बरसों से रहे हैं आप हमारी निगाह में

 

(सुधीर मिश्र)

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

फैज़ साहब की लिखी इस नज्म पर बड़ी बहस है आजकल। पाकिस्तानी तानाशाह जियाउल हक के खिलाफ लिखी गई इस नज्म के मायने आज के हिंदुस्तान के संदर्भ में तलाशे जा रहे हैं। यूट्यूब से लेकर गूगल तक पर खोज चल रही है, आखिर इस नज्म में ऐसा क्या है? आईआईटी कानपुर में इस नज्म के बारे में जो शिकायत हुई है, उसमें इसे हिन्दू-मुस्लिम आयामों से जोड़कर देखा गया है। मसला पाकिस्तान का था। अब हाय-तौबा यहां है। साहित्य को लेकर अलग-अलग समय में ऐसी बहस होती रही हैं। असल साहित्यकार ही वह होता है, जिसके रचनाकर्म पर उसकी मौत के बाद हंगामे हों। जैसा कि फैज़ अहमद फैज़ के मामले में आजकल हो रहा है।

लिहाजा, जिसका जो नजरिया है, वह नज्म को वैसे ही देख रहा है। वैसे देखने वाले जाने क्या-क्या देख रहे हैं। खासतौर पर, आभासी दुनिया या वर्चुअल वर्ल्ड में। नज्म, साहित्य, ज्ञान, विज्ञान और जानकारियों की खोज गूगल और यूट्यूब पर कम ही होती है। डिजिटल दुनिया की खूबसूरती यही है। सबकुछ ब्लैक ऐंड वाइट है। इसमें आप जो भी देखते हैं, उसका आंकड़ा होता है। पिछले दिनों लखनऊ समेत कई जिलों में मोबाइल इंटरनेट बंद हो गया। दोबारा जब शुरू हुआ तो कई दिन के भूखे इंटरनेट शौकीनों ने सर्च इंजनों पर भड़ास निकालनी शुरू की। खोजबीन के जब आंकड़े आए तो जानते हैं कि क्या सामने आया। न लोगों ने दीन की बातें खोजी थीं न ईमान की। न ही किसी खास किस्म के ज्ञान, विज्ञान या नज्म की। लोगों ने पोर्न विडियो सबसे ज्यादा सर्च किए। अपने लोगों में किस कदर की ठरक है, यह इंटरनेट ब्राउजिंग के आंकड़ों से पता चलता है। मतलब, देखने वाले तो ऐसे हैं कि बड़े-बड़े तुर्रम खां आजकल एक आईपीएस के वायरल विडियो को ढूंढ रहे हैं। इस विडियो के साथ जुड़े अश्लील शब्द से इसकी मांग काफी तेज है। एक बुजुर्ग का फोन आया कि भाई आप पत्रकार है।ंआपके पास तो होगा, हम भी देखेंगे। उनको जवाब दिया-चचा आप सत्संग में जाइए, भजन-कीर्तन करिए, यह सब मत देखिए। फिर देखना ही है तो उस चिट्ठी को देखिए, जो आईपीएस ने मुख्यमंत्री के दफ्तर को लिखी है। उस व्यवस्था को देखिए, जिसमें पुलिस के बड़े-बड़े अफसर ही थानों से लेकर जिले तक की तैनाती के रेट बता रहे हैं।

बुजुर्गवार बोले-यह तो हम देखते ही रहते हैं। आदत है उनको ये सब देखने की। बिना यह सोचे कि बिके हुए थानों से बिगड़ी पुलिस ही मिलेगी। सोचिए, जब लाखों खर्च करने के बाद थानेदारी या कप्तानी मिलेगी तो बेचारा पुलिस वाला पैसा कहां से निकालेगा। यह पैसा निकलेगा, आपके हेल्मेट न पहनने से होने वाली वसूली से, गरीब रेहड़ी-ठेले वालों से, नो एंट्री से ट्रक-गाड़ियां निकलवाने से, अवैध खनन से और तमाम ऐसे दूसरे जरियों से। ज्यादातर लोगों की शिकायत होती है कि थानों पर जाओ तो पुलिस सुनवाई नहीं करती। या फिर पैसों की डिमांड होती है। अब आप ही देखिए, सब कुछ तो सामने है। किसी जिले के लिए 50 लाख तो किसी थाने के 20 लाख। बड़ा खर्च करना पड़ता है तैनाती पाने के लिए। आखिर ट्रांसफर-प्रमोशन का धंधा करने वालों को पैसा देने के लिए कोई अपने घर की जमीन तो बेचेगा नहीं। हम से, आप से ही तो लेगा। यह ठीक है कि हम सब यह पहले भी देखते रहे हैं। पर पहली बार ऐसा हुआ है कि कैडर के अफसर ने ही मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर अधिकारियों, दलालों के नाम देकर प्रामाणिक शिकायत की है। मुख्यमंत्री की ओर से जांच के आदेश भी हुए हैं। 15 दिन में नतीजे सामने आएंगे, फिर आप भी देखिएगा और हम भी देखेंगे। हालांकि बरसों से देख रहे हैं नूर नाहवी के इस शेर की तरह-

बरसों रहे हैं आप हमारी निगाह में,

ये क्या कहा कि हम तुम्हें पहचानते नहीं!

(साई फीचर्स)