सबै राज्य गोपाल का, लेकिन आचरण वैसा नहीं

 

(प्रकाश भटनागर)
बात एक विधानसभा चुनाव की है। कवरेज के सिलसिले में मेरा रहली जाना हुआ। गोपाल भार्गव का विधानसभा क्षेत्र। पूरे इलाके में कांग्रेस प्रत्याशी तथा उनके समर्थक चुनाव जीतने के लिए रात-दिन एक किए हुए थे। ऐसा ही भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ भी था, किंतु पूरे क्षेत्र में मुझे भार्गव एक भी जगह नजर नहीं आए। एक स्थानीय पत्रकार मित्र ने बताया कि भार्गव दोपहरी में घर में आराम करते हैं। मित्र ने जो कहा, वह कुछ इस तरह था,’विधायकजी को न प्रचार की जरूरत है और न ही घर-घर जाकर वोट मांगना होते हैं। यहां तक कि उन्होंने पार्टी के बड़े नेताओं से भी कह रखा है कि चुनावी सभा के लिए रहली आने की बजाय वे कहीं और का कार्यक्रम तय कर लें। क्योंकि विधायकजी का क्षेत्र और क्षेत्र का उनसे इतना गहरा नाता है कि उनकी जीत में किसी तरह का संदेह रह ही नहीं जाता है।

 आज उसी रहली सीट से विधायक भार्गव मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। और रहली को लेकर उनका आग्रह इतना प्रबल कि यहां से एक कॉलेज की सौगात छिनने की आशंका होते ही उन्होंने मुख्यमंत्री कमलनाथ को चुनौती दे डाली है। कहा है कि यदि हॉर्टिकल्चर कॉलेज रहली से छिंदवाड़ा ले जाया गया तो वह एक दिन भी और सरकार को चलने नहीं देंगे। राजनीति में ऐसा कदाचार न जाने कब का सदाचार वाला रूप ले चुका है। सत्ता में आते ही कोई भी सियासी दल पहली फुर्सत में पूर्ववर्ती सरकार के निर्णयों की बखिया उधेड़ने का संस्कार निभाता है। राहुल गांधी का गला छिल गया। यह आरोप लगाते हुए कि नरेंद्र मोदी सरकार अमेठी से फूड पार्क कहीं ओर ले जा रही है। पता नहीं फिर उस पार्क का क्या हुआ, लेकिन अमेठी से गांधी का गुलशन यूं उजड़ा कि कारवां गुजर गया और गांधी गुबार देखते रह गये।

नाथ और भार्गव के मामले में भी ऐसा ही हो रहा हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। नाथ यकीनन यह चाहेंगे कि भार्गव के क्षेत्र में पंजा इतना मजबूत हो जाए कि वह वहां से कमल को जड़ सहित उखाड़ फेंके। लिहाजा हैरत की बात नहीं है कि वाकई में हॉर्टिकल्चर कॉलेज की जड़ रहली से उठाकर नाथ उसे अपने विधानसभा क्षेत्र छिंदवाड़ा में रोपने का जतन करें। आखिर मामला खुद की इज्जत और सांसद बेटे नकुल नाथ और अपनी इस सियासी रणभूमि को सुरक्षित रखने का जो ठहरा। वैसे मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कुछ मामलों में कमलनाथ का आचरण अभी छिंदवाड़ा के सांसद की पुरानी भूमिका से बाहर नहीं जा पा रहा है। इसका एक उदाहरण छिंदवाड़ा में खुलने वाला शासकीय मेडीकल कालेज है जिसके लिए जितने बजट का इंतजाम कमलनाथ सरकार ने किया है, उससे प्रदेश में कम से कम छह नए मेडीकल कालेज और खोले जा सकते हैं।

तो यह सब तो वही हो रहा है, जो होता आया है। लेकिन वह कुछ अखरने वाला है, जो तैश-तैश में भार्गव कह और जता गये। मीडिया रिपोर्ट भार्गव के हवाले कहती है कि मुख्यमंत्री प्रदेश के शेष 229 विधानसभा क्षेत्रों से चाहे जो ले जाएं, लेकिन 230वें रहली से अगर कुछ भी छीना गया तो वह सरकार गिरा देंगे। यहां भार्गव भले ही विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर प्रदेश की जनता की आवाज उठाने का दावा करें, किंतु उन्होंने जता दिया है कि वह भी कमलनाथ की ही तर्ज पर केवल और केवल रहली के मतदाता के प्रति उत्तरदायित्व की भावना रखते हैं। यह वैचारिक स्तर की उस दरिद्रता का परिचायक है, जो मुख्यमंत्री या विरोधी दल के नेता जैसे अहम पद की गरिमा को कमजोर कर रहा है। वैसे गोपाल भार्गव की धमकी वाला यह आचरण कुछ हद तक नजरंदाज करने लायक भी है। गुस्से में होश खो देना मानव स्वभाव का हिस्सा है।

भार्गव होश खो बैठे ही दिखते हैं। यह गुस्सा यदि भार्गव को अपने पद की मर्यादा से परे आचरण करने पर विवश कर गया तो यही वह भाव था, जो उन्हें सरकार गिराने की गीदड़भभकी देने की हद तक घसीट लाया। क्या हास्यास्पद स्थिति है। जिन नाथ को सत्ता से बेदखल करने की धमकी देना भाजपा के तमाम दूसरे दिग्गज नेता भी बंद कर चुके हैं, उसी सरकार के लिए भार्गव गिद्ध के श्राप से गाय के मरने की कल्पना वाली नादानी वाला आचरण कर रहे हैं। कहीं इसकी वजह कुछ और तो नहीं! ऐसा तो नहीं कि भार्गव इस मसले पर अपने दल में ही अकेले पड़ गये हैं! प्रदेश भाजपा में जो कुछ इन दिनों चल रहा है, उसे देखते हुए भार्गव को इस मनोदशा का शिकार मानकर भी इस आचरण के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। कहा जाता है, सबै भूमि गोपाल की। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर भार्गव को सबै राज्य गोपाल का, वाली भूमिका अदा करना चाहिए, जिससे फिलहाल वह भटक गये दिखते हैं। यह लोकतंत्र की विडंबना ही कही जा सकती है, फिर इसकी वजह भले ही कुछ भी क्यों न हो।

(साई फीचर्स)