जल्दबाजी में कहीं गलत कदम न उठ जाएं!

(लिमटी खरे)

नागरिकता संशोधन विधेयक का जिन्न जैसे ही बोतल के बाहर आया वैसे ही इस पर बवाल मचना आरंभ हो गया। विपक्षी दलों को मानो बैठे बिठाए एक नायाब मुद्दा मिल गया है, किन्तु विपक्ष की बोथरी तलवार से शायद ही वह इस मामले को भुना पाए। इस मामले की असलियत क्या है इस बात को स्थापित करने में न तो हुक्मरान ही सफल होते दिख रहे हैं और न ही विपक्ष इस संशोधन के बारे में तफ्सील से ही कुछ बता पा रहा है। शोर शराबे के बीच वास्तविकता क्या है! यह बात गुम होती दिख रही है। देखा जाए तो आजादी के दशकों पहले के भारत के अंग जो राष्ट्र हुआ करते थे उनमें से महज पाकिस्तान, बंग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले छः पूजा पद्धतियों को मानने वालों को देश की नागरिकता देने की बात कहना उचित नहीं है, क्योंकि अफगानिस्तान 1947 के पहले भारत का अंग नहीं था। इतना ही नहीं बर्मा और श्रीलंका जो पहले भारत के अंग हुआ करते थे, वहां के इन पूजा पद्धतियों के नागरिकों का शुमार इसमें न करना भी विचारणीय माना जा सकता है, जिस पर विपक्ष मौन दिख रहा है।

