जेएनयू को ऐसे खत्म करना महापाप!

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    (श्रुति व्यास) 

    दो साल पहले की बात है। मैंने घर के लिए उबर ली थी। पूरे रास्ते ड्राइवर चुप और उदासीन बैठा रहा। मुझे एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि उससे बात कर रोजमर्रा के जीवन पर उससे कुछ जाना जाए। लेकिन वसंत विहार की ओर जाने वाली सड़क के ठीक दायीं ओर पहुंचते ही वह चिल्लाता हुआ सा बोला- ये देशद्रोही यूनिवर्सिटी है, जिसको बंद कर देना चाहिए। उसका इशारा जेएनयू की ओर था और गुस्से से उसकी भौंहें तमतमा रही थीं। उसके तेवर देख कर लग रहा था कि वह बस गाड़ी की सीट से कूद कर अपने गुस्से से यूनिवर्सिटी को फूंक डालेगा।

    संदेह नहीं 1969 में संसदीय कानून से स्थापना के बाद से जेएनयू का इतिहास उतार-चढ़ाव वाला रहा है। वहां कई बार अशांति और गुस्से के तेवरों वाला माहौल बना। लेकिन 2016 के टुकड़े-टुकड़े के नारे वाले घटनाक्रम के बाद भारत का यह सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय लगातार खुद सुलग रहा है तो लोग भी सुलगे हुए हैं और सभी के निशाने में लगातार है। इस सबको देख कर लगता है कि यह विश्वविद्यालय अपनी साख-धाक-धमक-चमक, गरिमा सब खो बैठा है। इस विश्वविद्यालय को ले कर जिस तरह की सुर्खियां है, धारणाएं हैं, अनदेखी है, उस पर सोशल मीडिया पर जहां जमकर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, वही कई लोग चिंता में हैं कि सरकारी पैसे से चलने वाले इस विश्वविद्यालय का स्तर तेजी से गिरता जा रहा है और संस्थान का कोई मतलब नहीं रहा है। इसके राष्ट्रविरोधी होने की बात को जैसे मुद्दा बना कर भावनाएं भड़काई गई हैं या भड़काई जा रही हैं और कैंपस के शैक्षिक माहौल में जैसी बेचौनी और टकराव है उससे यह धारणा बन रही है कि यह विश्वविद्यालय अब वह सब गंवा चुका है जिससे उसका कभी नाम था, और जिसकी घुट्टी ने एक वह छात्र भी बनाया जिसने बहुत कम उम्र में अर्थशास्त्र का नोबेल सम्मान पाया।

    भला भारत में कौन सा और दूसरा विश्वविद्यालय है जिसने आधे दशक की अवधि में ही नोबेल सम्मान प्राप्त छात्र दिया तो वैश्विक पैमाने के कई समाजशास्त्री और असंख्य नौकरशाह भी पैदा किए!

    हकीकत है कि भारत में हमें जन्म से ही सवाल नहीं करने और लक्ष्मण रेखा नहीं लांघने के बारे में सिखाया जाता है। हम यह भरोसा करने को मजबूर हैं कि जो कुछ हमने किताबों में पढ़ा है या पढ़ते हैं वही सही है, शिक्षक हमेशा सही होते हैं, और हमें सवाल करने की कोई अनुमति नहीं है। हम तो सिर्फ यह भरोसा करने के लिए हैं कि जो हमसे बड़े जानते हैं वही सही और सर्वश्रेष्ठ है और इसलिए जब कभी हम कोई चुनौती देने या विवाद खड़ा करने का साहस करते हैं तो चुप करा दिए जाते हैं। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूं कि जब मैं अपनी उच्च शिक्षा के लिए विदेश गई थी तो वहां मैं यह देख कर हैरत में पड़ गई थी कि अरे, यहां सवाल करने की इतनी खुली छूट! तब मुझे लगा था कि जिस बंद माहौल में हम रहते हैं वहां तो सवाल पूछना अपराध है, जबकि सवाल करना, सवाल उठाना शैक्षिक-बौद्धिक विकास की बुनियादी जरूरत है और उसी से व्यक्ति विशेष का बुद्धि विकास मौलिक और सच्चा बनता है।

