भारतीय दृष्टि से पूरे विश्व को बदलेगा संघ

 

(अवधेश कुमार)

21वीं सदी के इस तीसरे दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की आयु 100 साल हो जाएगी। दुनिया में ऐसा उदाहरण शायद ही होगा कि 100 वर्ष पहले बना संगठन बिना विभाजित हुए, आजादी के बाद तीन बार प्रतिबंध झेलने के बावजूद करीब 50 उप संगठनों के साथ न केवल भारत का सबसे बड़ा संगठन परिवार बना, बल्कि दुनिया के 80 से ज्यादा देशों में इसकी शाखा भी फैली। नागपुर के एक छोटे से मैदान से कुछ गिनती के लोगों के साथ जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की शाखा आरंभ की तो उस समय अगले 100 वर्ष या उससे आगे के लिए क्या सोच रही होगी, कहना कठिन है। लेकिन आज इसके विराट स्वरूप को देखकर लगता है कि डॉ. हेडगेवार का संकल्प कितना दृढ़ रहा होगा।

उनकी इस दृढ़ निष्ठा ने एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया। तभी तो 1940 में उनकी मृत्यु तक भारी संख्या में पढ़े-लिखे लोग संघ के लिए अपना पूरा जीवन लगा देने के संकल्प के साथ देश भर में प्रचारक के रूप में सक्रिय हो गए। संघ को संघ की दृष्टि से समझने का प्रयास करने पर लगता है कि जिस हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र को वह अपना लक्ष्य घोषित करता है वह सभ्यतामूलक है। हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र उसी मूल सोच का विस्तार है, जिसके आधार पर विश्व के सबसे प्राचीन राष्ट्र के रूप में भारत की अलग पहचान बनी। भारतीय समाज और राष्ट्र की मूल पहचान सर्वे भवंतु सुखिनः की रही है। जो सबके सुख के लिए अपने सुख को तिलांजलि दे सकता है। यस्तुसर्वाणि भूतानि, सर्वभूतेषु च आत्मनः ही हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र का मूल है। इसका अर्थ है- इस सृष्टि में जितने भी जीव-अजीव हैं, सबमें हम हैं और हममें सब हैं। यानी हम सब एक दूसरे में समाए हुए एक ही आत्मतत्व के अंग हैं। इसलिए किसी के बुरे की कामना वस्तुतः अपने ही लिए बुरे की कामना है।

हिंदुत्व की इस व्यापक सभ्यतागत अवधारणा पर आधारित संघ अपना लक्ष्य भारत को ऐसा ही हिंदू राष्ट्र बनाना बताता है, जो इस सभ्यता और संस्कृति का परावर्तन हो। इसका अर्थ है कि कोई किसी मजहब को मानता हो, किसी का रहन-सहन, वेश, भाषा, पूजा पद्धति कुछ भी हो, सब एक ही तत्व के अंग हैं। इसीलिए समाज के हर क्षेत्र में उसने संगठन खड़े किए। संघ ने आस्तिकों के साथ नास्तिकों को भी अंगीकार किया। उसके लिए सभी हिंदू हैं और इस हिंदू राष्ट्र के अंग हैं। राष्ट्र का अर्थ यहां उस जीवन दर्शन से है जिसे यहां के निवासियों ने जीवन शैली के रूप में अंगीकार किया है। इसका किसी भौगोलिक या राजनीतिक सीमा से लेना-देना नहीं। राष्ट्र मूलतः एक सांस्कृतिक अवधारणा है। पश्चिम से निकला नेशन स्टेट, यानी राष्ट्र-राज्य की अवधारणा और भारतीय सभ्यता में राष्ट्र की अवधारणा के बीच यह मूलभूत अंतर है। संघ कहता है कि दुर्भाग्य से हम पश्चिम की अवधारणा वाले राष्ट्र-राज्य के दृष्टिकोण से विचार करते हैं, इसलिए हिंदू राष्ट्र की हमारी कल्पना के बारे में विकृत धारणा बना लेते हैं। इसमें हिंदू राष्ट्रीयता का द्योतक हो जाता है, वह भी किसी भौगोलिक और राष्ट्रीय सीमा से परे।

संघ की विश्व दृष्टि इसी में निहित है। यह दृष्टि संपूर्ण विश्व के कल्याण के भाव से काम करने की है। माता भूमिः पुत्रोअहम् पृथिव्याः। पूरी पृथ्वी हमारी माता है और हम इसके संतान। संघ के वैचारिक अधिष्ठान का देश, काल, पात्र और परिस्थति के अनुसार संशोधन, परिवर्तन और विकास हुआ है लेकिन मूल अवधारणा यही है। जब संघ का जन्म हुआ तब भारत गुलाम था। दुनिया के अनेक देशों पर यूरोपीय देशों का राज था। जाहिर है, उसकी स्थापना की पृष्ठभूमि का पहला पड़ाव गुलामी से मुक्ति थी। संघ की प्रतिज्ञा में भारत माता को गुलामी से मुक्त कराने के लिए स्वयंसेवक बनने की बात थी। स्वतंत्रता के बाद यह भारत को परम वैभव पर पहुंचाने में परिवर्तित हो गई।

बहरहाल, आज दुनिया बदल चुकी है। उपनिवेशवाद का दौर खत्म हुआ, फिर भूमंडलीकरण ने नई चुनौतियां और समस्याएं खड़ी कीं। तकनीकी प्रगति ने विश्व के साथ भारतीय समाज को इतना बदल दिया है जिसकी कल्पना तक किसी ने नहीं थी। इस बदले हुए भारत और विश्व में हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को संघ कहां देखता है, इसे सरसंघचालक मोहन भागवत ने पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में स्पष्ट किया। संघ अपने मूल विचार यानी हिंदुत्व को सनातन मानता है, लेकिन यह भी कहता है कि हर जगह, हर समय, हर व्यक्ति पर वह एक ही प्रकार से स्वीकार्य और लागू नहीं हो सकता। संघ ने ऐसी कई चीजें स्वीकार की हैं, जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। उदाहरण के लिए समलैंगिता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करना। संघ के अतीत को देखें तो यह बहुत बड़ा परिवर्तन है।

संघ अगले 100 वर्षों में भारतीय या हिंदुत्व दृष्टि के अनुरूप विश्व को भोगवाद से संयम और वैरभाव से प्रेम की ओर ले जाकर सहकार और साझेदारी की विश्व व्यवस्था कायम करने की भूमिका निभाना चाहता है तो उसे पहले भारत को उसके अनुरूप बनाने के लिए परिश्रम करना होगा। विश्व सभ्यतागत संकट का शिकार है। इसमें बदलाव लाने की शक्ति हिंदू दर्शन में है। मोहन भागवत कहते हैं कि हर व्यक्ति के पास सब कुछ नहीं हो सकता लेकिन सबको मिला दें तो सभी के लिए बहुत कुछ हो सकता है। यह प्राचीन भारत के सहकारी जीवन दर्शन का नया स्वरूप है। जातिवाद, अस्पृश्यता, दहेज, लिंगभेद और राजनीतिक वैरभाव इसमें मुख्य बाधाएं हैं। संघ यह मानता है कि हिंदू सभ्यता में जातिभेद, लिंग या किसी स्तर पर असमानता का कोई स्थान नहीं। इसे व्यवहार में उतारने के लिए सामाजिक परिवर्तन का अभियान कैसे चले, इस पर विचार करना चाहिए।

(साई फीचर्स)

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