वरना चुकानी पड़ेगी कीमत

 

जैसी की आशंका थी, ईरान ने जवाबी हमला किया। अमेरिका ने ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी की पिछले सप्ताह हत्या कर दी थी, प्रत्युत्तर में ईरान ने इराक में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर अनेक मिसाइलें दागीं। अमेरिका का कहना है, कोई नुकसान नहीं हुआ, जबकि ईरान का कहना है, उसने 80 अमेरिकियों को मारा है। आशा की जानी चाहिए कि ईरान के मिसाइल हमले के चाहे जो नतीजे रहे हों, अमेरिका को ईरानी विदेश मंत्री जावेद जारिफ के ट्वीट पर गौर करना चाहिए। ईरानी विदेश मंत्री ने कहा है कि ईरान युद्ध बढ़ाना नहीं चाहता है। साफ तौर पर इससे यह समझना चाहिए कि आगे अगर अमेरिका कोई जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा, तो ईरान भी कुछ नहीं करेगा। माहौल तब और संगीन हो गया, जब तेहरान के मुख्य एयरपोर्ट से उड़ा जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें 176 लोग मारे गए।

इराक में चले युद्ध को सामने रखकर भी सोचना चाहिए। अमेरिका की सैन्य शक्ति का वर्चस्व वहां भले ही दिखता हो, लेकिन यह भी सच है कि हर चीज का समाधान सैन्य ताकत से नहीं हो सकता। सैन्य आक्रामकता के रास्ते पर फिर नहीं चलना चाहिए। अमेरिकी आक्रामकता और सैन्य शक्ति पूरे मध्य-पूर्व के लिए त्रासद सिद्ध हुई हैं। अमेरिका को अपनी नीति के परिणाम देखने चाहिए। इराक में चली लड़ाई का ही परिणाम था, अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के समय यह मुद्दा उठा था कि हम अपने लड़कों को जीवित घर लाएंगे, बॉडी बैग में नहीं।

दोनों ही पक्षों को पता है कि अगर अब दुश्मनी की आग भड़की, तो उन्हें और पूरे क्षेत्र को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दोनों देशों को युद्ध के मुहाने पर किसने पहुंचाया है और दोनों देशों के बीच दुश्मनी कितनी गहरी हो चुकी है। अब हालात को हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए। तनाव के बढ़ने से ईरान जहां अपने घरेलू विरोधियों को अमेरिका विरोध के नाम पर एकजुट कर पाएगा, वहीं डोनाल्ड ट्रंप सैन्य कार्रवाई से अपने खिलाफ चल रहे महाभियोग से लोगों का ध्यान हटा पाएंगे। दोनों देशों को संयम बरतना चाहिए, जो हुआ, सो हुआ। (चाइना डेली, चीन से साभार)

(साई फीचर्स)

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