    एक ऐसे मुल्क में (भारत में) बड़ा होना जहां आलोचनात्मक सोच रखने का मतलब किसी के गुस्से का शिकार होना होता है, वहां कुछ अलग सोच पाना शुरू से मुश्किल है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मेरे पास सवाल करने की शक्ति है, मेरे सवाल कठोर हो सकते हैं, परेशानी पैदा कर सकते हैं, अलग हट कर सोचने की क्षमता सुर्खियां भी बन सकती है तो बड़े गंभीर सवाल भी पैदा कर सकती है, यह सब मुझे विदेश में समझ आया। मेरा सौभाग्य जो मुझे वहां और यहां ऐसा माहौल मिला है जिसमें विचारों की स्वतंत्रता, खुले मस्तिष्क और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तवज्जो दी जाती रही है।

    अब यह बात यदि सेंट एंड्रीयूज विश्वविद्यालय (जो ब्रिटेन में अब नंबर दो,ऑक्सफोर्ड से भी ऊपर है) का सत्व-तत्व है तो ठीक यही बात उस जेएनयू के शैक्षिक माहौल को बनवाने वाली भी है, जिसका अपना वह स्वतंत्र चरित्र है जो इसे देश के दूसरे विश्वविद्यालयों से अलग करता है। जेएनयू परिसर में टिनशेड में चलने वाले ढाबों और दीवारों पर लिखे नारे-विचार, शब्द-चित्र अभिव्यक्ति को नया आयाम देते हैं। आने-जाने, घूमने-फिरने से लेकर अभिव्यक्ति की आजादी जीवन को नया रूप देती है। अरावली की पहाड़ियों में फैला एक हजार एकड़ का यह परिसर छात्रों को हर तरह से मांजने का काम करता है जिसमें संस्कृति से लेकर अनुशासन, राजनीति और बौद्धिकता, वाद-प्रतिवाद, साम्यवाद-मुक्त चिंतन, क्रांति-प्रतिक्रांति जैसे सारे पक्ष शामिल हो जाते हैं। इसलिए जेएनयू वह एक ठिकाना है जो भारत के किसी और परिसर में संभव नहीं है। दिल्ली में मेरे पिताजी की शुरुआत भी जेएनयू से हुई थी। यह वह दौर था जब डीपी त्रिपाठी, करात,सीताराम येचुरी की कम्युनिस्ट टोली जेएनयू को वामपंथ में रंगने का बौद्धिक वर्चस्व लिए हुए थी। जेएनयू में वामपंथ को ठोस आधार मिल चुका था। येचुरी के साथ गंगा होस्टल में आमने-सामने रहने के बावजूद मेरे पिता वाम के लाल रंग में नहीं रंगे और वहां के पुस्तकालय में विदेशी-पत्र-पत्रिकाएं पढ़ते हुए, फ्री थिंकिग में सोवियत संघ-साम्यवाद के पतन का ठोस विश्वास बना खांटी दक्षिणपंथी बने। अपने को वामपंथियों से दूर ही रखा। उस वक्त वे उन कुछ लोगों में से थे जिन्होंने उस लाल लहर को नही माना।

    बावजूद इसके उनको मैंने डीपीटी, दीक्षित आदि वामपंथी कामरेड दोस्तों के साथ खूब स्वस्थ विचार-विमर्श और बहसें करते देखा।उन्हें न तो कोई अपनी विचारधारा और दृष्टिकोण से विमुख कर पाया और न उन्होने अपने नौकरी के संस्थानों और अपने संस्थान में वामपंथियों को नौकरी देने या उनके विचार-लेख छापने से गुरेज किया। तभी मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी की जिद्द और बहस, सवाल का उनका मिजाज और संस्कार जेएनयू के माहौल की घुट्टी से ही बना होगा। होस्टल में रहते हुए उन्होने वामपंथी एसपी सिंह की रविवार पत्रिका, नेहरूवादी राजेंद्र माथुर के संपादन के नई दुनिया और दक्षिणपंथी दिल्ली प्रेस में बेखटके अपने विचार के साथ विश्व परिक्रमा, परदेश जैसे कॉलम लिखे तो जेएनयू के स्वतंत्र माहौल से ही संभव हो सका होगा।

    और वे आज भी उन चंद पत्रकारों में से हैं जो सत्ता के खिलाफ सवाल खड़े कर रहे हैं, उसके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और बता रहे हैं कि दक्षिणपंथी क्या गलत कर रहे हैं।

