देसी मेधा पर गर्व करना हम कब सीखेंगे

 

(डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम) 

एक देश के रूप में अभी हम इतने साहसी नहीं हो पाए हैं कि अपना एक अलग रास्ता तैयार कर सकें। गांधीजी ने जब अहिंसा और सत्याग्रह को स्वतंत्रता प्राप्त करने के तरीकों के रूप में अंगीकार किया तो यह स्वयं में एक महान आविष्कार था। लेकिन आज तो हम उन्हीं चीजों की नकल करना चाहते हैं, जो औरों ने पहले से कर रखी हैं। इस तरह का रवैया अर्थनीति, उद्योग, व्यापार, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, संचार माध्यमों और यहां तक कि साहित्य में भी देखने को मिल रहा है। बाहर से आने वाले विचारों और व्यक्तियों का स्वागत करने को लेकर भारत में कभी कोई दो राय नहीं रही। इस देश ने बहुतेरे विचारों, संस्कृतियों और प्रौद्योगिकियों को अपनी मेधा और परिवेश के अनुरूप ढाला और उन्हें आत्मसात कर लिया।

दूसरी तरफ हमारे लोग भी बाहर गए और वहां हमारी संस्कृति का प्रसार किया। टेक्नॉलजी में भी हमारा योगदान कुछ कम नहीं रहा है। उनमें से कुछेक का जिक्र करना हो तो रकाब और रॉकेट, संख्या सिद्धांत और गणित, जड़ी – बूटियों से बनने वाली दवाएं और धातु विज्ञान। लेकिन आज हम एक नई स्थिति देख रहे हैं, जिसमें हमारे उच्च कोटि के वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों को समृद्ध बनाने के लिए काम कर रहे हैं। इतिहास का अपना लंबा सफर तय करने के क्रम में हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गए हैं, जहां स्वयं के प्रति हमारा विश्वास कहीं खो गया सा लगता है और यह मनःस्थिति स्थाई हो गई सी जान पड़ती है। एक दौर ऐसा गुजरा जब हमने अन्य विचारों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए और मुख्यतः आपस में ही लड़ते रहे। फिर हालात ऐसे हुए कि हम हर विदेशी चीज को आंख मूंदकर अपनाने लगे।

अभी तो ऐसा लगता है कि जो भी काम हमारी सीमाओं से बाहर किया जाता है उसकी अंधपूजा में हम जुट जाते हैं और हमारी अपनी क्षमताओं में हमारा विश्वास बहुत थोड़ा सा ही बचा है। स्वतंत्रता की इतनी लंबी अवधि के बाद यह स्थिति दुखद कही जाएगी। हालांकि इसका एक उज्ज्वल पक्ष भी है। विदेशी श्रेष्ठता के मिथक की दुहाई कभी – कभार उन लोगों द्वारा भी दी जाती है जिन्हें बेहतर जानकारी की जरूरत होती है। उन्हें आसानी से विश्वास ही नहीं होता कि हम भी न केवल तकनीक में श्रेष्ठता हासिल करने की आकांक्षा रख सकते हैं, बल्कि इसमें सफल भी हो सकते हैं। मेरे पास बहुत सुंदर और बेहतरीन तरीके से छपा हुआ एक चमचमाता जर्मन कैलेंडर है, जिसमें रिमोट सेंसिंग पर आधारित यूरोप और अफ्रीका का नक्शा बना हुआ है। जब लोगों को बताया गया कि जिस सैटेलाइट ने ये तस्वीरें खींची हैं, वह भारतीय रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट है, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ। ऐसे में उन्हें तस्वीरों के नीचे लिखी क्रेडिट लाइन दिखानी पड़ी।

