नर्व सेंटर की तरह से थे मनमोहन सरल

 

 

(विजय कुमार)

काला घोड़ा के आर्टिस्ट सेंटर के बंद होने की खबर आई है। एडोर हाउस की पहली मंजिल पर उस ऐतिहासिक कलाकेंद्र को शीघ्र ही बेदखल कर दिया जाएगा। कोर्ट का नोटिस आ गया है। हमारे समय में शायद अब कला और संस्कृति की शोकांतिकाएं लिखते जाने का काम ही रह गया है। यह आर्टिस्ट सेंटर जहां साठ के दशक में बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स आंदोलन का जन्म हुआ था, जहां से मकबूल फिदा हुसैन, सैयद हैदर रजा, के.एच. आरा, फ्रांसिस न्यूटन सूजा, सदानंद बाकरे जैसे कलाकार उठे और देखते ही देखते भारतीय आधुनिक कला के आसमान के जगमगाते सितारे बन गए। वह कला केंद्र अब शीघ्र ही अतीत की एक गाथा बन जाएगा। आर्टिस्ट सेंटर एक और तरह से भी हमारी यादों से जुड़ा हुआ है। 70 के दशक में विश्वनाथ सचदेव और सतीश वर्मा यहां छकड़ा संस्था की मासिक काव्य गोष्ठियां आयोजित करते थे। वह एक छोटी सी अंतरंग साहित्यिक मंडली थी। आर्ट गैलरी के संचालक प्रख्यात आर्टिस्ट के.एच. आरा भी हम लोगों के बीच आकर बैठ जाते थे और वे भी टूटी-फूटी हिंदी में लिखी अपनी कुछ कविताएं सुनाने लगते थे। मुझे याद आता है कि इसी आर्टिस्ट सेंटर की गैलरी में कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के निधन पर छकड़ा की एक स्मृति सभा हुई थी और उसमें धर्मवीर भारती ने सर्वेश्वर और नई कविता युग के दिनों से जुड़े इलाहाबाद के अपने कुछ रोचक संस्मरण सुनाए थे। स्वयं सतीश वर्मा के आकस्मिक निधन पर इसी जगह एक शोक सभा हुई थी।

शहर के वरिष्ठतम पत्रकार और प्रख्यात कला समीक्षक मनमोहन सरल जी आर्टिस्ट सेंटर के बंद होने की खबर पर प्रोग्रेसिव कलाकारों से जुड़ी अपनी पुरानी यादों में खो गए। सरल जी की पुस्तक कलाक्षेत्रे समकालीन भारतीय कला पर एक अनूठा दस्तावेज है। हुसैन, रजा, हेब्बार, बी.विट्ठल, जहांगीर सबावाला, नलिनी मलानी जैसी समकालीन कला की अनेक शिखर प्रतिभाओं से सरल जी के बहुत आत्मीय सबंध रहे हैं और इसी आधार पर साठ के दशक में हिंदी के सामान्य पाठक को पहली बार भारतीय आधुनिक कला का एक अंतरंग परिचय मिला था। वे आधुनिक भारतीय कला पर लिखने वाले हिंदी के पहले समीक्षक हैं। धर्मयुग जैसी पत्रिका की इस संबंध में एक युगांतरकारी भूमिका थी। उन दिनों यहां आर्टिस्ट सेंटर, चेतना, जहांगीर, पंडोल और सिमरोजा आर्ट गैलरी भारतीय आधुनिक कला के नर्व सेंटर की तरह से थे और हिंदी पाठक को आधुनिक कला बोध से परिचित कराने और उसे संस्कारित करने में मनमोहन सरल की एक महत्वपर्ू्ण भूमिका रही है।

साठ के दशक में सरल जी ने धर्मयुग में कला पर अपना पहला ही लेख मकबूल फिदा हुसैन पर लिखा था। वह लिखते हैं, हुसैन का कैनवास अब बहुत बड़ा हो गया है। वह एक कलाकार नहीं, अब एक ब्रांड बन चुके हैं। वह आदमी जो एक वक्त बाजारवाद के खिलाफ था, अब कमोडिटी में बदल चुका है। सरल जी अपने इस लेख में किंवदंती बन चुके कलाकार हुसैन के मुंबई शहर से जुड़े उन शुरुआती संबंधों को भी दर्ज करते हैं, जब किसी समय हुसैन सिनेमा के होर्डिंग बनाया करते थे और बदर बाग की एक संकरी-सी गली में सुलेमानी बिल्डिंग की दस बाइ दस फुट के कमरे में रहते थे। एक मामूली बोहरा मुस्लिम खानदान में जन्मे हुसैन के पिता इंदौर की मालवा टेक्सटाइल मिल में टाइमकीपर थे और हुसैन के दादा की पंढरपुर में लोहार की एक मामूली सी दुकान थी, जिसमें वह तेल से जलने वाली लालटेनें दुरुस्त किया करते थे। बालक मकबूल फिदा हुसैन मोहर्रम पर निकलने वाले जुलूस में सजे सजाए घोड़े दुलदुल को बहुत गौर से देखा करता था और और वह दुलदुल घोड़ा उनके अश्व चित्रों की प्रेरणा बन गया। महत्वपूर्ण यह है कि सरल जी हुसैन की बाद की प्रसिद्धि, प्रचंड सफलता, प्रदर्शनप्रियता, सनक के किस्सों और बाजार के एक चतुर खिलाड़ी होने के पीछे छिप गए उनके किसी दूसरे चेहरे को खोज रहे हैं। वह लिखते हैं, जब हुसैन का इतना विशाल और पायेदार काम सामने आता है, तो मानना पड़ता है कि अपनी तमाम सनकों और बेफिक्र जीवन शैली के बावजूद यह आदमी अपने काम के प्रति बेहद संजीदा है।

