लें संकल्प कुछ नया करने का

 

(अखिलेश दुबे)

26 जनवरी 1950 को भारतीय गणतंत्र की स्थापना हुई। सिवनी जिला एक नवंबर 1956 को अस्तित्व में आया, इस लिहाज़ से सिवनी 64 सालों का हो चुका है। सिवनी, भारत गणराज्य का अभिन्न अंग है। मध्य प्रदेश के नक्शे में सिवनी का अपना अहम स्थान रहा है। राजनैतिक दृष्टि से उन्नीसवीं सदी तक सिवनी बेहद ही समृद्ध रहा है। प्रौढ़ हो रही पीढ़ी की आँखों के सामने सिवनी का असली अतीत आज भी घूमता होगा। वर्तमान परिवेश और उन्नीसवीं सदी के सिवनी की तुलना करने पर उन्हें सिवनी का वैभवशाली इतिहास अवश्य ही नज़रों में घूमता दिखायी देता होगा।

उन्नीसवीं सदी या यूँ कहें कि बीसवीं सदी के पहले दशक तक सिवनी में अमन चैन पूरी तरह से कायम रहा है। संसाधनों की भले ही कमी रही हो पर जिले की फिज़ा सदा ही शांत रही है। यही कारण है कि जो भी सरकारी अधिकारी सिवनी में तैनात रहा है, उसमें से लगभग सत्तर फीसदी ने तो सिवनी में ही अपना आशियाना बना लिया है। इतना सब होने के बाद भी सिवनी में एक अदद ब्रॉडगेज़ को लाने का काम अब जाकर आरंभ हुआ है। यह निश्चित तौर पर सिवनी के नेत्तृत्व करने वाले सांसद-विधायकों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाने के लिये पर्याप्त माना जा सकता है।

हमें यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि सिवनी का नेत्तृत्व जब तक स्व.सुश्री विमला वर्मा के हाथों में रहा तब तक सिवनी के नागरिक विकास के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थे। उस दौर में एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांध (भीमगढ़ बांध), सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता का कार्यालय, लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण यंत्री का कार्यालय, राष्ट्रीय राजमार्ग के कार्यपालन यंत्री की तैनाती, क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी कार्यालय, बण्डोल की दूध डेयरी, आर्युविज्ञान महाविद्यालय (मेडीकल कॉलेज़) की क्षमता वाले जिला चिकित्सालय, राज्य परिवहन निगम का संभागीय कार्यालय, संभागीय कर्मशाला आदि को देखकर आसपास के जिले के निवासी सिवनी के निवासियों की किस्मत से रश्क ही किया करते थे।

विडंबना ही कही जायेगी कि सुश्री विमला वर्मा के सक्रिय राजनीति से किनारा करते ही सिवनी का विकास मानो थम सा गया। एक के बाद एक योजनाएं सिवनी से छीनी जाने लगीं। उस दौर में सड़क परिवहन निगम की संभागीय कर्मशाला के लिये आमाझिरिया के आगे वाले मोड़ पर जमीन आवंटित की गयी थी। आज भी इसकी चारदीवारी में लगाये गये नींव के पत्थर दिखायी दे जाते हैं। आज लोग इन बातों को भले ही बिसार चुके हों या बिसारने पर मजबूर कर दिये गये हों पर ये बातें अपने आप में अलग ही महत्व रखती हैं।

तत्कालीन जिला कलेक्टर भरत यादव ने सिवनी में लगभग पौने तीन साल का समय बिताया था। उस समय उनकी बिदाई समारोहों में उन्होंने एक बात को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया था कि सिवनी को सशक्त नेत्तृत्व की महती जरूरत है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी ने इस बात को बेहतर तरीके से अपनी पदस्थापना के दौरान समझा कि सिवनी का सियासी नेत्तृत्व आखिर किस पायदान पर हुआ करता था और किस पायदान पर जा पहुँचा है! उनके स्थानांतरण के पश्चात सिवनी आये धनराजू एस. एवं वर्तमान में गोपाल चंद्र डाड का कार्यकाल भी सफल माना जा सकता है। नवागत जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह के द्वारा किये जा रहे औचक निरीक्षणों से लगने लगा है कि सालों बाद एक बार फिर प्रशासिनक मशीनरी में कसावट महसूस की जा सकती है।

सिवनी के नागरिकों को यह सोचना होगा कि आखिर क्या वजह है कि सिवनी में उद्योगपतियों के द्वारा उद्योग धंधे लगाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली जाती है। उद्योग कार्यालय के पास पूरे भूखण्ड रिक्त पड़े हैं पर कागजों में यहाँ उद्योग संचालित हो रहे हैं। जिले में अगर उद्योग नहीं आये तो युवाओं को रोजगार कहाँ से मिलेगा? अगर रोजगार नहीं मिला तो आज का युवा पथभ्रष्ट हो जायेगा। सिवनी में जुआ, सट्टा, क्रिकेट सट्टा सहित अन्य अपराधों में युवाओं की संलिप्तता को देखकर यही लगता है कि सिवनी में उद्योग धंधों के अभाव का सीधा असर युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है।

सिवनी में राजाधिराज इंड्रस्ट्रीज की डालडा फैक्ट्री, सिवनी केमिकल, क्रीसेंट एलायंस, सिवनी सोप, साबू केमिकल, उमा शंकर जायसवाल की देशी शराब आसवानी, हाथ करघा उद्योग आदि न जाने कितने उद्योग धंधे हुआ करते थे जो राजनैतिक संरक्षण के अभाव और सिवनी में आवागमन के साधनों के न होने के चलते एक के बाद एक बंद हो गये। आज सिवनी में एक भी बड़ा उद्योग चालू हालत में नहीं माना जा सकता है।

सिवनी जिले में युवाओं के लिये कोई भी सियासी दल फिकरमंद प्रतीत नहीं हो रहे हैं। सभी को चिंता है तो बस देश और प्रदेश की। देश-प्रदेश की चिंता करना अच्छी बात है किन्तु सिवनी जिले की चिंता भी की जानी चाहिये। सिवनी के नागरिक पूरी तरह अधिकारियों पर ही निर्भर नज़र आते हैं। अधिकारी आयेंगे और दो-तीन साल बाद चले भी जायेंगे। वे जब तक सिवनी की भौगोलिक स्थिति, आबोहवा को समझ पाते हैं तब तक उनका तबादला ही हो जाता है।

सिवनी में अधिकारी भी जिस तरह के नीतिगत फैसले लेते हैं उसमें सिवनी के निवासियों की उपेक्षा भी की जाना चिंता का का विषय इसलिये भी माना जा सकता है क्योंकि अधिकारी जो काम कर रहे हैं वह सिवनी जिले के निवासियों के लिये ही कर रहे हैं, पर इस मामले में वे सिवनी के निवासियों की कम से कम राय तो ले लें।

उम्मीद की जाना चाहिये कि ये सभी दलगत भावना से ऊपर उठकर आपसी नफा नुकसान को भूलकर सिवनी में कैसे विकास के पहिये लगाकर उद्योग धंधे स्थापित करते हुए युवाओं को ज्यादा से ज्यादा रोजगार के संसाधन मुहैया करवाये जायें, इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करने की कोशिश सांसद, विधायक करेंगे। यकीन मानिये सांसद-विधायकजी, विकास और रोजगार के साधनों के मामले में सिवनी जिले की जनता आपके साथ ही नज़र आयेगी और आपके कदमों का स्वागत होगा। बस आपको संकल्प लेने की आवश्यकता है और संकल्प लेने के लिये गणतंत्र दिवस माकूल अवसर दिख रहा है . . .!

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