जब अंग्रेज अफसर को मजा चखाया ईश्वरचंद विद्यासागर ने

बात तब की है जब ईश्वर चंद विद्यासागर को कोलकाता के फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृति विभाग के मुख्य पंडित के पद के साथ-साथ प्राचार्य का भी पद सौंपा गया था। उन्हें जिला स्तर पर संस्कृत विद्यालय शुरू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसकी रूपरेखा भी उन्हें ही तैयार करनी थी। ड्राफ्ट तैयार कर जब वह प्रबंधन कार्यालय में पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर हैरान रह गए। जिस अंग्रेज अफसर से वह मिलने पहुंचे, वह टेबल पर अपने दोनों पैरों को रखकर सिगार का कश लगा रहा था। चारों तरफ धुआं फैला हुआ था।

उन्होंने कहा, आपके विचारार्थ इस रिपोर्ट को लाया था। उस अफसर पर कोई असर नहीं हुआ। वह अपनी धुन में कश पर कश लगाता रहा। उसने रिपोर्ट वहीं रख देने का इशारा किया। यह दृश्य विद्यासागर को अपमानित करने जैसा था। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। वह वहां से चुपचाप चले गए। कुछ दिन बाद वही अंग्रेज अफसर विद्यासागर से मिलने पहुंचा। विद्यासागर ने तैयारी कर रखी थी। वह भी टेबल पर अपने दोनों पैर रखकर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। उन्होंने भी ठीक उसी अंदाज में सीमित शब्दों में बात की और वह अपनी कुर्सी पर बैठे रहे।

अंग्रेज अफसर ने अपनी बेइज्जती महसूस की और पैर पटकते हुए वहां से चला गया। उसने प्रबंधन कमिटी में इसकी शिकायत कर दी। विद्यासागर को कमिटी ने बुलाया और स्पष्टीकरण मांगा गया। कमिटी ने पूछा, पंडित! क्या आपने मिस्टर कार्ल का अपमान किया है? विद्यासागर ने जवाब दिया, महाशय! वह तो मैंने उन्हीं से सीखा है। हमारे देश में तो अतिथि को देवता माना जाता है। अतिथि का स्वागत उसके पैर धोकर किया जाता है। लेकिन आपकी संस्कृति से अब हम यह सब सीख रहे हैं। आप लोगों को तो इस पर प्रसन्नता होनी चाहिए। समिति उस अंग्रेज अफसर की धृष्टता समझ चुकी थी।

(साई फीचर्स)

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