आवश्यकता है पुलिस में कसावट की!

 

(शरद खरे)

पुलिस विभाग में थाना स्तर पर कसावट की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। ऐसा कहने के पीछे आशय महज इतना है कि लखनादौन थाना क्षेत्र में दशहरे की रात हुई चोरी का खुलासा करने में लखनादौन पुलिस नाकाम रही और बाद में जिला स्तर से एक दल बनाकर इस चोरी का खुलासा करने में सफलता पायी गयी। इसके अलावा पिछले दिनों घंसौर थाना क्षेत्र में अन्य थाना बल के द्वारा छापा मारा गया तब वहाँ एक जुए की फड़ पकड़ायी। इसी तरह छपारा थानातंर्गत एक गाँव में चल रही जुए की फड़ को लखनवाड़ा, बण्डोल और रक्षित आरक्षी केंद्र में तैनात बल के द्वारा छापा मारकर एक जुए की फड़ को पकड़ा गया है।

इस तरह की घटनाओं से साफ हो जाता है कि जिले के थाना क्षेत्रों में थाना स्तर का सूचना संकलन काफी कमजोर पड़ चुका है। पुलिस के द्वारा अपराध रोकने, अपराध के बाद अपराधियों को पकड़ना, मशरूका बरामद करने आदि में गुप्तचर तंत्र का पूरा उपयोग किया जाता है। अगर पुलिस का गुप्तचर तंत्र ही कमजोर होगा तो जरायमपेशा लोग आसानी से बचते ही रहेंगे।

हाल ही में छिंदवाड़ा रोड में एक एटीएम को गैस कटर से काटकर उससे 08 लाख 78 हजार रूपये पार कर दिये गये थे। इस मामले में दस दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस खाली हाथ ही है। आरोपियों को पकड़ने में जितना समय लगेगा तब तक आरोपियों के द्वारा यहाँ से चुरायी गयी रकम को खर्च किया जाता रहेगा।

याद नहीं पड़ता कि सालों से कभी पुलिस विभाग के जिला स्तर पर तैनात वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा पुलिस कंट्रोल रूम, डायल 100, ब्रेकर्स आदि की माक ड्रिल करायी गयी है। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अवध किशोर पाण्डेय के कार्यकाल में मॉक ड्रिल का आयोजन किया जाता था, उसके बाद से यह व्यवस्था मानो बंद ही कर दी गयी है।

वरिष्ठ अधिकारी अगर चाहें तो किसी के मोबाईल या लेण्ड लाईन से पुलिस कंट्रोल रूम या थाने में कोई सूचना देकर इसकी जाँच समय-समय पर करें तो इसके अच्छे प्रतिसाद सामने आ सकते हैं। फोन उठाने में लगने वाला समय, सूचना मिलने के बाद बताये गये घटना स्थल पर पहुँचने का रिस्पॉन्स टाईम आदि भी अधिकारी आसानी से चैक कर सकते हैं। अमूमन यही देखा गया है कि जब तक पुलिस को बताये गये स्थान पर कर्मचारी पहुँचते हैं तब तक उत्पात मचाने वाले वहाँ से गायब ही हो जाते हैं।

जिले में लगभग सात आठ सालों में अज्ञात महिलाओं के संदिग्ध अवस्था में मिले शवों की शिनाख्त तक नहीं हो पायी है। लूघरवाड़ा के जैन मंदिर में हुई चौकीदार की हत्या सहित अनेक हत्याओं पर से भी पर्दा नहीं उठ पाया है। जिले से अनेक बच्चे भी लापता हैं। इसके अलावा जिले से होकर गुजरने वाले संदिग्ध वाहनों की जाँच भी नहीं हो पा रही है।

जिला पुलिस अधीक्षक कुमार प्रतीक गंभीर और सुलझे हुए अधिकारी माने जाते हैं। उनकी कार्यप्रणाली से अब तक जिले में बेहतर पुलिसिंग तो देखने को मिल रही है पर इसमें कुछ कसावट की आवश्यकता अवश्य महसूस की जा रही है। उनसे अपेक्षा है कि वे जिले की पुलिस व्यवस्था में कसावट लाने की दिशा में कदम अवश्य उठायेंगे ताकि लोगों के सामने पुलिस की मित्र वाली छवि एवं जरायम पेशा लोगों में कानून का भय उत्पन्न हो सके।

 

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