ताकि सनद न रहे और वक्त-जरूरत काम न आए

 

 

(शरद जोशी)

यह जो सूचना नवभारत टाइम्स ने दी है कि प्रतिदिन स्तंभ के लेखक शरद जोशी का जन्म 24 मई, 1931 को हुआ, सरकारी खंडन की भाषा में नितांत असत्य, तथ्य से परे ही नहीं वरन भ्रामक भी है। मैंने पढ़ा और सच्ची सूचनाओं की इस खोजी पीड़ा से तिलमिला उठा..रे शरद, तेरी जन्मतिथि को लेकर तेरे ही अखबार में इतनी गलतफहमी है तो तेरे जीवन को लेकर अपने-परायों में कितनी होगी? तेरे मरने की तारीख पर क्या-क्या झमेले होंगे? कई दल बन जाएंगे, जो तेरा जन्मदिन और तेरी पुण्य-तिथि अलग-अलग दिन मनाएंगे। चाहे हर दल में पांच-छह लोग ही हों, पर धरती पर मनमुटाव तो बढ़ेगा ही।

इसलिए नवभारत टाइम्स ने जो लिखा कि सनद रहे, मैं कहता हूं, सनद न रहे और वक्त पर काम न आए कि मेरा जन्म 24 मई को हुआ था। जी नहीं, उस दिन तक बंदा इस संसार का तीन दिन का अनुभव प्राप्त कर चुका था और आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि वह कोई सुखद अनुभव नहीं था। 21 मई, 1935 को उज्जैन के कार्तिक चौक क्षेत्र में मेरे जाति-परिवार में एक साधारण आंधी चली थी। श्रीनिवास के यहां लड़का हुआ था। शांति के लड़का हुआ था। 1931 एक खबरविहीन वर्ष था। उसमें मेरा यही एक नम्र योगदान था।

उज्जैन में मगरमुंहा की संकरी गली में घुसो और उस चौक को पार कर, जहां भैरवनाथ का मंदिर है, आगे बढ़ो तो दाहिनी ओर एक मकान आता है। पत्थर का घर था, तब उसे हवेली कहते थे। शायद इसलिए कि वह दो मंजिला था। पता नहीं, अब वह घर है कि नहीं? शायद उसके सामने कुछ निर्माण हो जाने से वह छिप गया हो। जन्म के कई वर्ष बाद मैंने पिताजी से पूछा था, मुझे वह घर बताइए, जहां मेरा जन्म हुआ है? पिताजी मुझे उस गली में ले गए। उन्होंने उस गली के दो चक्कर लगा, मकान पहचानने का यत्न किया, पर पहचान न सके। और इसी के साथ जन्म-स्थान पर भव्य स्मारक बनाने का मामला खटाई में पड़ गया।

यह वही गली है, जिसके चौक में मृच्छकटिक का नायक चारुदत्त रहता था। वसंतसेना पिंजारवाड़ी या झंडा चौक में रहती थी, वह वहां से सीधी चल गोपाल मंदिर के पीछे वाली गली से होकर चारुदत्त से मिलने आती थी। मेरे जन्मवाली हवेली तक या उसी जगह चारुदत्त की वाटिका फैली होगी। सब मेरा अंदाजा है। मैं वाकणकर नहीं हूं, अन्यथा पूरी खोजकर बात करता। जब आप पाटनी बाजार घुसते हैं, कोने में गांधी जी की दुकान है। शायद अब भी हो। आगे फलिहारी मिठाइयां बनती हैं। इस सबकी मिली-जुली गंध बंदे की नसों में आज भी है। अथ, जब उत्सव फिल्म के संवाद लिख रहा था, यह गंध असर कर रही थी।

1931 का वर्ष कोई खास नहीं था। अंग्रेज गांधी जी पर सख्ती करने की सोच रहे थे। प्रेमचंद कहानियां और हंस का संपादकीय लिख रहे थे। भारत की आबादी मुझे मिलाकर तैंतीस करोड़ आठ लाख थी। देवी-देवताओं की जो कुल मिलाकर संख्या है, उससे कुछ ज्यादा। विटामिन ए की खोज हुई थी। सबमेरीन पहली बार आर्कटिक सागर में बर्फ के नीचे धंसी थी। चार्ली चौप्लिन अपनी सिटी लाइट्स फिल्म के प्रदर्शन में लगा था। वाल्ट डिजनी ने पहली रंगीन कार्टून फिल्म बनाई थी। स्पेन का राजा अल्फांसो अज्ञातवास को चला गया था। जर्मनी के सारे बैंकों का दिवाला निकल चुका था। ब्रिटिश नेवी में वेतन कम हो रहे थे। कैमरे में लगने वाले फोटो-फ्लैश बल्ब का आविष्कार हुआ था। कुस्तुनतुनिया का नाम बदल कांस्टेटिनोपल हो गया था।

भारत के लोग उन दिनों ऊंचे वैज्ञानिक होने का गर्व जी रहे थे, क्योंकि रामन को नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। उस समय कौन जानता था कि उज्जैन की एक गली में एक बच्चा जन्म ले चुका है, जो पूरी जिंदगी कलम घिसेगा, पर भूल से भी ऐसी चीज नहीं लिखेगा, जो नोबेल पुरस्कार से एक मील दूर से गुजर सके। फिर भी, इतनी हेकड़ी रखेगा कि जन्म-तिथि सिर्फ तीन दिन गलत छपने से डिस्टर्ब हो जाएगा। (26 मई, 1988 को प्रकाशित)

(साई फीचर्स)