    तभी हकीकत बनती है कि जेएनयू के शैक्षिक माहौल में सवाल-विचार-बौद्धिक विमर्शसे पांच दशक में जेएनयू ने देश के लिए जितने विचारक, राजनीतिबाज, पत्रकार, नेता, नौकरशाह, शिक्षाविद, वैज्ञानिक बने हैं उतने भारत के किसी दूसरे विश्वविद्यालय ने पचास सालों में नहीं दिए है। हाल में अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता अभिजित बनर्जी भी 1981-83 के दौरान यहीं के छात्र रहे हैं और उन्होंने सेंटर फॉर द इकॉनोमिक स्टडीज एंड प्लानिंग से एमए किया था। देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इसी विश्वविद्यालय में पढ़े हैं। जयशंकर तो अपने यहां के छात्र जीवन को जीवन का सबसे प्रभावकारी वक्त बताते हैं। उऩके अनुसार जेएनयू ने ही उनके बौद्धिक नजरिए को व्यापक आकार दिया और यही अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बारे में उनकी दिलचस्पी बनी। वे कहते भी हैं कि जो आपको यहां पढ़ाया जाता है, उस पर आप विचार करते हैं और बात करते हैं।

    इसलिए इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि जेएनयू सोच-विचार की क्षमता पैदा करने वाला सच्चा शैक्षिक ठिकाना है। मैं कतई जेएनयू में होने वाली हालिया गतिविधियों और कार्रवाईयों को जायज ठहराने की कोशिश नहीं कर रही हूं। इस विश्वविद्यालय की वजह से अगर देश को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है, अगर सही बात की आलोचना हो रही है, या उस पर शोर हो रहा है (जैसे अफजल गुरु की फांसी) और गलत बात पर खुशियां मनाई जा रही हैं (भीड़ को संबोधित करने के लिए अलगाववादियों को न्योतना), अगर हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया जा रहा है, य़ा माओवादियों या बुरहान वानी जैसे आतंकियों को नायक के रूप में पेश किया जा रहा है तो निश्चित ही ऐसा होना विचार की स्वतंत्रता में विकृत हठधर्मिता है। इसके खिलाफ कार्रवाई होना कतई गलत नहीं है।

    लेकिन चंद मुट्ठीभर लोगों की वजह से यदि जेएनयू को भारत के सैकेड़ों विश्वविद्यालयों की भीड़ वाला एक बनाना भी ठिक नहीं है। संघ, भाजपा, दक्षिणपंथी हिंदूवादी विचारवानों की आज सत्ता है तो इनमें यह बौद्धिक बल, समझ होनी चाहिए जो जवाहरलाल के आगे ये अपने दीनदयाल के नाम से वह विश्विद्याल बनाए या जेएनयू को ही दक्षिणपंथी बौद्धिक उर्वरता में ऐसे बदले जिससे दुनिया में लेफ्ट के बजाय राइट का डेन, बौद्धिक ठिकाना बने। जेएनयू को खत्म करने से क्या बनेगा? उसे या तो नई चुनौतियों में बदले या उसके साथ उसके समानांतर मोदी सरकार अपना ऐसा एक विश्वविद्यालय बनाए जो राष्ट्रवादी-स्वदेशी विचारों में अपने ऐसे अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री याकि सवाल-विचार का वह शैक्षिक माहौल बनाए जिसकी प्रतिष्ठा जेएनयू से भी ऊंची हो।

    जेएनयू को खत्म करने, उसे चौराहे पर खड़ा कर हर तरह से प्रताडित करना दुखदायी है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जेएनयू उस चौराहे पर खड़ा है जहां उसका मूल अस्तित्व बचना नहीं है। यह शिक्षण संस्थान आगे अभिजित बनर्जी या निर्मला सीतारमण जैसे और विद्वान पैदा नहीं कर पाएगा। छात्रों की शैक्षणिक फीस बढ़ा देना, हॉस्टल फीस बढ़ा देने, इंजीनियरींग और प्रबंधन जैसे कोर्स शुरू करने के फैसले छोटे-छोटे है लेकिन ये फैसले जेएनयू को दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया, माखनलाल, बरकततुल्ला विश्वविद्यालय की लीक पर ला खड़ा करने वाले होंगे।

    (साई फीचर्स)

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