लाउडस्पीकर नहीं होगा तो ऊपरवाला नहीं सुनेगा?

 

 

(सुधीर मिश्र)

हरिओम शरण भी क्या सुरीला भजन गाते थे। शब्द और भाव सीधे दिल में उतर जाते थे. . .

मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तुम्हारे आऊं . . .

सच कहूं चादर तो मैली नहीं थी पर मन जरूर मैला हो रहा था। निगम साहब उलाहना दे रहे थे कि आप रात में देवी जागरण में आए नहीं। मन मसोस कर नकली-सी मुस्कुराहट के साथ ही-ही करते हुए कहा कि देर से आया था, नींद आ गई। निगम साहब बोले, हां समझ सकता हूं दिनभर के थके होंगे। मन में उठ रहे गुस्से के उबार में से आवाज निकली- इतना ही खयाल था तो रातभर स्टीरियो साउंड पर लाउडस्पीकर क्यों बजाया? रातभर सिर्फ अपने ही घरवाले नहीं, आस-पड़ोस के लोग भी गुलाबी ठंड में पंखा चलाकर रजाई ओढ़कर पिछले कमरों में सोए। पंखों की आवाज से देवी जागरण का हल्ला कुछ दब रहा था।

रात नौ बजे के करीब जब घर पहुंचा तो रोज जैसी ही खामोशी थी। चार घर छोड़कर निगम साहब के घर पर सजावट थी। सड़क पर तंबू कनात था। खाना खाकर आंख लगी ही थी कि शोर से आंख खुल गई। गाना बज रहा था- मेरा बाबू छैल छबीला मैं तो नाचूंगी. . .। नींद में था तब यही सुनाई दिया। बाद में ध्यान दिया तो धुन वही थी, बोल यह थे- मां मुरादे पूरी कर दे हलुआ बांटूंगी. . .। छत पर जाकर देखा तो माइक पर चढ़ा गवैया विकराल रूप से चीख-चीखकर गा रहा था। अब वह कोई हरिओम शरण या अनूप जलोटा जैसा सुरीला तो था नहीं। उसे तो बस फिल्मी धुनों का सहारा था। ढोलक-मंजीरे वाले युद्ध स्तर पर झम्मक-झम्मक में लगे थे। इस शोर को स्टीरियो साउंड का पूरा सहयोग था। ब्लड प्रेशर की दवा खाकर रात दस बजे सोए पड़ोस के माथुर साहब भी हड़बड़ाकर उठ चुके थे।

निगम साहब के ठीक पड़ोस में रहने वाले वकील साहब ने कान में रुई लगाई और बच्चों को लेकर पीछे वाले कमरे में चले गए, जहां वह मेहमानों को सुलाते थे। आमतौर पर देर रात ऐसा शोर होने पर डायल-100 पर कॉल करके मैं पुलिस बुला लेता था। अब चूंकि निगम साहब ठहरे भले पड़ोसी, फिर डायल-100 भी डायल-112 हो गया था। दिल में ख्यावल आया कि नए इमरजेंसी नंबर की बोहनी पड़ोसी के लिए तो नहीं ही करनी चाहिए। लिहाजा, पीछे वाले कमरे में गया, तेज पंखा चलाया, एसी भी ऑन कर दिया। कुछ शोर कम हुआ और लिहाफ लेकर सोने की जुगत में लग गया। सुबह आंख खुली तो अरदास चल रही थी। बीस रुपइये की अरदास मुन्नू की दादी की अरदास, पचास रुपइये की अरदास फुग्गन भैया की अरदास। लगा कि अब लाउडस्पीकर बंद होने वाला है। धर्म-कर्म, आस्था, पर्यावरण और प्रदूषण पर अक्सर बहस करने वाले बच्चे भी जाग चुके थे। रातभर पड़ी नींद में खलल के बाद वे मुझे यूं घूर रहे थे कि लाउडस्पीकर का आविष्कार मानो मैंने ही किया हो।

खैर, तब तक जागरण खत्म हो चुका था। गवैया पंडितजी के साथ अब प्राणियों में सद्घ्भावना और विश्व के कल्याण का उद्घ्घोष कर रहा था। याद आया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर चलाना प्रतिबंधित है। पुलिस चाहे तो कार्रवाई कर सकती है पर फिलहाल संपूर्ण प्राणि जगत ऐसी ही सद्घ्भावना से ओत-प्रोत है। विश्व का कल्याण भी इसी तरह की मनमानी से हो रहा है। शहरों में सांस लेना मुश्किल हो रहा है। ध्वनि प्रदूषण लोगों को बहरा कर रहा है। फिर भी आस्था है कि बिना लाउडस्पीकर जागती ही नहीं। कीर्तन हो या तकरीर। लाउडस्पीकर के बिना होते ही नहीं। यूरोप-अमेरिका में हिंदू-मुसलमान दोनों हैं। मंदिर, मस्जिद भी हैं पर कहीं लाउडस्पीकर नहीं हैं। वहां भी भगवान और अल्लाह अपने भक्तों की सुनते हैं। अच्छे-खासे खाते-पीते लोग हैं। इधर जाने क्यों बिना लाउडस्पीकर के लोग अपनी आवाज ऊपर वाले तक पहुंचा ही नहीं पाते। यह हालात देखकर तो नासिर काज़मी का यह शेर ही याद आता है-

ओ मेरे मसरूफ़ ख़ुदा!

अपनी दुनिया देख ज़रा!!

(साई फीचर्स)