जब भी अतीत से जुड़ी किसी चीज के बारे में बात होती है, मामला और गड़बड़ा जाता है। मुझे एक रात्रिभोज के दौरान आयोजित एक बैठक याद आती है, जिसमें बाहरी भागीदारों के अलावा कई भारतीय मेहमान भी शामिल थे। वहां चर्चा रॉकेट साइंस के आरंभिक इतिहास की ओर मुड़ गई। चीनियों ने हजार वर्ष पहले बारूद बना लिया था और तेरहवीं शताब्दी में हुए युद्धों में उन्होंने बारूद युक्त अग्निबाणों का प्रयोग किया था। बातचीत के क्रम में मैंने बताया कि किस तरह टीपू सुलतान के रॉकेट देखने के लिए मैं लंदन के पास वूलविच स्थित रोटंडा म्यूजियम गया था। इन रॉकेटों का इस्तेमाल सेरिंगपट्टम की दोनों लड़ाइयों में किया गया था। मैंने ध्यान दिलाया कि बारूद वाले रॉकेटों का प्रयोग विश्व में पहली बार इन्हीं युद्धों में किया गया था। फिर ब्रिटेन के लोगों ने विस्तृत अध्ययन कर इनका विकसित रूप तैयार किया और इनका इस्तेमाल यूरोप की लड़ाइयों में किया।

वहां मौजूद एक वरिष्ठ हिंदुस्तानी ने तत्काल यह निष्कर्ष सुना दिया कि फ्रांसीसियों ने अपनी टेक्नॉलजी टीपू को दे दी थी। मुझे पूरी विनम्रता के साथ उन्हें बताना पड़ा कि बात ऐसी नहीं है और मैं उन्हें वह किताब दिखा सकता हूं जिससे लड़ाई वाले रॉकेटों को ठेठ देसी रचना बताने वाली मेरी बात सही साबित हो जाएगी। प्रसिद्ध ब्रिटिश वैज्ञानिक सर बर्नार्ड लॉवेल द्वारा लिखित उस पुस्तक का शीर्षक था, ऑरिजिंस एंड इंटरनैशनल इकनॉमिक्स ऑफ स्पेस एक्सप्लोरेशन (अंतरिक्ष अन्वेषण का उद्भव और उसकी अंतरराष्ट्रीय आर्थिकी)। टीपू के रॉकेटों की पड़ताल करते हुए विलियम कॉन्ग्रेव ने सितंबर 1805 में सुधरे स्वरूप वाले रॉकेटों के दो नमूने तत्कालीन प्रधानमंत्री विलियम पिट और युद्ध मंत्री लॉर्ड कासलरी के सामने पेश किए। दोनों इससे इतने प्रभावित हुए कि अक्टूबर 1806 में ही नेपोलियन के खिलाफ हमलों में इनका इस्तेमाल किया गया। इसके बाद अगस्त – सितंबर 1807 में कोपेनहेगन हमलों में भी ब्रिटेन ने इन रॉकेटों का उपयोग किया।

हिंदुस्तानी मेहमान ने वह पुस्तक गौर से देखी, उन हिस्सों पर नजर दौड़ाई जिनकी तरफ मैंने उनका ध्यान खींचा था, कुछ पन्ने पलटे और फिर इंटरेस्टिंग कहते हुए किताब लौटा दी। क्या यह सब देख – सुनकर उन्होंने भारत पर और यहां की सृजनात्मकता पर गर्व का अनुभव किया होगा? पता नहीं, लेकिन यह सच है कि भारत में अपने रचनाशील नायकों को हम भुला चुके हैं। विलियम कॉन्ग्रेव ने टीपू के रॉकेटों को बेहतर बनाने के लिए जो कुछ भी किया, उसका पूरा विस्तृत रेकॉर्ड ब्रिटेन में सुरक्षित है। दूसरी तरफ हम हैं जो यह भी नहीं जानते कि टीपू के इंजीनियर कौन थे, न ही यह कि रॉकेटों का इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन आखिर कैसे हुआ होगा। अत्यंत महत्वपूर्ण चुनौती हमारे सामने यह है कि हमारे प्रबुद्ध और ताकतवर तबकों को लपेटे में ले चुकी इस पराजयवादी मानसिकता को बदला कैसे जाए। इस धारणा को कैसे दूर किया जाए कि हिंदुस्तान में रहकर हिंदुस्तानी कुछ भी नया नहीं कर सकते। (पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया की अनुमति से इंडिया 2020 का एक अंश, नया इंडिया डॉट काम से साभार)

(साई फीचर्स)

 

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