इतने से ही खत्म नहीं होंगे निर्भया के भय

 

(हरबंश दीक्षित) 

निर्भया को तो न्याय मिल गया, पर निर्भया का भय अभी भी बरकरार है; दिसंबर 2012 में र्दंरदगी की शिकार निर्भया के कातिलों के सजा-ए-मौत पर मुहर लगने के बाद भी। वह भय केवल इस रूप में नही है कि इस मामले को लटकाने के लिए अब भी कानूनी दांव-पेच का इस्तेमाल किया जाएगा, बल्कि वह इसलिए भी है कि दुष्कर्म के दो तिहाई मामलों में आज भी सजा नहीं हो पाती, फैसला आने में दशकों लग जाते हैं, गवाही का प्रयास करने वाली निर्भया को मार दिया जाता है, सुबूत नष्ट करने के लिए उसे जला दिया जाता है, समाज भी अभी तक उसके प्रति संवेदनशील नहीं हो पाया है।

सरकारी प्रयासों के बावजूद बीते दशक में दुष्कर्म के मामलो में लगातार वृद्धि हुई है और अपराधियों को सजा मिलने की दर लगातार घट रही है। पिछले 17 वर्षों में दुष्कर्म के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, सन 2001 से 2017 के बीच औसतन 67 महिलाएं हर दिन इसका शिकार हुईं।

निर्भया मामले पर देश भर में उपजे आक्रोश के बाद फौजदारी कानून में व्यापक संशोधन किया गया। न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति के सुझावों के मुताबिक दुष्कर्म और महिलाओं के खिलाफ होने वाले दूसरे अपराधों के मामले में कठोर सजा की व्यवस्था की गई। कुछ मामलों में मृत्युदंड का भी प्रावधान किया गया। यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि अपराधियों को कानूनी खामियों का दुरुपयोग न करने दिया जाए। इसके लिए दंड-प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य विधि में संशोधन किया गया, पर अपराधियों को सजा मिलने की दर घटती रही है। सन 1973 में दुष्कर्म के 44.3 प्रतिशत अपराधियों को सजा मिल जाती थी, जबकि 2017 में यह घटकर 32 प्रतिशत पहुंच गई। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि मेट्रोपॉलिटन शहरों में यह मात्र 27.2 प्रतिशत थी। इसके अलावा कानूनी प्रक्रिया में लगने वाला लंबा समय अब भी चिंता का सबब बना हुआ है। सन 2017 में अदालतों के सामने कुल 1,46,201 दुष्कर्म के मामले लंबित थे, जिनमें से केवल 18,099 मामलों का निपटारा किया जा सका। इस में से भी 5,822 मामलों में सजा हुई, जबकि 11,453 मामलों में दोष साबित नहीं हो सका। शेष 824 मामले ऐसे थे, जिन पर मुकदमा चलाए जाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। 

दुष्कर्म के मामलों में सजा के लिए यदि केवल 2017 को अलग करके देखा जाए, तो कानूनी प्रक्रिया में देरी का और भी चिंताजनक पहलू सामने आता है। सन 2017 में देश भर की अदालतों के सामने विचारण के मामलों में से केवल 1,010 यानी 3.5 प्रतिशत मामलों में सजा हुई। शेष या तो अदालतों के सामने लंबित रह गए या अभियुक्त छूट गए। दुष्कर्म के मामलों का विचारण जितना लंबा चलता है, उतनी ही पीड़िता की हिम्मत पस्त होती जाती है और सजा की संभावना कम होने लगती है। 2017 में अदालतों के सामने दुष्कर्म के 1,27,868 लंबित मामलों में से एक तिहाई ऐसे थे, जो तीन वर्ष से ज्यादा के समय से चल रहे थे। जबकि 12,216 मामले पांच वर्षों से अधिक तथा 1,840 मुकदमे 10 वर्षों से अधिक समय से लंबित थे। दुष्कर्म से जुड़े मामलों का कानूनी और सामाजिक ताना-बाना बहुत जटिल होता है। अभियुक्तों की ओर से पीड़िता पर मुकदमा वापस लेने से लेकर गवाही न देने तक सभी कोशिशें की जाती हैं। यदि किसी ने लड़ने की हिम्मत दिखाई, तो कानून की जटिलता उसकी रही-सही कसर पूरी कर देती है। समाज का व्यवहार भी पीड़िता के प्रति अच्छा नहीं होता। पुलिस और अदालतों के कर्मचारियों की सोच और व्यवहार भी शेष समाज से अलग नहीं होता। 

महिलाओं के खिलाफ किए जाने वाले अपराधों के मामलों में हमारे कानूनी ढांचे में कोई कमी नहीं है। निर्भया मामले के बाद तो उसे और भी कठोर कर दिया गया है। मगर उसका अपेक्षित परिणाम नहीं आ पा रहा है। दुष्कर्म के मामलों में आमतौर पर पीड़िता के सिवाय कोई दूसरा गवाह नहीं होता, इसलिए सुबूत इकट्ठा करने के लिए योग्य और दक्ष कर्मचारियों की जरूरत होती है, जिसकी आज भी भारी कमी है। मुलजिम अदालती प्रक्रिया की खामियों का भी दुरुपयोग करते हैं और पीड़िता को इतना थका देते हैं कि इन दुश्वारियों से लड़ने की उसकी हिम्मत जवाब देने लगती है। (लेखक किशोर न्याय बोर्ड के पूर्व मजिस्ट्रेट हैं.)

(साई फीचर्स)

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