क्या पीआर एजेंसीज़ की सलाह भारी पड़ी दीपिका को!

(लिमटी खरे)

इतिहास गवाह है सामाजिक कुरीतियों, कुछ विशेष अनचाहे घटनाक्रमों आदि पर बनने वाली फिल्मों का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोलता आया है। भारतीय सिनेमा की तह में अगर जाया जाए तो एक बात साफ तौर पर उभरकर सामने आती है कि देश में बनने वाली फिल्में पैसे कमाने का मुख्य जरिया शुरूआती दौर में नहीं रही हैं। फिल्मों के जरिए संदेश देने के प्रयास किए जाते थे। गीतों के बोल में तुकबंदी और गूढ़ अर्थ छिपे होते थे। समय के साथ सब कुछ बदल गया है। आज की फिल्में और संगीत दोनों ही की दिशा भ्रमित हो चुकी है। यह सब बताने के पीछे असली मकसद यही है कि रूपहले पर्दे के अदाकारों को अपने कदम बहुत सोच समझकर उठाने चाहिए। छपाक फिल्म की अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जैसे ही जेएनयू में हुए विवाद में गेस्ट एप्यीरेंस में नजर आईं वैसे ही इसका प्रभाव उनकी फिल्म छपाक पर पड़ना आरंभ हो गया, जबकि यह फिल्म एक बहुत ही संवेदनशील मामले को लेकर बनाई गई थी।

जब भी किसी फिल्म का शीर्षक या कहानी गढ़ी जाती है तो उसके पीछे एक विषय होता है। भारतीय सिनेमा की अनेक फिल्में इस तरह की हैं जो बहुत ही संवेदनशील विषयों पर बनीं और दशकों बाद आज भी लोगों के जेहन में इनकी यादें विस्मृत नहीं हो पाई हैं। दीपिका पादुकोण अभिनीत छपाक फिल्म भी एक बहुत ही संवेदनशील विषय को लेकर बनाई गई थी, पर यह अपने मूल विषय के बजाए अन्य कारणों से चर्चाओं और विवादों में आ चुकी है।

देखा जाए तो किसी फिल्म की कहानी, किरदारों का अभियन आदि को दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए। दर्शक ही फिल्म देखकर अपनी राय कायम करें कि फिल्म की पटकथा, संवाद, अदाकारी, गीत आदि अच्छे हैं अथवा नहीं। ऐसा पहले होता भी आया है, पर कुछ सालों से फिल्मों की कहानी, अदाकारों की हरकतों आदि के कारण फिल्म रिलीज होने के पहले ही अच्छी या बुरी तय कर दी जाती है।

दीपिका पादुकोण ने कम समय में कामयाबी की वे पायदानें तय कर लीं थीं, जिसे तय करने में सालों लग जाते हैं। उनके एक गलत कदम से उनकी छवि धूमिल होती दिख रही है। दीपिका पादुकोण जैसे ही दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय में हुए हमले का विरोध कर रहे विद्यार्थियों के बीच पहुंचीं वैसे ही बवाल मच गया। हलांकि उनके जाने के साथ ही विवाद की उम्मीद तो थी, किन्तु इस कदर विरोध होगा इसकी उम्मीद शायद ही किसी ने की हो।

हो सकता है दीपिका पादुकोण की विचाधारा जेएनयू हमले का विरोध कर रहे विद्यार्थियों की मानसिकता से मेल खाती हो। इस मामले में अनेक फिल्मी हस्तियों ने भी विरोध करने वालों के कंधे से कंधा मिलाया है, पर सारा का सारा बवाल दीपिका पादुकोण के खाते में इसलिए आ रहा है क्योंकि उनके जेएनयू जाने के ठीक बाद ही उनकी फिल्म छपाक रिलीज होने वाली थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि पब्ल्कि रिलेशन (पीआर) एजेंसीस के मशविरे पर दीपिका पादुकोण ने जेएनयू की ओर रूख किया था। उनका यह दांव उल्टा ही पड़ता प्रतीत हो रहा है। इससे एक संवेदनशील विषय पर बनी फिल्म जिसे लोगों द्वारा सराहा जाता, नाहक ही विवादों में फंसकर रह गई है।

वैसे इस तरह के विरोध की इजाजत शायद भारतीय व्यवस्थाओं में उचित नहीं मानी जा सकती है। देश में लोकतंत्र है और सभी को अपने अपने तरीके से अपनी बात रखने का पूरा पूरा उख्तियार है। दीपिका पादुकोण ने जेएनयू जाकर शायद कोई गलति नहीं की है, पर उनके जाने का समय और उनकी फिल्म छपाक के रिलीज होने का समय लगभग एक होना ही इस मामले में विरोध की जड़ है।

