अमेरिकी मूलनिवासियों की कभी कोई पहचान होगी?

 

 

(चंद्रभूषण)

एक वेब सीरीज देखते हुए मेरा ध्यान इसमें दिखी अमेरिका की स्थानीय रेड इंडियन आबादी की मौजूदा हालत की तरफ गया। इस सीरीज में बड़े ड्रग डीलर के रूप में दिखाए गए साइकोपैथ कैरक्टर टुको का रोल रेमंड क्रूज ने किया है जो मैक्सिकन मूल के हैं। उत्सुकतावश पढ़ना शुरू किया तो पता चला कि सीरीज में निभाया गया उनका चरित्र अमेरिका के मूल निवासियों की मौजूदा स्थिति का अच्छा प्रतिनिधित्व करता है। यह हमारी समस्या है कि रेड इंडियन लोगों की छवि हमारी नजर में आज भी माथे पर बांधी गई पट्टी में पंख खोंसे हुए नारंगी सी चमड़ी वाली गाती-नाचती कबीलाई शिकारी जाति की है।

हकीकत में यह जाति अमेरिका की सबसे ज्यादा बिखरी हुई, उपेक्षित, बीमार, गरीब और मुख्यधारा से कटा-छंटा समुदाय है। इस महीने (नवंबर 2019) को अमेरिका में इसी इंडियन समुदाय के लिए समर्पित करके मनाया जा रहा है क्योंकि इस समुदाय के साथ अमेरिकी हुकूमत के एक महत्वपूर्ण समझौते को 50 साल पूरे हो रहे हैं लेकिन यह सचमुच विचित्र है कि अमेरिका के दोनों बड़े अल्पसंख्यकों- अश्वेत आबादी और स्पेनी-पुर्तगाली भाषी हिस्पैनिक समुदाय की तुलना में अमेरिका के मूल निवासियों की हालत बहुत खराब है। देश में आज तक उनकी कोई पहचान भी नहीं बन पाई है। अमेरिका की तुलना में इन मूल अमेरिकी जातियों की स्थिति मैक्सिको और उससे दक्षिण के तमाम लैटिन अमेरिकी मुल्कों में कहीं बेहतर है।

आबादी के आंकड़ों पर नजर डालें तो अमेरिकन इंडियन समुदाय अपने शुद्ध नस्ली रूप में अमेरिका की कुल आबादी का मात्र 0.9 फीसदी है जबकि इसमें मिश्रित नस्ल वाले अमेरिकन इंडियन भी शामिल कर लिए जाएं तो उनका हिस्सा 1.6 फीसदी हो जाता है। उनकी ज्यादातर आबादी पहले दक्षिणी-पूर्वी अमेरिका में बसती थी लेकिन पांच सौ साल पहले यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने अमेरिका पर अपना कब्जा जमाना शुरू किया तो या तो उन्हें घेरकर मार डाला या उजाड़कर ऐसे बंजर इलाकों में धकेल दिया, जहां उनका बड़ा हिस्सा भूख और बीमारियों का शिकार होकर मर गया। ऐसे में अपनी स्वाभाविक स्थिति में ज्यादातर अमेरिकन इंडियन कबीले अभी पश्चिमी-उत्तरी अमेरिका या फिर कनाडा से भी उत्तर अलास्का में रहते हैं।

अजीब विडंबना है कि अमेरिकी सत्ता व्यवस्था ने अमेरिकन इंडियनों की पहचान बचाने के नाम पर अमेरिका के भीतर ही इनके छोटे-छोटे इलाके बनाकर इन्हें देश का नाम दे दिया और इनके पढ़ने-लिखने, कमाने-धमाने और इलाज वगैरह की कोई व्यवस्था नहीं की। लिहाजा बड़ी-बड़ी बंजर जमीनें अपने नाम पर होने के बावजूद तीन चौथाई अमेरिकी इंडियन बड़े शहरों के झोपड़पट्टीनुमा इलाकों में रहते हैं और किसी भी कौशल के अभाव में अक्सर सिर्फ गुजारा करने के लिए ड्रग्स और अपराध के धंधों में फंस जाते हैं। अश्वेत आबादी को मुख्यधारा में लाने के नाम पर अमेरिकी सत्ताधारी वर्ग ने उन्हें खेल और मनोरंजन उद्योग में पर्याप्त जगह दी लेकिन संख्या कम होने और बड़ा ग्रुप न बना पाने के चलते अमेरिकी मूलनिवासियों को ऐसे मौके भी नहीं मिल पाए। अब देखना होगा कि उनके नाम पर महीना समर्पित होना उनका कितना भला कर पाता है।

(साई फीचर्स)