क्या सिर्फ घोषणाओं में बदलेगा ग्रामीण भारत

 

(चौ. पुष्पेन्द्र सिंह) 

वर्ष 2020 के आम बजट में केंद्रीय वित्त मंत्री ने गांव, कृषि और किसानों के लिए 16 सूत्रीय योजनाओं की घोषणा की है। बजट में घोषणाएं तो बहुत होती हैं पर असल बात यह है कि जमीन पर क्या सामने आता है। वर्ष 2019-20 का कुल बजट लगभग 27.86 लाख करोड़ रुपये का था, पर संशोधित अनुमान के अनुसार केवल 26.98 लाख करोड़ रुपये ही जारी वित्त वर्ष में खर्च किए जाएंगे। लगभग नौ प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ वर्ष 2020-21 का कुल बजट लगभग 30.42 लाख करोड़ रुपये का है। 2019-20 में कृषि मंत्रालय का बजट 138,564 करोड़ रुपये था, मगर इसे संशोधित बजट में कम करके 109,750 करोड़ रुपये कर दिया गया। इसका मुख्य कारण यह रहा कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के तहत 75,000 करोड़ रुपये के बजट में से केवल 54,370 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। बताया गया है कि ऐसा पात्र किसानों का सत्यापन धीमी गति से होने के चलते हुआ।

अब तक इस योजना में कुल लक्षित लगभग 14.5 करोड़ किसानों में से केवल 9.5 करोड़ का ही पंजीकरण हो सका है। इनमें से सत्यापन अभी तक केवल 7.5 करोड़ किसानों का हो पाया है। प. बंगाल जैसे कुछ राज्यों ने राजनीतिक कारणों से अभी तक अपने एक भी किसान का पंजीकरण इस योजना में नहीं करवाया है, जो वहां के किसानों के साथ अन्याय है। खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए 2020-21 के बजट में इस योजना के अंतर्गत दी जाने वाली राशि को 6,000 रुपये से बढ़ाकर 24,000 रुपये प्रति किसान प्रति वर्ष किया जाता तो प्रत्येक किसान के खाते में हर महीने 2,000 रुपये जाते, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में तुरंत क्रय-शक्ति बढ़ती। अर्थव्यवस्था की गाड़ी को तेजी से आगे बढ़ाने में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती थी। भविष्य में इस योजना की राशि को एक सम्मानित स्तर पर लाकर हर साल महंगाई दर के सापेक्ष बढ़ाना चाहिए। लेकिन अफसोस कि सरकार ने इस महत्वपूर्ण योजना का बजट ज्यों का त्यों 75,000 करोड़ रुपये पर ही रोक रखा है। उम्मीद करें कि सरकार अगले वर्ष के लिए आवंटित यह सारी धनराशि खर्च करेगी।

पिछले साल घरेलू कंपनियों की आयकर दर 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत करने से सरकार पर लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ा था। सरकार को आशा थी कि आयकर कम करने से कंपनियां निवेश बढ़ाएंगी, पर ऐसा हुआ नहीं। मांग के अभाव में जब अधिकतर उद्योग अपनी क्षमता से कम उत्पादन कर रहे हों तो उनके द्वारा नए निवेश का सवाल ही नहीं उठता। ग्रामीण क्षेत्रों में पैसा उपलब्ध कराने से मांग बढ़ती तो औद्योगिक उत्पादन भी बढ़ता और नया निवेश भी आता। आशा है, सरकार बजट पारित करते समय इस बिंदु पर गौर अवश्य करेगी और पीएम-किसान योजना का बजट आवंटन बढ़ाएगी। 2020-21 के लिए कृषि मंत्रालय का बजट मामूली सा बढ़ाकर 142,762 करोड़ रुपये कर दिया गया है लेकिन बात तो तब है जब सरकार इस वर्ष इस बजट को पूरा खर्च कर ले जाए। इस वर्ष कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग का बजट 8,362 करोड़ रुपये है। इस जरूरी मद में हम लगातार बहुत कम खर्च कर रहे हैं।

ग्रामीण विकास मंत्रालय का बजट 122,398 करोड़ रुपये है। इसमें ग्रामीण रोजगार उपलब्ध कराने की मनरेगा योजना के लिए 61,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि इस योजना में इस वर्ष 71,000 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। मनरेगा में होने वाले अपव्यय को रोकने के लिए इसको खेती-किसानी से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि किसानों की कृषि-श्रम लागत कम हो और इस योजना के तहत गैर उत्पादक कार्यों में होने वाली धन की बर्बादी को रोका जा सके। इस मंत्रालय के अंतर्गत पीएम ग्राम सड़क योजना का बजट 19,500 करोड़ रुपये, जबकि प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का बजट भी 19,500 करोड़ रुपये ही प्रस्तावित है। ग्रामीण भारत के लिए ये दोनों योजनाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, इसलिए इनके बजट को बढ़ाने की आवश्यकता है।

रसायन और उर्वरक मंत्रालय द्वारा खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी को पिछले वर्ष के 80,035 करोड़ से घटाकर 71,345 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसके पीछे जीरो बजट खेती, जैविक खेती और परंपरागत कृषि को प्रोत्साहन देने की सोच है। यूरिया खाद पर अत्यधिक सब्सिडी के कारण इस खाद का जरूरत से ज्यादा प्रयोग हो रहा है जिससे जमीन और पर्यावरण दोनों का क्षरण हो रहा है। इस विषय में नीति निर्धारकों का विचार है कि आने वाले समय में खाद सब्सिडी को भी सीधे पीएम-किसान योजना की तरह किसानों के खातों में नकद प्रति एकड़ के हिसाब से भेजा जाए तो इस मद में भारी बचत होगी और खाद का अत्यधिक दुरुपयोग भी रोका जा सकेगा।

किसानों और ग्रामीण भारत से सरोकार रखने वाले कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, रसायन और उर्वरक मंत्रालय के उर्वरक विभाग तथा मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय का 2019-20 वित्त वर्ष का संयुक्त बजट लगभग 342,000 करोड़ रुपये था जो संपूर्ण बजट का लगभग 12 प्रतिशत था। इस वर्ष उपरोक्त मंत्रालयों का कुल बजट 340,600 करोड़ रुपये है जो संपूर्ण बजट का मात्र 11 प्रतिशत है। 2020-21 के संपूर्ण बजट में की गई बढ़ोतरी की तरह ग्रामीण भारत के बजट में भी यदि 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाती तो यह 371,000 करोड़ रुपये होता। सचाई यह है कि बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बावजूद ग्रामीण भारत के बजट में कटौती कर दी गई है। ग्रामीण भारत में बसने वाली 70 प्रतिशत आबादी के लिए केवल 11 प्रतिशत बजट कितना उपयुक्त है? इतनी कम धनराशि आवंटन से क्या सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर पाएगी, यह विचार का विषय है। (लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

(साई फीचर्स)