मंत्रियों का काश्मीर जाना होगी एक नायाब पहल

(लिमटी खरे)

यक्ष प्रश्न यही खड़ा दिख रहा है कि देश में जम्मू और काश्मीर क्षेत्र को कब तक संगीनों के साए में रखा जाएगा! आखिर कब यहां के नागरिकों को देश के अन्य हिस्सों की तरह आजादी से सांसें लेने का अधिकार मिल पाएगा! इसी बीच मलेशिया के मुखिया महातिर मोहम्मद ने काश्मीर को लेकर जो बयानबाजी की है वह भी लोगों को आश्चर्य चकित करने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है। जम्मू काश्मीर क्षेत्र में लगभग छः माह से अधिक समय से वहां के नागरिकों को अनेक बुनियादी सुविधाओं से महरूम रखा जा रहा है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन की श्रेणी में ही आता है। विपक्षी दलों के द्वारा अनेक बार इस बारे में मांग की है कि उन्हें जम्मू काश्मीर के लोगों से जाकर बातचीत का मौका दिया जाना चाहिए। विडम्बना देखिए कि यह बात विपक्ष के द्वारा जनता के बीच तो रखी जाती है पर जब देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) में इस बात को उठाने का समय आता है तो विपक्ष को मानो पक्षाघात हो जाता है। हाल ही में सरकार के द्वारा तीन दर्जन वरिष्ठ मंत्रियों को जम्मू काश्मीर भेजने का निर्णय लिया है, ताकि वहां के लोगों से मुलाकात कर उनसे चर्चा कर उनकी परेशानियां जानें। इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए।

जब जम्मू और काश्मीर से आर्टिकल 370 हटाया जा रहा था, उस वक्त कहा जा रहा था कि जल्द ही इस क्षेत्र के हालात ठीक हो जाएंगे और फिर उसके बाद वहां सब कुछ सामान्य हो जाएगा। यह बात ठीक उसी तरह कही गई थी जैसी कि नोटबंदी और जीएसटी को लागू करते समय कही गई थी। इन सारे मामलों में हालात अभी भी सामान्य नहीं माने जा सकते हैं। इसके अलावा यह बात भी सत्य है कि इन सभी निर्णयों को लागू करते समय जो मंशाएं बताई गईं थीं, वे भी पूरी नहीं हो पाई हैं।

आज जम्मू और काश्मीर में तनाव की स्थिति से इंकार नहीं किया जा सकता है। नागरिकों को मिलने वाली सुविधाएं भी पूरी तरह बहाल नहीं हो पाई हैं, जनजीवन भी सामान्य नहीं माना जा सकता है। फोन, इंटरनेट सुविधाएं बाधित ही हैं। अनेक सियासतदार भी अपने अपने घरों में ही कैद हैं। जम्मू काश्मीर को देश का मुकुट माना जाता है। इसके बाद भी यहां सब कुछ सामान्य न होना वाकई दुखद ही माना जाएगा।

जम्मू काश्मीर से जिस तरह की खबरें छन छन कर बाहर आ रही हैं उन पर अगर यकीन किया जाए तो यहां के नागरिकों में रोष और असंतोष चरम पर है। शासन, प्रशासन की चाबुक के डर से लोग बोलने से परहेज ही कर रहे हैं। छः महीनों से जम्मू और काश्मीर क्षेत्र पूरी तरह संगीनों के साए में है और सरकार यह कहकर अपनी पीठ ठोंक रही है कि आर्टिकल 370 हटने के बाद वहां हिंसा में कमी आई है। साफ है कि जब लोग घरों में कैद ही रहेंगे, चप्पे चप्पे पर सुरक्षा बल के जवान रहेंगे तब हिंसा कैसे हो पाएगी! कब तक देश के सुरक्षा बलों को जम्मू और काश्मीर में तैनात रखा जाएगा!

इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार के द्वारा देर आयद दुरूस्त आयद की तर्ज पर 36 वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों को जम्मू के 51 और  काश्मीर के 08 क्षेत्रों के विभिन्न इलाकों में भेजकर आर्टिकल 370 एवं 35ए के हटाए जाने से वहां के लोगों को मिलने वाले लाभ के बारे में समझाने की कवायद की गई है। यह कवायद विलंब से हो रही है पर इसका स्वागत किया जाना चाहिए। सरकार को यह उम्मीद है कि केंद्रीय मंत्रियों के सीधे संवाद से वहां के लोगों के मन में जमी बर्फ कुछ हद तक पिघल सकती है और उसके बाद हालात सामान्य होने की स्थितियां बन सकती हैं।

वैसे इस मामले में सरकार को धारा 370 और 35ए को समाप्त करने के बाद सबसे पहला काम विपक्ष को भरोसे में लेने का करना चाहिए था। सरकार को चाहिए था कि विपक्ष के समझदार सांसदों के साथ बैठकर इसके बारे में बात की जाती और उन्हें समझाने का प्रयास किया जाता। अगर सरकार ऐसा करती तो केंद्रीय मंत्रियों के साथ विपक्ष के कुछ सांसदों को भी भेजा जाकर एक संदेश देने का प्रयास किया जा सकता था कि ये दोनों आर्टिकल्स जम्मू और काश्मीर के लोगों की भलाई के लिए ही समाप्त किए गए थे।

