परीक्षा में सफलता पाने बसंत पंचमीं पर करें सरस्वती का पूजन एवं मंत्र जाप

 

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। बसंत पंचमीं को अबूझ मुहूर्त रहता है अर्थात बिना पंचांग देखे ही कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ कर सकते हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार देवी सरस्वती इस दिन ब्रह्माजी के मानस से अवतीर्ण हुईं थीं इसलिये इस दिन सरस्वती जयंति मनायी जाती है। इस साल बसंत पंचमीं 30 जनवरी को मनायी जायेगी।

आचार्य रवि शंकर शास्त्री ने बसंत पंचमीं के संबंध में बताया कि इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक एवं अन्य सभी देवी सरस्वती का पूजन करें। गरीब विद्याथियों को पुस्तक, पेन, आदि विद्या उपयोगी वस्तु का दान करें। सरस्वती मंत्र का जाप करें। कई स्थानों पर सामूहिक सरस्वती पूजन के भी आयोजन होते हैं।

उन्होंने कहा कि ज्योतिष में पाँचवीं राशि के अधिष्ठाता भगवान सूर्य नारायण होते हैं। इसलिये बसंत पंचमीं अज्ञान का नाश करके प्रकाश की ओर ले जाती है। अतः सभी कार्य इस दिन शुभ होते हैं। यह दिन सुप्त शक्तियों के पुर्नजागरण का दिन होता है। बसंत पंचमीं के दिन अधिक विवाह होते हैं एवं इस दिन गृह प्रवेश, वाहन क्रय, भवन निर्माण प्रारंभ, विद्यारंभ ग्रहण करना, अनुबंध करना, आभूषण क्रय करना व अन्य कोई भी शुभ एवं माँगलिक कार्य सफल होते हैं।

माघ मास शुक्ल पक्ष बसंत पंचमीं की विशेषताएं बताते हुए आचार्य रवि शंकर शास्त्री ने कहा कि माघ माह इस महिने को भगवान विष्णु का स्वरूप बताया गया है। शुक्ल पक्ष होने के कारण इस समय चन्द्रमा अत्यंत प्रबल रहता है। प्रतिपदा तिथि से गुप्त नवरात्री का भी शुभारंभ माना जाता है सिद्धी, साधना, गुप्त साधना के लिये यह समय अत्यंत प्रसिद्ध है।

आचार्य रविशंकर शास्त्री ने बताया कि उत्तरायण सूर्य देवताओं का दिन माना जाता है इस समय सूर्य देव पृथ्वी के निकट रहते है। बसंत ऋतु समस्त ऋतुओं की राजा मानी जाती है, इसे ऋतुराज बसंत कहते हैं। यह सृष्टि का यौवनकाल होता है। इन्ही सब विशेषताओं के कारण ही इस मुहूर्त को विशेष फलदायी माना गया है।

सरस्वती देवी का पूजन विधान के संबंध में बताये हुए आचार्य रवि शंकर शास्त्री ने कहा कि बसंत पंचमीं के दिन पीले वस्त्र धारण करें एवं पूजन में पीले फूल फल और जो भी पूजन सामग्री है वह सभी पीले रंग की होने से कार्य में शीघ्र सफलता प्राप्त होती है। प्रातः काल से दोपहर 12 बजे तक का समय सरस्वती पूजन का विषेश समय माना जाता है। उन्होंने आगे बताया कि सर्वप्रथम विघ्न विनायक का पूजन कर भगवान श्रीहरि भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधाजी एवं शिक्षा की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। इस दिन पीले फूल, धूप, दीप नैवद्य आदि से पूजा करके पूजा में केसरिया भात व केसरिया हलवे का श्रद्धा पूर्वक भोग लगाकर स्वयं भी प्रसाद स्वरूप सेवन करने की परंपरा है।

 

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