साधारण चेहरे वाले इंसान ने किया लोगों के दिलों पर राज

लिमटी की लालटेन 90

(लिमटी खरे)

कई मर्तबा किसी की उपस्थिति इतना आश्वस्त कर जाती है कि उसकी अनुपस्थिति की कल्पना भी हम नहीं कर पाते है। किसी को देखकर, सुनकर, उसके हाव भाव से ऐसा प्रतीत होता है मानो वह हमारे बीच का ही है, हमारे साथ घुला मिला हुआ है। हम चाहकर भी उसके अस्तित्व को पकड़ नहीं पाते हैं।

देह का नमक और आत्मा का सुकून दो चीजें हैं जो अनेक बातों की उपस्थिति के जरिए ही बनते हैं। इसमें संतुलन भी मौन रूप से शामिल रहता है। किसी की उपस्थिति इतनी स्वाभाविक हो जाती है कि इस बात का पता ही नहीं चल पाता कि वह हमारे बीच है। जब वह हमसे विलग होता है तभी हम कल्पना कर पाते हैं कि वह हमारे कितने करीब था।

इरफान खान जिनका पूरा नाम साहबजादे इरफान अली खान था के कलाकर्म और विलंबित सफलता ने अत्म विश्वास, संशय और दिगभ्रमों से भरी कलाकारी ने एक पीढ़ी को जरूरी मान्यताओं से हटकर भी कोई चीज होती है, इस पर विश्वास करना सिखाया है। वालीवुड के रूपहले पर्दे पर विरासत की चमक धमक, सुपर स्टार के प्रचलित मापदण्डों को चुनौति देने वाले इस महानायक ने अपनी दुनिया ही अलग बसा ली थी। वे कमोबेश हर भारतीय के दिलों पर राज करते रहे। इनकी अदाकारी को इनके अग्रज रहे नसीरूद्दीन शाह और ओम पुरी भी गर्व करते रहे होंगे। अभिनय में संवाद की अदायगी और शारीरिक भाषा (जो बिना कहे ही सब कुछ बयां कर जाती थी) के अनेक मुहावरों को इरफान खान के द्वारा गढ़ा गया। यही बात है जिसके लिए उन्हें शायद ही कभी भुलाया जा सके।

उनके अंदर जो सहजता थी, वह अभिनय के वैभव में चार चांद ही लगाती प्रतीत होती थी। असमय हुआ उनका निधन निश्चित तौर पर देश के मनोरंजन उद्योग एवं भारतीय समाज के लिए एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई शायद ही कभी हो पाए। उनके असमय ही चले जाने पर फिल्मी दुनिया में शोक की जो लहर उठी है वह उनके चाहने वालों को लंबे समय तक भिगोती रहेगी।

टीवी के धारावाहिक भारत एक खोज से उनका कला का पेशेवर जीवन आरंभ हुआ था। उनके अंदर कला के प्रति जो जुनून था वह देखते ही बनता था। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत ज्यादा सशक्त नहीं मानी जा सकती है। वे जयपुर से हठ कर निकले और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में वे अभियन की विभिन्न विधाओं में पारंगत हुए। छोटे पर्दे से अपने कलाकार जीवन का आगाज करने वाले इरफान ने अभिनय की बुलंदियों को जमकर स्पर्श किया।

इरफान खान की बाडी लेंग्वेज और विशेष रूप से उनकी आंखें बिना कहे ही सारी बातें बखान कर जाती थीं। उन्होंने यह बात भी स्थापित की है कि लोगों के दिलों पर राज करने के लिए चेहरा मोहरा, कद काठी ज्यादा मायने नहीं रखती है। इसके लिए चाकलेटी चेहरा या पहलवान जैसा शरीर होना जरूरी नहीं है।

2001 में बनी द वारियर्स से अंग्रेजी मीडियम तक का सफर यादगार ही रहेगा इरफान खान का। न जाने कितने तरह की भूमिकाओं को उन्होंने पर्दे पर जीवंत कर दिखाया। पान सिंह तोमर चलचित्र में उनकी अदायगी को सदा ही याद किया जाता रहेगा। उनकी अदाकारी की सहजता ही मानी जाएगी कि उनके द्वारा धड़ों में बटे हिंदी सिनेमाई जगत में विभिन्न पहलुओं का अंतर भी काफी हद तक मिटाने का प्रयास किया।

मकबूल, पीकू, हिंदी मीडियम, तलवार, लाईफ ऑफ पाई, द लंच बाक्स, अंग्रेजी मीडियम जैसी आधा सैकड़ा फिल्मों में उनके बेहतरीन अभिनय के लिए याद की जाती रहेंगी। वे हरफनमौला अदाकार थे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। अभिनय के लिए उन्हें अनेक पुरूस्कारों से भी नवाजा जा चुका है। यह उनके जाने की उम्र नहीं थी, फिर भी वे इस नश्वर देह को छोड़कर अपने प्रशंसकों को गमगीन कर दुनिया को अलविदा कह गए हैं। भारतीय सिनेमा ने एक बेहतरीन अदाकर खोया है तो दूसरी ओर देश ने एक सच्चा नागरिक भी खोया है। उनके निधन पर दुनिया भर में कलाप्रेमी स्तब्ध हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया उन्हें श्रृद्धांजली अर्पित करते हुए ईश्वर से कामना करती है कि ईश्वर उन्हें अपने चरणों में स्थान दें।

आप अपने घरों में रहें, घरों से बाहर न निकलें, सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरी को बरकरार रखें, शासन, प्रशासन के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए घर पर ही रहें।

(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

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