जागो क्योंकि नींद शर्त नहीं ख्वाब देखने की

 

 

 

(सुधीर मिश्र)

बख्श लाइलपुरी का शेर है

हमारे ख्वाब चोरी हो गए हैं!

हमें रातों को नींद आती नहीं है!!

शायर का हाल तो शायर जाने। लखनऊ में तो आजकल सब्जीवालों को भी नींद नहीं आती। मंटू सब्जीवाले बता रहे थे- भइया पहले तो रात में सब्जियां ढककर आराम से सो जाते थे। अब एक आदमी रातभर चौकीदारी करता है कि कहीं कोई प्याज टमाटर के बोरे न चुरा ले जाए। उनका डर बेजा नहीं है। सब्जी की एक आढ़त से टमाटर, प्याज और महंगी सब्जियों के बोरे चोरी हुए हैं। अब बेचारे ने कोई जूलरी का शोरूम तो खोल नहीं रखा है कि सीसीटीवी लगाए रहता। पता ही नहीं चल पाया कि टमाटर, प्याज आखिर किसने चुराया? वैसे कैमरा लगा भी होता तो सही चोर या हत्यारा पकड़ लिया जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं।

कैमरों ने तो जैसे ठान रखी है कि चोरों को नहीं, पुलिसवालों को पकड़ेंगे। पहले बड़ी आसानी से किसी भी निर्दाेष को पकड़कर चरस, स्मैक की पुड़िया या चाकू लगाकर मुकदमा दर्ज कर देते थे। अब भी बहुत से पुलिसवालों की आदत छूटी नहीं है। पास के जिले से एक ऐसा ही विडियो आया। हवालात में बंद आदमी कह रहा था कि साहब पैसा नहीं है, कहां से दें। दरोगा साहब एक सिपाही से बोले कि फिर एक पुड़िया स्मैक लगाकर इसे जेल भेज दो। विडियो आया तो दरोगाजी नप गए। एक रिटायर्ड डेप्युलटी एसपी रोज मॉर्निंग वॉक पर मिल जाते हैं। उनको छेड़ा तो कहने लगे कि चोर कौन नहीं है। सामने से आ रहे एक बुजुर्ग की ओर इशारा करते हुए बोले- शर्माजी को जानते हैं, राजस्व विभाग से रिटायर हुए हैं। दिव्यांगता का नकली प्रमाणपत्र बनवाए हुए हैं। कल ही झांसी से आए हैं, प्रमाणपत्र का फायदा उठाकर। डेप्युपटी साहब ने जब उनसे कहा कि भाई आप तो भले चंगे हो, फिर दिव्यांगता प्रमाणपत्र क्यों? शर्माजी ने हंसते हुए कहा कि अरे, एक बार चोट लगी थी तो बनवा लिया था। फायदा अब तक मिल रहा है, इसमें बुराई क्या है? शर्माजी समझने को तैयार नहीं कि वह एक असली दिव्यांग का हक चुरा रहे हैं।

आप समझ सकते हैं कि हमारे देश में कितनी और किस तरह की भूख है। कोई टमाटर, प्याज चुरा रहा है तो कोई दिव्यांग के हिस्से की सुविधाएं। कोई धनी गरीब के हिस्से का मकान खाए जा रहा है। कोई पुलिसवाला इतना भूखा है कि रिश्वत न मिलने पर स्मैक का आरोप लगाकर निर्दाेष को जेल भेज देता है। नारकोटिक्स से जुड़े मामलों में जेल जाने का मतलब पूरी जिंदगी तबाह होना होता है। खैर, क्या करें, थानेदार साहब और राजस्व महकमे के रिटायर्ड बाबूजी। उनकी परेशानियां और भूख ही इतनी है कि वह मिटती नहीं। शायद ऐसी ही जमात की वजह से भूखों की दुनिया में भारत अव्वल है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय हंगर इंडेक्स के आंकड़े आए हैं। भारत 102वें नंबर पर है। हमसे अच्छी हालत बांग्लादेश और पाकिस्तान की है। खुशियों के इंडेक्स में भी हमारी गिनती दुनिया के सबसे ज्यादा परेशान लोगों में होती है। वजह, शायद यही है कि हमें दूसरों की भूख की कोई फिक्र नहीं है। भूख के यह आंकड़े कतई झूठे नहीं हैं। आप कभी एक भंडारा करके देख लीजिए। पूरी-सब्जी के दोने पकड़ने वाले गरीब की आंखों में झांककर देखिए। आपको नजर आएगा कि हकीकत में भूख क्या होती है। टमाटर और प्याज चुराने वाले आखिर कौन हो सकते हैं? थोड़ा सोचेंगे तो समझ जाएंगे, जिस देश का वित्त मंत्री रहा नेता जेल में बंद हो, वहां की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति की ईमानदारी आसानी से समझ आ सकती है। यकीनन, भ्रष्टाचार के आंकड़ों में भी हमारी हालत भूख और खुशहाली के बुरे हाल जैसी ही होगी। लिहाजा जागते रहिए, सबका जागना जरूरी है। बुजुर्ग कहते थे कि जो जागत है-वो पावत, जो सोवत है-वो खोवत है। तो जागिए, इरफान सिद्दीकी के इस शेर को समझते हुए-

उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए!

कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए!!

(साई फीचर्स)