एक कलाकार के जीवन का विकास कितने सारे प्रभावों से होकर गुजरता है। इस पुस्तक में प्रख्यात कलाकार सैयद हैदर रजा सरल जी के साथ एक दुर्लभ और लंबी अंतरंग बातचीत में मध्यप्रदेश के बावरिया गांव में बीते अपने बचपन, किशोरावस्था की दमोह की स्मृतियों, सतपुड़ा के चट्टानों के स्पर्श और नर्मदा के जल की अनुभूतियों को याद कर रहे हैं। रजा साहब की हिंदी माध्यम में हुई शिक्षा-दीक्षा, युवावस्था में बंबई के दिनों के उनके उस कठिन संघर्ष और लंबे समय तक पेरिस प्रवास की स्मृतियों में विमर्श के अनेक बिंदु उभरते हैं। रजा का पारिवारिक मुस्लिम परिवेश, स्कूल में रामायण के दोहों और चौपाइयां से जुड़ी हिंदू पृष्ठभूमि की चेतना और फ्रांस में एक ईसाई जीवनसंगिनी के साथ बीते समय तथा कलाबोध में लैंडस्केप चित्रों से बिंदु के अमूर्तन तक की जो यात्रा है, उसमें अनेक बेहद दिलचस्प बातें सामने आती हैं। उनका यह कहना कितना प्रासंगिक और महत्वपूर्ण लगता है कि तीन धर्मों की विचारधाराएं उन्हें मिलीं और धर्म का अर्थ कर्मकांड और रूढियों में नहीं, उसके सार तत्व में है। इसी सार तत्व को वह अपनी कला में रचते रहे हैं।

सरल जी ने अपने इस कला विवेचन में इस शहर में विकसित हुए अलग-अलग स्वभाव और रुझानों वाले कलाकारों से हमारा अंतरंग परिचय करवाया है। एक ओर जहांगीर सबावाला जैसा कलाकार है, उसकी समृद्ध पृष्ठभूमि, गहन अंतर्मुखी स्वभाव, उनके चित्रों के सघन वातावरण में घुलती हुई आकृतियां, पेड़, पहाड़, पक्षी, एक पारसी अध्यात्म और सूफी रहस्यवाद है, तो दूसरी ओर शिल्पकार-चित्रकार बी. विट्ठल का उथल- पुथल से भरा जीवन है, जब वह बालक सिनेमा ऐक्टर बनने 10 वर्ष की उम्र में घर से भाग कर इस शहर में आया था। उसका बिना पैसों, शिक्षा और साधन के दादर रेलवे स्टेशन पर उतरना, भूख, गरीबी, अपमान, तिरस्कार, फुटपाथों पर बीता बचपन, गुमटी पर चाय बेचना, घरेलू नौकर का काम करना और इस सबके बावजूद कला का एक अनोखा जुनून। और वह बालक एक दिन इस देश का एक महान कलाकार बनता है। अपने काल बोध, सामाजिक सरोकारों और आकृति मूलक चित्रों के लिए हमारे समय की शिखर कलाकार नलिनी मालानी के बारे में सरल जी द्वारा दी गई यह दुर्लभ जानकारी कि साठ के दशक में वह अपने संघर्ष के दिनों में धर्मयुग, सारिका तथा टाइम्स ऑफ इंडिया के अन्य प्रकाशनों के कार्यालयों में सकुचाते हुए आया करती थी कि उन्हें कहानियों-कविताओं के लिए चित्र बनाने का कुछ काम मिल जाए, बेहद दिलचस्प है।

ऐसे दर्जनों कलाकारों ने इस शहर में कला के एक अनोखे आधुनिक युग को रचा। आजादी के बाद का वह दौर जैसे बीत गया। तब कला को बाजार, बिचौलियों, नीलामी और कारपोरेट संस्कृति ने नहीं निगल नहीं लिया था, जैसी स्थिति आज है। पुरानी आर्ट गैलरियां समाप्त हो रही हैं। मुद्रित शब्द, उसकी भूमिका, कला समीक्षा और नए रसिक को संस्कारित करने की वे बातें भी आज जैसे समाप्त हो गई हैं। सरल जी बोलते-बोलते देर तक खामोश हो जाते हैं।

(साई फीचर्स)