जिले भर में श्रद्धाभाव से की गयी गोवर्धन पूजा

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। दीपावली के दूसरे दिन सोमवार को गोवर्धन व अन्नकूट की पूजा जिले भर की गयी। गाय के गोबर से गोवर्धन की प्रतिमा को तैयार कर धूप, दीप, जल, फल, खील बताशे आदि का इस्तेमाल कर महिलाओं ने विधि विधान से पूजा की।

शकुन सनोडिया, शिवानी, यशोदाबाई, कविता, कल्पना, रोहन, अनामिका, महादेव सनोडिया ने बताया कि सुबह से ही घर के मवेशी के गोबर को एकत्रित कर घर के आँगन में सजाकर पूजा पाठ की गयी।

पं.राघवेन्द्र शास्त्री ने बताया कि देवराज इन्द्र का अभिमान चूर करने के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने एक लीला रची। उन्होंने जब देखा कि एक दिन सभी ब्रजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं और किसी पूजा की तैयारी में जुटे हैं तो उन्होंने यशोदा माँ से पूछा कि आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं।

इस पर माता यशोदा ने बताया कि सब देवराज इन्द्र की पूजा के लिये अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने फिर पूछा कि इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं। माता ने बताया कि वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है और गायों को चारा मिलता है। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा ऐसा है तो सबको गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिये क्योंकि हमारी गायें वहंीं चरती हैं और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते हैं।

पूजा न करने पर इन्द्र क्रोधित भी होते हैं अतः ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिये। उनकी बात मानकर सभी ब्रजवासियों ने इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और प्रलय के समान मूसलाधार वर्षा आरंभ कर दी, तब ब्रज ने लोगों के कष्ट को देखकर कृष्ण ने विराट रूप धारण करके कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछड़े समेत शरण दी।

इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित और ज्यादा तेजी से जल बरसाने लगे। ऐसे में इन्द्र का मान मर्दन करने के लिये श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि वह पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियंत्रित करें और शेषनाग से कहा कि वे मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें।

सात दिन तक लगातार वर्षा करने पर इंद्र को कृष्ण की शक्ति का अहसास हुआ और वे ब्रह्माजी के पास पहुँचे जिन्होंने बताया कि कृष्ण भगवान विष्णु के साक्षात अंश और पूर्ण पुरुषोत्तम नारायण है। यह सुनकर लज्जित इन्द्र ने मुरलीधर से क्षमा माँग कर उनकी पूजा कर उन्हें भोग लगाया, तब से ही गोवर्धन पूजा की जाने लगी।