कराह रहीं घंसौर की सड़कें

 

(शरद खरे)

समाज शास्त्र में औद्योगीकरण और नगरीकरण को एक दूसरे का पर्याय माना गया है। औद्योगीकरण जहाँ होगा वहाँ नयी बस्तियां बसना अवश्यंभावी ही माना गया है। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई में औद्योगिक क्षेत्रों के इर्द-गिर्द नयी बसाहट इसका जीता जागता प्रमाण है। दरअसल उद्योग धंधे की स्थापना के साथ ही इन कल कारखानों में काम करने के लिये प्रशिक्षित (स्किल्ड) और अप्रशिक्षित (अनस्किल्ड) कारीगरों की आवश्यकता होती है। देश भर से इस तरह के कर्मचारी उन स्थानों पर आजीविका कमाने आते-जाते रहते हैं।

सिवनी के आदिवासी बाहुल्य घंसौर क्षेत्र में कोल आधारित तीन पॉवर प्लांट्स की संस्थापना प्रस्तावित है। इनमें से एक का कार्य पूर्णता की ओर है। देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड के द्वारा एक पॉवर प्लांट की संस्थापना का कार्य लगभग पूरा होने को है। यहाँ बिजली का उत्पादन तो चालू हो गया बताया जाता है पर इसका विधिवत उद्घाटन अब तक नहीं हो पाया है।

इस पॉवर प्लांट में भारी मशीनरी को सड़क मार्ग से ट्रकों के माध्यम से लाया, ले जाया जाता रहा है। उस समय सड़कों के धुर्रे बुरी तरह उड़े थे। यह बात जब तत्कालीन जिला कलेक्टर भरत यादव के संज्ञान में लायी गयी थी तब उन्होंने क्षेत्र की सड़कों को दुरूस्त कराने की जवाबदेही झाबुआ पॉवर प्लांट प्रबंधन पर ही डाली थी। उस आदेश का क्या हुआ, इस बारे में शायद अब कोई नहीं जानता है। इसके बाद जिला कलेक्टर के रूप में धनराजू एस. एवं गोपाल चंद्र डाड भी पदस्थ रह चुके हैं।

इस संयंत्र के लिये आने वाला कोयला भी पिछले वर्षों में सड़क मार्ग से ही ले जाया जाता रहा। घंसौर तक ब्रॉडगेज़ आने के बाद कोयले की आपूर्ति रेल मार्ग से भी की जा रही है किन्तु रेलवे स्टेशन बरेला से पॉवर प्लांट तक सड़क मार्ग के जरिये ही कोयला ढुल रहा है।

वर्ष 2010 से लगातार ही झाबुआ पॉवर प्लांट के द्वारा घंसौर क्षेत्र में मनमानी जारी है। हो सकता है कि वर्तमान समय के चुने हुए जनप्रतिनिधि और अधिकारी यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लें कि पहले की छोड़ो अब आगे क्या किया जाये.. यह बात की जाये। सवाल यही है कि पूर्व में अगर किसी के द्वारा अनियमितताएं की जाती रहीं और प्रतिनिधियों एवं अधिकारियों के द्वारा मुँह फेरे रखा गया (कारण चाहे जो भी हो) तो क्या इस तरह के अपराध क्षम्य श्रेणी में आते हैं! क्या उन अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही निर्धारित नहीं होना चाहिये!

घंसौर क्षेत्र की सड़कों के संधारण के लिये प्रशासन के द्वारा बार-बार संयंत्र प्रबंधन को आगाह किये जाने के बाद भी अब तक सड़कों में वांछित सुधार परिलक्षित न होने से यही प्रतीत हो रहा है कि संयंत्र प्रबंधन को जिला प्रशासन की परवाह भी नहीं है। इस मामले में संवेदनशील जिलाधिकारी प्रवीण सिंह के ध्यानाकर्षण की अपेक्षा की जा सकती है।