साल पूरा : कई मामलों में प्रदेश रहा चर्चाओं में

(लिमटी खरे)

डेढ़ दशक तक भारतीय जनता पार्टी के कब्जे में रहने के बाद एक साल पहले कमल नाथ के नेतृत्व में मध्य प्रदेश में सरकार बनी। कमल नाथ कुशल प्रशासक हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। उन्हें केंद्र में विभिन्न विभागों के मंत्री और लगातार सांसद रहने का लंबा अनुभव है। मुख्यमंत्री बनने के बाद कमल नाथ के द्वारा राज्य में जिस तरह के बदलाव लाए गए वे किसी से छिपे नहीं हैं। एक साल में 365 दिन होते हैं, कमल नाथ के द्वारा एक साल में घोषणाएं करने के बजाए चुनाव के पूर्व उनके द्वारा जनता से किए गए वचनों को पूरा किया गया। 365 दिन में 365 वचन उनके द्वारा पूरे किए गए। सरकारी सिस्टम में इन वचनों का लाभ जनता तक पहुंचने में कुछ समय अवश्य लग सकता है पर मध्य प्रदेश की जनता अब डेढ़ दशक के भाजपा के शासनकाल और वर्तमान में कमल नाथ के नेतृत्व में एक साल के कार्यकाल की तुलना अवश्य करती दिख रही है।

एक साल की अवधि में प्रदेश में लगभग चार माह में ही बेरोजगारों को प्रशिक्षित कर उन्हें रोजगार देने की शुरूआत की गई। राज्य में अगर कोई उद्यम लगता है तो इसमें दिए जाने वाले रोजगार में सत्तर फीसदी स्थानीय लोगों को रोजगार की बाध्यता लाई गई है। पिछड़ों को दिए जाने वाले आरक्षण को बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया गया है। इसी तरह बिजली के मामले में भी न केवल आत्मनिर्भरता बढ़ी है वरन बिजली के बिल भी अब 100 यूनिट तक की खपत में 100 रूपए कर दिए गए हैं। इसका सीधा लाभ निम्न के साथ ही साथ मध्यम वर्ग को भी मिल रहा है।

खाद्य पदार्थों मंें अपमिश्रण को रोकने के लिए शुद्ध के लिए युद्ध नामक अभियान का आगाज किया गया है। मिलावटखोरों पर शिकंजा कस रहा है। सूबे के हर नागरिक को पानी मिल सके इसके लिए पानी का अधिकार कानून भी लागू किया जा रहा है। दिल्ली में जिस तरह से मोहल्ला क्लीनिक चल रही हैं उसी तर्ज पर संजीवनी क्लिनिक का आगाज भी किया जा रहा है।

मंझे हुए राजनेता की तर्ज पर मुख्यमंत्री कमल नाथ ने एक साल का कार्यकाल पूरा होने के पहले ही प्रदेश में माफियाओं पर शिकंजा कसना आरंभ किया है। प्रदेश भर में हर क्षेत्र में माफियाओं पर शासन, प्रशासन की वक्रदृष्टि पड़ चुकी है। रेत माफिया हों, या भूमाफिया, अब कोई भी इसकी जद से बाहर नहीं है। सालों से सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वालों के चेहरों से नकाब हट रहा है। बुलडोजर मंत्री के नाम से विख्यात रहे स्व. बाबूलाल गौर ने पटवा सरकार मे नगरीय कल्याण मंत्री रहते हुए प्रदेश में अधिकांश स्थानों को अतिक्रमण मुक्त कराया था।

2019 के अंतिम समय में यह कार्यवाही एक बार फिर आरंभ हुई। इस कार्यवाही की एक विशेषता यह रही कि इसमें बिना किसी भेदभाव के भू माफिया को चिन्हित किया जाकर उनके द्वारा बलात कराए गए निर्माणों को जमींदोज कर दिया गया। प्रदेश के महानगरों से लेकर जिला मुख्यालयों में यह अभियान पूरी मुस्तैदी के साथ चल रहा है। इस अभियान को प्रदेश भर में जनता का जबर्दस्त समर्थन मिलना इस बात का घोतक है कि अव्वल तो जनता इस तरह के अतिक्रमणों से आज़िज आ चुकी थी, दूसरा यह कि इस अभियान में पक्षपात नहीं होने से जनता प्रशासन के साथ है। या यूं कहा जाए कि मुख्यमंत्री कमल नाथ ने जनता की नब्ज को पहचानते हुए इस कार्यवाही को अंजाम देने के निर्देश दिए हैं।

