों को सरे समाज निर्वस्त्र किया जाता है, उसी तरह यहां भी होना चाहिए। ताकि यह यकीन हो सके कि समाज में समानता का तत्व अभी कायम है। होना तो यह चाहिए था कि अब तक सारे नाम सार्वजनिक कर दिये जाते। एक हरभजन सिंह, एक दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री केवल ये ही तो शहद के लालच में चरित्र से नहीं गिरे। जाहिर है कि लंगोट के कमजोर ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है। नहीं हो तो बहुत अच्छा, पर अभी संदेह तो ऐसे ही हैं।

तो फिर क्यों ऐसा हो रहा है कि इनके नामों का खुलासा नहीं किया जा रहा है? वैसे यह सवाल तो उसी समय बेमानी हो गया था, जब पता चला कि इस कांड में रसूखदार चेहरे शामिल हैं। अब उम्मीद की जाना चाहिए कि हमाम का सच को लेकर जो सवाल हैं, उनका उत्तर मिलने का समय आ गया है। हां, यह उत्तर पूरा नहीं होगा, यह तय है। सबूतों को हैदराबाद की लैब में भेजने का आदेश होने के पहले तक इतना लम्बा समय गुजर चुका है कि कई प्रभावशाली लोगों के विरुद्ध मौजूद साक्ष्य या तो नष्ट कर दिये गये होंगे या फिर उन्हें कमजोर बना दिया जा चुका होगा। ऐसी आशंका करने के पर्याप्त आधार हैं। फिर भी, भागते भूत की लटकती लंगोटी की तर्ज पर ही सही, कम से कम कुछ नाम तो सामने आएंगे। इसी बहाने जनता का व्यवस्था पर भरोसा एक बार फिर कायम हो जाएगा। वरना तो व्यापमं कांड के हश्र ने आम जन के बीच यह संदेश पुख्ता तरीके से प्रसारित कर दिया था कि मामला दिग्गजों का हो, तो उसमें कार्रवाई के नाम पर कुछ भी नहीं होता है।

अभी हो यह गया है कि प्रदेश में नौकरशाही सहित राजनीतिज्ञ और मीडिया, तीनों समूहों के कमोबेश लोग संदेह के दायरे में हैं। इन विधाओं के सभी लम्पट श्रीकी पहचान उजागर करने से बचा जा रहा है, इसलिए जो बेचारे लम्पटियाई से दूर रहे, वे भी इसके दाग झेलने पर मजबूर हो गये हैं। वल्लभ भवन में जाकर पूरी ईमानदारी से अपना काम करवा लेने वाली कोई भी महिला को अब इसी निगाह से देखा जा रहा है कि उसने कोई अनुचित तरीका इस्तेमाल कर लाभ हासिल करने का काम किया है। हरेक प्रभावशाली अफसर तथा नेता को इसी नजरिये से देखा जाने लगा है। माध्यम का भी यही आलम है। सरकार द्वारा नाम छिपाने की फितरत के चलते आलम यह है कि वल्लभ भवन में रिश्वत ले-देकर काम करवाने वाला ट्रेंड आउट आॅफ फैशन हो गया लगता है। अब तो हर काम के बदले में यही कयास लगाया जा रहा है कि यह जुगलबंदी हनी और उसके शिकारों के बीच किसी सेज पर बैठ और लेटकर सजायी गयी होगी। इसलिए दागदार और बेदाग चेहरों के बीच का फर्क हर हालत में उजागर किया ही जाना चाहिए। अब तक ऐसा होता नहीं दिख रहा था, लेकिन अदालत कायम है और इसी के चलते यह विश्वास भी कायम है कि अभी निराश नहीं होना चाहिए। तब तक आप अगली किसी एसोसिएशनों की मुख्यमंत्री के नाम चिट्ठी का इंतजार कर सकते हैं। चिंताएं वहां ज्यादा गहरा रही होंगी।