इस विधेयक की आग में पूर्वोत्तर के राज्य झुलसते दिख रहे हैं। सरकार को इस बात अंदेशा तो रहा ही होगा कि इस विधेयक के आने के बाद पूर्वोत्तर के राज्यों सहित देश और विदेश के कुछ देशों में इसकी तल्ख प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। इसके लिए केंद्र सरकार ने बाकायदा होमवर्क भी कर रखा होगा। देश के अंदर के विरोध को केंद्र सरकार के द्वारा किस तरह निपटा जाता है यह बात तो समय ही बताएगा पर आसपास के देशों में अगर इसका विरोध तेज हुआ तो उसके शमन के लिए सरकार को पसीना बहाना पड़ सकता है।
केंद्र सरकार अगर चाहती तो इस विधेयक को लाए बिना ही अन्य देशों में कथित तौर पर सताए गए लोगों को देश में आने पर उन्हें नागरिकता दी जा सकती थी। इस विधेयक को लाकर केंद्र सरकार ने अपने भाल पर सांप्रदायिकता का एक टीका लगा लिया है क्योंकि इसमें महज छः पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोगों के लिए ही नागरिकता के मार्ग प्रशस्त किए गए हैं।
यह विधेयक भारत का घरेलू मसला माना जा सकता था, पर तीन देशों के कथित तौर पर सताए गए छः पूजा पद्धतियों के लोगों को देश की नागरिकता देने की बात होने पर अब यह अंतर्राष्ट्रीय मसला बन गया है। इसी बीच जापान के प्रधानमंत्री एवं बंग्लादेश के गृहमंत्री एवं विदेश मंत्री ने भारत यात्रा निरस्त कर दी है। इससे संदेश बहुत अच्छा तो कतई नहीं जा रहा होगा।
इस विधेयक को सामान्य नहीं माना जा सकता है। यह विधेयक बिरले विषयों में से एक पर आधारित माना जा सकता है। इस लिहाज से इस विषय को संसद में रखे जाने के पहले इस पर राष्ट्रीय स्तर पर एक बहस की जरूरत थी। इस विषय पर अगर देशव्यापी विमर्श आरंभ कराया जाता तो इसके लाभ और हानियों से भी लोग परिचित होते। इसके अलावा लोगों के द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर इसका ड्राफ्ट तैयार कराया जाता। तब तक लोगों का गुस्सा भी काफी हद तक शांत हो जाता और उसके बाद अगर विधेयक पेश किया जाता तो इसकी तस्वीर भी कुछ और ही सामने आ सकती थी।
इस विधेयक की आग में सबसे ज्यादा असम ही झुलसता दिख रहा है। असम में सत्ताधारी भाजपा सरकार के लिए यह खतरे की घंटी से कम नहीं है। असम में लोग अपने अपने तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। विरोध करने वाली भीड़ में नब्बे फीसदी लोगों को इस बात का इल्म ही शायद नहीं होगा कि जिस बात के लिए वे नारे लगा रहे हैं उसकी असलियत आखिर है क्या!
पूर्वोत्तर राज्यों से जिस तरह की खबरें आ रहीं हैं उनके अनुसार इन राज्यों में एक बड़ा वर्ग इस बात से भयाक्रांत दिख रहा है कि इस विधेयक के कानून बनने के उपरांत जिन शरणार्थियों को देश की नागरिकता मिलेगी और अगर वे इन राज्यों में बसते हैं तो इससे वहां के मूल लोगों की संस्कृति, भाषा और पहचान आदि बुरी तरह प्रभावित हो जाएगी। यहां तक कि वहां रह रहे लोग भी अल्पसंख्यक हो जाएंगे।
वैसे असम के कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि पूर्वोत्तर राज्यों में अनेक स्थानों पर यह आंदोलन जल्द ही इसलिए कमजोर पड़ जाएगा क्योंकि मिजोरम, मणिपुर, नागालैण्ड मेघालय जैसे राज्यों में यह कानून लागू ही नहीं होगा। वहीं असम राज्य के कार्बी, बोडो, डिमासा जैसे इलाके छटवीं अनुसूची के अंतर्गत चिन्हित होने से इन जगहों पर भी इस कानून का प्रभाव नही पड़ने वाला।
इसके साथ ही भाजपा (विशेषकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह) की नीतियों का बात बात पर माखौल उड़ाने वालों के लिए यह विषय अब पसंदीदा बन चुका है। इस तरह के लोगों का मानना है कि इस सबके पीछे भाजपा की दूर की सोच हो सकती है। 2021 में असम एवं पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों के पहले भाजपा के नीतिनिर्धारकों के द्वारा यह जमावट की गई है।
लोगों का मानना है कि नागरिकता संशोधन बिल के जरिए भाजपा के द्वारा हिन्दू वोट बैंक को एकजुट करने की कवायद की गई है। जानकारों की मानें तो पश्चिम बंगाल में बंग्लादेश से आए प्रवासी हिन्दुओं की तादाद पौन करोड़ (72 लाख) के लगभग है। इनमें ज्यादा तादाद अनुसूचित जाति मतुआ की है, जो इस प्रदेश के तीन जिलों में फैले हुए हैं। इस साल हुए आम चुनावों में भाजपा के द्वारा इन तीन जिलों में अन्य दलों को हाशिए पर समेट दिया था।
वहीं, यह बात भी उभरकर सामने आ रही है कि बंग्लादेश से निर्वासित लगभग डेढ़ करोड़ हिन्दू शरणार्थी पूर्वोत्तर राज्यों में निवास कर रहे हैं। इस विधेयक के कानून बनते ही इसका फायदा इन लोगों को मिलना निश्चित ही है। इसके बाद यह भाजपा का एक बड़ा वोट बैंक बनकर अगर उभरे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इस विधेयक के बाद सरकार पर सांप्रदायिक होने के आरोप भी लगने लगे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धर्म निरपेक्ष राज्य की छवि पर किसी तरह का दाग न लग पाए, इसके लिए भी केंद्र सरकार को कार्ययोजना तैयार करने की जरूरत है। अनेक सूबों के निजामों (मुख्यमंत्रियों) ने अपने अपने राज्यों में इसे लागू नहीं करने की बात कहकर ठहरे हुए पानी में कंकड़ मार दिया है। इसे लागू करना या करवाना केंद्र का अधिकार है अथवा राज्य का यह बात तो बाद में स्पष्ट हो पाएगी, किन्तु जब इसे लागू किया जाएगा तब मुख्यमंत्रियों के वक्तव्यों का बेजा इस्तेमाल करते हुए इन राज्यों में अशांति फैलाने के अगर प्रयास किए जाते हैं तो निश्चित तौर पर यह उचित नहीं होगा।
आज जिस तरह से इस विधेयक को बिना पूरी तरह परिभाषित किए ही इसका विरोध हो रहा है उसका फायदा विपक्ष को मिलता दिख रहा है। विपक्ष क द्वारा भी इस विधेयक की खामियों को गिनाए बिना ही लोगों के विरोध, रोष और असंतोष को चुपचाप भांपा ही जा रहा है। कुल मिलाकर सियासी दल अपनी नैतिक जवाबदेहियों से मुंह फेरते हुए निहित स्वार्थों को तरजीह देते दिख रहे हैं, जो देश की स्वस्थ्य राजनैतिक परंपराओं के लिए किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है। दोनों सदनों में विधेयक के पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मुहर लग जाने से यह कानून बन जाएगा। इसलिए हुक्मरानों को चाहिए कि एक बार फिर इस मसले पर विचार करते हुए अगर इसमें कुछ तब्दीलियां जरूरी हैं तो वे कर ली जाएं, कहीं जल्दबाजी में गलत कदम न उठ जाए! (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

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