अतिक्रमण के लिये जनता से ज्यादा दोषी है तंत्र!

 

 

दशकों से की गयी अनदेखी के चलते पूरी तरह फैल चुका था अतिक्रमण का कैंसर

(सादिक खान)

सिवनी (साई)। सिवनी शहर में अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत जिस तरह से निर्माण को तोड़ा जा रहा है उसके बाद शहर में एक चर्चा तेज हो गयी है कि इस पूरे मामले में जन और तंत्र में ज्यादा दोष किसका है। लोगों का मानना है कि जन का तो दोष है ही पर तंत्र इसमें ज्यादा दोषी है।

शहर भर में हटाये गये अतिक्रमणों के कारण शहर का स्वरूप वर्तमान में कुछ भद्दा अवश्य नज़र आ रहा है पर इसे संवरने में कुछ समय लग सकता है। इसे जब पूरी तरह संवार दिया जायेगा तो निश्चित तौर पर एक बेहतर सिवनी शहर लोगों के सामने उभरकर सामने आ सकता है।

सर्दी का आगाज़ हो चुका है। इस मौसम में सड़क किनारे दुकान लगाने और वहीं निवास करने वाले लोगों के हाल बुरे हो सकते हैं। शहर में चल रहीं चर्चाओं के अनुसार इस श्रेणी के लोगों को रात बिताने के लिये सुरक्षित इंतज़ाम की पहल सियासी दलों के नुमाईंदों को करना चाहिये पर सिवनी में देश – प्रदेश के मसलों पर नेतागिरी करने वाले नुमाईंदों के भिंचे जबड़े अब तक इस मामले में खुल नहीं पाये हैं।

वहीं, प्रशासनिक सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि सड़क किनारे खुले में रात गुज़ारने पर मजबूर हो रहे परिवारों में से अनेक परिवार ऐसे भी हैं, जिनके द्वारा पूर्व में भी अतिक्रमण हटाये जाने के दौरान अन्य स्थान पर भूखण्ड लिया जा चुका है। इसके बाद भी वे पुराने स्थान पर ही अस्थायी व्यवस्था करके, वहाँ काबिज़ थे।

सोमवार को अतिक्रमण हटाये जाने की कार्यवाही भैरोगंज में आरंभ हुई। भैरोगंज में भी लगभग आधा शहर इस अभियान को देखने उमड़ पड़ा। लोगों के बीच इस दौरान यही चर्चा चलती रही कि आखिर इस तरह के बेतहाशा अतिक्रमण को रातों रात तो किया नहीं गया होगा। इसके लिये जिम्मेदार कौन है?

लोगों का कहना है कि प्रशासन की कार्यवाही का तो शहर के नागरिक स्वागत कर रहे हैं पर इस तरह के अतिक्रमण को अंज़ाम देने के लिये अतिक्रमणकारी तो दोषी हैं ही पर उनसे ज्यादा दोष प्रशासनिक तंत्र का भी है। प्रशासनिक तंत्र की यह नैतिक जवाबदेही है कि वह अतिक्रमण को रोके।

लोगों का कहना है कि इसके पहले जब भी अतिक्रमण हटाये जाने की कार्यवाही की जाती थी तब सियासी नुमाईंदों के द्वारा अपनी नेतागिरी चमकाने की गरज़ से प्रशासन पर दबाव बनाकर कार्यवाही को एकाध दिन के बाद ही ठण्डे बस्ते के हवाले करवा दिया जाता रहा है। ज़्यारत नाके पर आज भी अनेक घरों में निशान साफ दिखायी दे जाते हैं।

चर्चाओं के अनुसार शहर में अतिक्रमण को रोकने की जवाबदेही नगर पालिका परिषद की है। पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा दशकों तक आखिर अपनी आँखें कैसे बंद कर रखी गयीं! वार्ड के पार्षदों के द्वारा भी इस मामले में अनदेखी क्यों की गयी?

वहीं, कुछ लोगों का यह आरोप भी था कि शुरूआती दौर में अमले के द्वारा बिना नापज़ोख के ही अतिक्रमणों को तोड़ा गया है। इस संबंध में सरकारी बात कहने के लिये अधिकृत जिला जनसंपर्क कार्यालय के द्वारा भी अब तक प्रशासन का पक्ष स्पष्ट करने से गुरेज़ ही किया गया है।

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