ट्रस्ट की घोषणा से केन्द्र ने की संविधान और आध्यात्म दोनों की उपेक्षा : प्रज्ञानानंद गिरी

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। अयोध्या की राम जन्म भूमि में मंदिर निर्माण के लिये केन्द्र सरकार ने जिस ट्रस्ट की घोषणा की है, उसमें संविधान और आध्यात्म दोनों की ही उपेक्षा की गयी है। वास्तविक धर्माचार्यों में से किसी को भी इस ट्रस्ट में शामिल नहीं किया गया है।

उक्ताशय की बात निरंजन पीठ के आचार्य महा मण्डलेश्वर स्वामी प्रज्ञानानंद गिरी महाराज के द्वारा कही जाकर केन्द्र सरकार द्वारा घोषित ट्रस्ट को अनुचित बताया गया है। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट में जिस वासुदेवानंद को शंकराचार्य के रूप में शामिल किया गया है वास्तव में वे शंकराचार्य तो छोड़ो संन्यासी भी नहीं हैं और यह बात निचली अदालत से लेकर उच्च अदालत द्वारा स्वीकार की जा चुकी है, इसके बाद भी केन्द्र सरकार उन्हें शंकराचार्य मान रही है, जो उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि शंकराचार्य हमारे धर्म में सर्वाेच्च पद है, उसके ऊपर फिर कोई नहीं होता। सरकार ने ट्रस्ट में उक्त कथित शंकराचार्य को ट्रस्ट अध्यक्ष के अधीन रखकर शंकराचार्य पद की गरिमा को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि ऐसा करके सरकार ने न केवल धर्म बल्कि धर्म नीति का अपमान ही किया है, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का भी उल्लंघन किया है, जो उचित नहीं है। इसके अलावा ट्रस्ट में शासकीय अधिकारी और कर्मचारियों को शामिल करना भी उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर की चर्चा जब भी चलती है तो लोगों के मन में यह बात आ जाती है कि इस मामले में सिर्फ राजनीति हो रही है, जबकि यह भी अनुचित है। लोगों के मन की इस धारणा को समाप्त करने के लिये आवश्यक है कि मंदिर का निर्माण हमारे सनातनी चार धर्मपीठों के आचार्यों और उनके अनुयायियों जो संत महात्मा हैं उनकी सक्रिय भूमिका और मार्गदर्शन में ही हो, ताकि उस मंदिर की पवित्रता के साथ वह विधि विधान से बन सके और लोगों की आस्था भी वहाँ स्थापित हो सके।

आचार्य महा मण्डलेश्वर ने कहा कि सरकार ने ट्रस्ट में न तो देश के सर्वमान्य शंकराचार्यों में से किसी को भी शामिल किया है और न ही उनके प्रतिनिधियों तथा देश के वैष्णवाचार्य अखाड़ों के प्रतिनिधि और अन्य धार्मिक प्रतिनिधि तथा 1990 के दशक से रजिस्टर्ड रामालय ट्रस्ट को भी इस सरकारी ट्रस्ट में स्थान नहीं दिया गया है, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। सरकार को चाहिये कि वह अपने घोषित ट्रस्ट पर पुर्नविचार करे।

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