कोचिंग क्लासेस पर सियासी मौन!

 

(शरद खरे)

जिले में शैक्षणिक संस्थाओं की मोटी फीस, महंगे गणवेश, कॉपी किताबों को खरीदने के बाद जब बच्चा अपने माता-पिता से कोचिंग लगवाने की बात करता है तो पालकों की रूह कांपना स्वाभाविक ही है। ऐसा इसलिये क्योंकि जिस विद्या के अर्जन के लिये पालक अपने बच्चे को स्कूल भेजते हैं वह शाला की बजाय कोचिंग संस्थानों में उसे मिल पा रही है।

सिवनी जिले में न जाने कितने निज़ि शिक्षण संस्थान अस्तित्व में हैं। इन संस्थानों में मोटी फीस लेकर, बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दी जा रही है। एक समय था जब निज़ि शिक्षण संस्थान गिनती के थे और इनमें से अधिकांश का संचालन मिशनरी द्वारा किया जाता था। मिशनरी को अनुदान मिलता था, इसलिये इसमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों को अधिक फीस नहीं देना पड़ता था। आज शिक्षा को व्यवसाय बना लिया गया है और शासन-प्रशासन मूक दर्शक बना बैठा है।

शालाओं में गणवेश, डोनेशन, किताबों आदि की मारामारी से आम अभिभावक त्रस्त ही नज़र आ रहा है। शासकीय शालाओं के शिक्षकों को चुनाव, परिवार नियोजन आदि बेगार के कामों में उलझा दिया गया है, जिससे वहाँ की पढ़ायी प्रभावित हुए बिना नहीं है। शासकीय शालाओं में शिक्षकों का ध्यान अब पढ़ायी की ओर, पूर्व की तरह नहीं रह गया है। यह सब कुछ शासन – प्रशासन बखूबी जानता है। शासकीय स्तर पर निज़ि शिक्षण संस्थानों के लिये न जाने कितने दिशा-निर्देश जारी होते हैं, पर उनमें से कितनों का पालन हो पाता है, यह बात भी सभी के सामने है।

आश्चर्य तो इस बात भी होता है कि काँग्रेस भाजपा सहित अन्य सियासी दलों के वे अनुषांगी संगठन जो विद्यार्थियों के बीच सक्रिय हैं वे भी इस मामले में पूरी तरह मौन साध लेते हैं। यदा कदा चेतावनी के रूप में साल में एकाध बार विज्ञप्ति जारी कर इस तरह के संगठन भी अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री ही कर लेते हैं।

सालों बीत गये पर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के द्वारा कभी भी सरकारी या निज़ि शालाओं में जाकर शिक्षा के स्तर को नहीं परखा गया है। शालाओं के विद्यार्थियों से अगर यह पूछ लिया जाये कि वे शाला में लगभग आठ घण्टे बिताने के बाद कितने घण्टे कहाँ-कहाँ कोचिंग के लिये जाते हैं और क्यों, तो जमीनी हकीकत जिला शिक्षा अधिकारी के सामने आ सकती है। विडंबना ही कही जायेगी कि इस बात की फुर्सत जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को अब तक नहीं मिल पायी है।

जिला प्रशासन को चाहिये कि इस मामले में संज्ञान अवश्य ले। अगर किसी संस्था में कोई बच्चा अध्ययन कर रहा है तो कम से कम उस संस्था के शिक्षक पर तो कोचिंग पढ़ाने पर पाबंदी लगनी ही चाहिये। एक बात समझ से परे है कि शाला में चालीस बच्चों के बीच जो शिक्षक बच्चों को विषय समझाने में असफल रहता है वह निज़ि तौर पर कोचिंग के दौरान चालीस मिनिट में ही उस विषय में बच्चे को पारंगत कैसे बना देता है, मतलब साफ है कि शिक्षा को दुकान बनाने का अभियान परवान चढ़ रहा है। अगर ऐसा नहीं किया जा सकता है तो बेहतर होगा कि जिले के विधायक निज़ि कोचिंग संस्थानों को ही शिक्षण संस्थान का दर्जा दिये जाने की बात विधानसभा में गुंजायमान करें, ताकि कम से कम अभिभावक तो कई दृष्टिकोणों से लुटने से बच सकें।

जिला प्रशासन अगर जिला शिक्षा अधिकारी और जनजातीय विभाग के सहायक आयुक्त कार्यालय में पदस्थ जिम्मेदार अधिकारियों से यह पूछ ले कि साल भर में उनके द्वारा कब-कब और किस-किस सरकारी या निज़ि शैक्षणिक संस्था का निरीक्षण किया जाकर वहाँ क्या-क्या पाया गया! इसका क्रॉस वेरीफिकेशन कराते ही दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है। अब परीक्षाएं आने वाली हैं, इस लिहाज़ से चालू शैक्षणिक सत्र में जिम्मेदारों के काम की समीक्षा होना चाहिये।