खबरें तो यहां तक हैं कि टीवी चेनल्स पर पीआर एजेंसीस के द्वारा दीपिका पादुकोण के जेएनयू जाने के बाद की पटकथा पहले से ही लिखी जा चुकी थी। जेएनयू में विद्यार्थियों के विरोध को पीआर एजेंसीस के द्वारा छपाक के लिए लॉच पेड की तरह प्रयोग किया गया। दीपिका पादुकोण के जेएनयू में गेस्ट एप्यीरेंस को इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जमकर भुनाया गया। कहा जाने लगा कि जहां बिग बी, शाहरूख, आमिर जैसे स्टार मौन हैं, वहीं दीपिका जैसी साहसी कलाकार ने जेएनयू जाकर निडरता का परिचय दिया। मौन रहने वाले कलाकारों को बिना रीढ़ का करार देते हुए दीपिका को रीढ़ वाली अदाकारा साबित करने का असफल प्रयास तक किया गया।

छपाक फिल्म तेजाबी हमले से तबाह हुई एक युवती की कहानी पर बनी फिल्म है। अस्सी और नब्बे के दशक में तेजाब फेंकने की घटनाएं बहुतायत में हुईं। देश के हृदय प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर को तो तेजाब वाला शहर भी कहा जाने लगा था। साठ के दशक से अस्सी के दशक तक भारतीय सिनेमा में प्रेम की जिस तरह से ब्रांडिग की गई, वह उस दौर के युवाओं और युवा होती पीढ़ी पर जमकर असरकारक हुआ। इकतरफा प्रेम में पागल युवकों के द्वारा युवती के इंकार करने पर तेजाब से उनका चेहरा बिगाड़ना आम आत हो गई थी। तेजाब से जलने के बाद एक युवती पर क्या बीतती होगी! वह अपना जीवन किस तरह गुजारती होगी! आदि बातों को आसानी से न तो समझा जा सकता है न ही महसूस किया जा सकता है।

बहरहाल, देश में जब सिनेमा का उदय हुआ उस दौर में गोरे ब्रितानियों के जुल्मों और समाज में फैली कुरीतियों पर केंद्रित फिल्में बनना आरंभ हुईं। समाज में परिवर्तन लाने के ध्येय को लेकर बनने वाली फिल्में उस समय विशेष रूप से बनती रहीं हैं। भारत में सिनेमा का उदय मनोरंजन को परोसकर रूपया बनाने के लिए तो कतई नहीं हुआ था। शुरूआती दौर से सत्तर के दशक तक सामाजिक समस्याओं, सामाजिक प्रतिबद्धताओं, जागरूकता लाने के लिए फिल्में बना करती थीं। फिल्मों के निर्माण में व्यवसायिक दृष्टिकोण बहुत ही गौण हुआ करते थे।

1936 में अछूत कन्या गांधी सुधार से प्ररित थी, 1937 में दुनिया न माने में रूढ़ीवादिता, 1946 में बनी नीचा नगर में कामगारों और मालिकों के संघर्ष को रेखांकित किया गया। 1953 की दो बीघा जमीन, 1957 में दो आखें बारह हाथ, 1958 में एक ही रास्ता, 1959 में सुजाता, इंसाफ का तराजू और धूल का फूल सहित अनेक फिल्में इस बात की गवाह हैं, कि उस दौर में किस तरह से जागरूकता फैलाने के लिए फिल्मों का कथानक हुआ करता था। राजकपूर को शोमैन का खिताब ऐसे ही नहीं मिला था। उन्होंने समाज की नब्ज थामकर उस दौर के अनेक वाक्यों और समस्याओं पर सटीक और जानदार फिल्में बनाईं।

ऐसा नहीं है कि अस्सी के दशक के बाद इस तरह की फिल्में नहीं बनीं हों। 1982 में प्रेमरोग, 1985 में दामुल जैसी फिल्में बनीं। हाल ही की अगर बात की जाए तो थ्री ईडियट्स, न्यूटन, टॉयलेट एक प्रेम कथा, सुई धागा, पैडमैन जैसी फिल्में भी जन जागृति फैलाती ही दिखीं। विडम्बना ही कही जाएगी कि दीपिका के एक गलत कदम से सामाजिक सरोकार वाली एक फिल्म छपाक का विरोध जमकर हो रहा है।

वैसे दीपिका पादुकोण ने जो किया वह उनका नितांत निजि मामला माना जा सकता है। उनकी फिल्म का विरोध करने के बजाए दर्शकों पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए कि दर्शक इस फिल्म को देखना चाहते हैं अथवा नहीं! कहा जाता है कि सोशल मीडिया लोगों की मानसिकता तैयार करने का बड़ा जरिया बन चुका है। इस समय दीपिका पादुकोण के जेएनयू जाने को लेकर जिस तरह की नकारात्मक बातें चल रही हैं, उसका प्रभाव छपाक फिल्म पर पड़ता दिख रहा है, जिसे उचित नहीं माना जा सकता है . . .! (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)