जम्मू काश्मीर में हालात बिगड़ने के साथ ही सरकार ने शायद इस डर से कि विपक्ष अगर वहां गया और उसने वहां की जनता को भड़काया तो हालात और भी बदतर हो सकते हैं, विपक्ष को जम्मू काश्मीर जाने की इजाजत नहीं दी। जम्मू काश्मीर में सब कुछ सामान्य नहीं माना जा सकता है। वहां के लोगों के मन में आक्रोश तो है ही, साथ ही उनके साथ संवाद का रास्ता त्यागकर सरकार ने सबसे बड़ी भूल की है। लगभग छः माहों से जम्मू और काश्मीर में संवादहीनता की स्थिति बनी हुई है।

जम्मू काश्मीर मामले में देश भर में भ्रम की स्थिति बनी हुई है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। केंद्र सरकार के पास पर्याप्त संसाधन हैं, इन संसाधनों के जरिए उसे अब तक भ्रम की स्थितियों को दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए था। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जम्मू और काश्मीर के मामले में बन रहे दबाव के शमन के लिए सरकार के द्वारा 36 मंत्रियों को वहां भेजकर संवाद करने का उपक्रम किया जा रहा है।

वैसे जम्मू काश्मीर की स्थितियां आज से खराब नहीं हैं। सालों साल तक केंद्र सरकारों के द्वारा ध्यान न दिए जाने पर राज्य सरकारों के द्वारा जिस तरह की कार्यप्रणाली अपनाई जाती रही, वहीं से घाटी में अराजक माहौल बनने की शुरूआत हुई। घाटी में जब भी कोई घटना घटती, वैसे ही सुरक्षा बलों के माध्यम से हुक्मरानों के द्वारा हथियार के बल पर इसे दबाने का प्रयास किया जाता रहा है। क्षेत्र का इतिहास अगर उठाकर देख लिए जाए तो हुक्मरानों ने कभी भी घाटी के युवाओं के लिए रोजगार के साधन बढ़ाने की दिशा में पहल नहीं की गई। मुख्य धारा से भटकने वाले नौजवानों को रास्ते पर लाने के लिए किसी तरह के प्रयास नहीं किए गए। यही कारण था कि लंबे समय तक अराजक स्थिति में रहने वाली घाटी के क्षेत्र में युवा होने वाली पीढ़ी को लगने लगा था कि जो हो रहा है वही उनके दैनिक जीवन का हिस्सा है।

बहरहाल, जम्मू और काश्मीर क्षेत्र को पिछले छः माह से अधिक समय से सुरक्षा बलों के द्वारा जिस तरह से संभाला गया है उसके लिए उनकी जितनी तारीफ की जाए कम ही होगी। इन छः महीनों में ही अगर सीधे संवाद की पहल की जाती तो आज जम्मू और काश्मीर क्षेत्र में स्थितियां बहुत ही अनुकूल हो चुकी होतीं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कुछ माह पहले वहां जाकर संवाद की पहल का आगाज कर दिया था, किन्तु यह पहल सतत जारी रखी जाने की जरूरत थी। इसी बीच विदेशी राजनयिक वहां के दौरे पर आए। पूरी दुनिया का ध्यान सालों से जम्मू और काश्मीर पर है। जैसे ही यह दल आया वैसे ही दुनिया भर की नजरें एक बार फिर जम्मू काश्मीर पर जा टिकीं। अब इस दल के सामने सरकार घाटी की किस तरह की तस्वीर पेश करती है और वे खुद अपनी आखों से किस तरह की स्थितियों को देखते हैं, यह बात भविष्य के गर्भ में ही है।

केंद्र सरकार के द्वारा भले ही जम्मू काश्मीर के हालात सामान्य होने का दावा किया जा रहा हो, पर जब तक यहां के नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पातीं, नजर बंद नेताओं को रिहा नहीं किया जाता, क्षेत्र में राजनैतिक और अन्य गतिविधियां आरंभ नहीं होतीं तब तक हालात को सामान्य कैसे माना जा सकता है!

इसी बीच मलेशिया के मुखिया महातिर मोहम्मद के द्वारा यह कहा गया कि भारत ने काश्मीर पर हमला कर उस पर कब्जा किया है। इसके अलावा उनके द्वारा नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भी तल्ख टिप्पणियां की गई हैं। महातिर मोहम्मद के द्वारा कही गई बातें बचकाना इसलिए प्रतीत होती हैं, क्योंकि उन्हें इन साराी बातों का भान ही नहीं है जो वे कह रहे हैं। वे गलत बयानी कर भारत के साथ अपने दशकों पुराने मित्रता वाले रिश्ते में निब्बू निचोड़कर खटास पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

कुल मिलाकर सरकार के द्वारा केंद्रीय मंत्रियों को घाटी में भेजने का स्वागत योग्य फैसला किया है, पर अगर इसमें सरकार के द्वारा विपक्ष के सांसदों का भी समावेश कर लिया जाता तो समस्या का हल जल्द निकलने की उम्मीद की जा सकती थी।  (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

199 thoughts on “मंत्रियों का काश्मीर जाना होगी एक नायाब पहल

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