मुख्यमंत्री कमल नाथ के द्वारा प्रदेश में अराजकता फैलाने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एक मुहिम का आगाज किया है। कमल नाथ की कार्यप्रणाली देखकर यही प्रतीत हो रहा है कि उन्होेंने यह ठान लिया है कि देश के हृदय प्रदेश को माफिया के चंगुल से निकालकर माफिया मुक्त प्रदेश बनाना है। वैसे भी इस तरह के माफिया समाज के लिए नासूर बन चुके हैं।

मुख्यमंत्री कमल नाथ की प्रशासनिक पकड़ कितनी मजबूत है, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उनकी हरी झंडी मिलते ही प्रदेश की राजनैतिक राजधानी भोपाल, व्यवसायिक राजधानी इंदौर, संसकारधानी जबलपुर, ग्वालियर, रीवा, सागर जैसे बड़े शहरों सहित छोटे शहरों में भी अतिक्रमण के खिलाफ जमकर कार्यवाहियां जारी हैं। आरोप है कि इस तरह के माफिया के द्वारा जिला स्तर पर अफसरशाही को साध लिया जाता रहा है और ऊपरी निर्देश के बाद भी दिखावे की कार्यवाहियों को अंजाम दिया जाता है, पर इस बार जो कार्यवाहियां हो रही हैं, वह लोगों को साफ दिखाई दे रही हैं कि ये कार्यवाहियां महज कागजी खानापूर्ती के लिए कतई नहीं की जा रही हैं।

सियासी बियावान में आरोप प्रत्यारोपों के दौर चलना आम बात है। सत्ताच्युत हुई भाजपा के द्वारा राज्य सरकार पर तबादला उद्योग चलाने के आरोप लगाए, पर इन आरोपों में प्रमाणिकता का अभाव होने के कारण जनता पर इसका प्रभाव बहुत ज्यादा नहीं पड़ सका है। शराब, रेत के मामले में भी माफियाओं के द्वारा सरकारी तंत्र में घुसपैठ के आरोप लगे, किन्तु आबकारी विभाग और खनिज विभाग के द्वारा जिस तरह से शराब और रेत परिवहन पर अंकुश लगाया जा रहा है उससे विपक्ष के आरोप बोथरे ही साबित हो रहे हैं। जनता यही कहती दिख रही है कि भाजपा को चाहिए कि वह विधान सभा के पटल पर इन बातों को रखे, पर विपक्ष ऐसा करता नहीं दिखता, जिससे उसकी मंशा पर जनता प्रश्न चिन्ह लगा रही है!

लोगों को अपनी जन्म भूमि कर्मभूमि के प्रति सम्मान पैदा करने के लिए भी प्रदेश में एक तरह का अभियान जारी है। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने अपनी कर्मभूमि छिंदवाड़ा में एक सेल्फी प्वाईंट पर फोटो खींचकर प्रदेश के सरकारी तंत्र को यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि प्रदेश के हर जिले में इस तरह के प्वाईंट्स बनने चाहिए, ताकि लोग अपने शहर की खासियतों को सोशल मीडिया के जरिए अन्य लोगों तक पहुंचाएं। प्रदेश के लगभग हर जिला मुख्यालय में सेल्फी प्वाईंट बन चुके हैं, जो इस बात की गवाही देते नजर आ रहे हैं कि सचिवालय वल्लभ भवन से लेकर हर जिलों की कमान संभालने वाले अफसरान भी मुख्यमंत्री के आंख के इशारों को न केवल भली भांति समझ रहे है, वरन उसे अमली जामा पहनाने में कोई कोर कसर नहीं रख छोड़ रहे हैं।

लोकसभा में महज एक सीट पर विजय पताका फहराने के बाद भी मुख्यमंत्री का आत्मविश्वास डिगता नहीं दिखा। चूंकि हर स्तर के चुनावों में मुद्दे अलग अलग ही होते हैं इसलिए लोकसभा में पराजय क्यों हुई इस बात पर चिंतन करना केंद्रीय नेतृत्व की जवाबदेही है। इधर, हालातों को समझते हुए उस पर काबू पाते हुए कमल नाथ के द्वारा झाबुआ उप चुनाव में कांग्रेस का परचम लहराकर यही साबित किया है कि प्रदेश में कांग्रेस की पकड़ आज भी पहले ही की तरह मजबूत है। (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

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