जानिये क्यों करते हैं घट स्थापना

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। चैत्र नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ अलग – अलग रूपरूपोंदृ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि की विधि – विधान से पूजा की जाती है। पूरे भारत में यह यह त्यौहार मनाया जाता है।

मराही माता स्थित कपीश्वर हनुमान मंदिर के मुख्य पुजारी उपेंद्र महाराज ने बताया कि नवरात्रि में माँ दुर्गा को खुश करने के लिये उनके नौ रूपों की पूजा – अर्चना और पाठ की जाती है। इस पाठ में देवी के नौ रूपों के अवतरित होने और उनके द्वारा दुष्टों के संहार का पूरा विवरण है।

कहते हैं नवरात्रि में माता का पाठ करने से देवी भगवती की खास कृपा होती है। एक वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ महीनों में कुल मिलाकर चार बार नवरात्र आते हैं, लेकिन हिन्दू, पंचांग के अनुसार नवरात्रि का त्यौहार वर्षभर में दो बार मनाया जाता है। चैत्र माह में आने वाली नवरात्रि को चैत्र नवरात्रि और शरद ऋतु में नवरात्रि को शारदेय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है।

हिन्दू पंचांग कैलेण्डर के अनुसार नये वर्ष के प्रारंभ से राम नवमीं तक इस पर्व को मनाया जाता है। इस त्यौहार को बसंत नवरात्र के नाम से भी जाना जाता है। चैत्र नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना होती है। इसके बाद प्रतिदिन देवी के नौ अलग – अलग स्वरूपों की पूजा होती है। घट स्थापना को कलश स्थापना भी कहते हैं।

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार किसी भी पूजा से पहले गणेश भगवान की आराधना करते हैं। कलश स्थापना से संबंधित हमारे पुराणों में एक मान्यता है, जिसमें कलश को भगवान विष्णु का रुप माना गया है। इसलिये लोग देवी की पूजा से पहले कलश का पूजन करते हैं। पूजा स्थान पर कलश की स्थापना करने से पहले उस जगह को गंगा जल से शुद्ध किया जाता है और फिर पूजा में सभी देवी – देवताओं को आमंत्रित किया जाता है।

कलश को पाँच तरह के पत्तों से सजाया जाता है और उसमें हल्दी की गांठ, सुपारी, दुर्वा रखी जाती है। कलश को स्थापित करने के लिये उसके नीचे बालू की वेदी बनायी जाती है और उसमें जौ बोये जाते हैं। जौ बोने की विधि धन-धान्य देने वाली देवी अन्नपूर्णा को खुश करने के लिये की जाती है।

देवी दुर्गा की मूर्ति को पूजा स्थल के बीचों बीच स्थापित करते है और देवी का श्रृंगार रोली, चावल, सिंदूर, माला, फूल, चुनरी, साड़ी, आभूषण और सुहाग से करते हैं। पूजा स्थल में एक अखण्ड दीप जलाया जाता है जिसे व्रत के आखिरी दिन तक जलाया जाना चाहिये। कलश स्थापना करने के बाद गणेश भगवान और माँ दुर्गा की आरती करते हैं जिसके बाद नौ दिनों का व्रत आरंभ हो जाता है।

श्रद्धा और मनवांछित फल की प्राप्ति के लिये बहुत से लोग पूरे नौ दिन तक उपवास भी रखते हैं। नवमीं के दिन नौ कन्याओं को जिन्हें माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों के समान माना जाता है, श्रद्धा से भोजन कराया जाता है और दक्षिणा आदि दी जाती है। देवी दुर्गा की पूजा गुप्त नवरात्रि में भी की जाती है, आषाढ़ और माघ माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले इस नवरात्र को गुप्त नवरात्रि कहते हैं।

(ये जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है.)

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