महज ढाई सौ रूपये में बिका था मठ मंदिर

 

मठ मंदिर था दादू परिवार के स्वामित्व में

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। शिवरात्रि का त्यौहार आने को है। इसके चलते विभिन्न शिव मंदिरों में तैयारियों का सिलसिला जारी है। जिला मुख्यालय में स्थित प्राचीन मठ मंदिर न सिर्फ आस्था की दृष्टि से बल्कि ऐतिहासिक रुप से भी काफी महत्व रखता है। वर्तमान में मंदिर का जीर्णाेंद्धार का कार्य प्रगति पर है।

शहर का यह मठमंदिर काफी प्राचीन है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस मठ में स्थित शिवलिंग की पूजा आदि शंकराचार्य ने भी की थी। चारों पीठों के शंकराचार्य भ्रमण कर इस पवित्र भूमि को पावन कर चुके हैं। वर्तमान में जगदगुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती लगातार इस पीठ में भ्रमण करते रहे हैं।

मठ मंदिर के इतिहास को लेकर कोई विशिष्ट मत प्रचलित नहीं है। कल, आज और कल शीर्षक की पुस्तक में मठ मंदिर का निर्माण कलचुरी कालीन बताया जाता रहा है। सन 1180 के आसपास एक ओर चंदेल और दूसरी ओर मालवा के पवार तथा घर के भीतर गोंड शासकों ने उथल – पुथल मचा दी।

कलचुरी काल महाकौशल में 1000 से 1180 तक रहा है। कलचुरी शैव मत के अनुयायी थे। उन्होंने जबलपुर, नरसिंहपुर और बालाघाट में विशाल मठ स्थापित किये थे। उनके प्रत्येक लेख ऊँ नमः शिवाय से आरंभ होते थे। (राय बहादुर हीरा लाल, जबलपुर ज्योति पृष्ठ 20-21) इस बात से प्रतीत होता है कि यह मंदिर कलचुरियों की देन है।

कलचुरी के पतन के बाद गोंड शासकों ने गढ़ा मण्डला में अपना शासन स्थापित किया। 1480 में राजा संग्राम सिंह गद्दी पर बैठे। उनके शासन काल में 52 गढ़ थे। इन्ही गढ़ों में से जिले का एक गढ़ चांवड़ी का गढ़ वर्तमान में छपारा के नाम से जाना जाता है। ये राजा बड़ा देव याने शिव के भक्त थे।

इन्होंने भी कई मठ स्थापित किये, जहाँ भी इन्होंने मठ बनाये वहाँ तालाब, शिवलिंग और मठ के महंत अवश्य रुप से पाये जाते थे। सिवनी के मठ मंदिर को इसके लिये भी गौंड कालीन माना जाता है। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि मठ मंदिर के खर्च के लिये जिला मुख्यालय के पास का गाँव मरझोर माफीशुदा गाँव था। बताया जाता है कि मरझोर के मुकद्दम लक्ष्मी नारायण श्रीवास्तव के यहाँ आज भी दस्तावेज सुरक्षित हैं, जिनके अनुसार 1791 वास्ते खर्च मंदर के देहे राजा साहेब नागपुर (रघुजी दितीय) लिखा है।

अँग्रेजी शासन पद्धति में (मौजव कानून सात सन 1825ई. में बइलत इजराय डिगरी में मुंसिफी सिवनी छपारा) मालगुजारों ने मरझोर और मठ को 05 फरवरी 1857 को जप्त कर लिया था, जिसे मनके सिंगई सूखा साव वल्द खुशाल साव परवार सा सिवनी छपारा ने बगीचा, तालाब और कुर्वामय अहाता जमीन को 295 रूपये में खरीदा था। तीन अक्टूबर 1867 को निहंस गंगागिर चेला लक्ष्मन गिर ने 350 रूपये में खरीद लिया था।

1870 में इस संपत्ति को लेकर विवाद हुआ। 19 दिसंबर 1873 को महंत हरकेश गिर से लगा ग्राम मालगुजारी का ठेका लाला काली चरण वल्द बनवारी लाल को बेच दिया। महंत हरकेश गिर की मृत्यु के बाद महंत रुद्रगिर, महंत गियान गिर और नाबालिग चेला दरयाब गिर ने अपने कर्जे की मुक्ति के लिये शिवाला और भूमि को 300 रूपये में लाला काली चरण को बेच दिया था। 1915 से 1917 के बीच लाल बुखार के कारण कालीचरण और उनके पुत्र रामजीवन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नि बिरजा बाई ने सिवनी के जमींदार दादू साहब को बेच दिया।

 

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