साऊथ एशिया से है सबक लेने की जरूरत

लिमटी की लालटेन 104

(लिमटी खरे)

लगभग एक अरब तीस करोड की आबादी वाले भारत में कोरोना कोविड 19 के संक्रमित मरीजों की तादाद बढ़ती जा रही है। यह आंकड़ा अब सवा लाख के करीब पहुंच रहा है। इसके साथ ही राहत की बात यह मानी जा सकती है कि सात दशकों की आजादी वाले सफर में संसाधन विकसित न कर पाने के बाद भी संसाधनों से जूझते भारत में इस बीमारी से होने वाली मौतों की तादाद विकसित देशों के मुकाबले बहुत ही कम मानी जा सकती है। हम यह सोचकर खुश जरूर हो सकते हैं कि देश में कोरोना से मरने वालों की तादाद कम है पर हमें वैश्विक परिदृश्य को भी देखने की महती जरूरत है क्योंकि दक्षिण एशियाई देश आज दुनिया भर के सामने मिसाल बना हुआ है।

देखा जाए तो दक्षिण एशियाई देश बेरोजगारी, गरीबी, साफ सफाई जैसी सुविधाओं के मामले में बहुत ही ज्यादा पिछड़े हुए हैं। इसके बाद भी इस तरह के देश इस बीमारी से होने वाली मौतों के मामले में बहुत बेहतर साबित हो रहे हैं। केस फेटिलिटी रेट अर्थात कुछ घातक दर या सीएफआर की अगर बात की जाए तो तो फ्रांस में यह 15.2 है, ब्रिटेन में 14.4 तो इटली में 14 और स्पेन में 11.9। दुनिया के चौधरी अमेरिका में सीएफआर ज्यादातर यूरोपीय देशों से कम है लेकिन वहां भी यह 6 फीसदी है। इनके मुकाबले भारत में यह 3.3 फीसदी है जबकि पाकिस्तान में 2.2 फीसदी, बांग्लादेश में 1.5 फीसदी और श्रीलंका में महज 01 फीसदी है।

ये सारे आंकड़े विभिन्न वेब साईट्स पर डले हुए हैं। लोगों का यह भी मानना है कि इन आंकड़ों में सच्चाई बहुत ही कम है। इसके अलावा एक मान्यता यह भी प्रचलित होती दिख रही है कि दक्षिण एश्यिाई देशों में युवाओं की जनसंख्या ज्यादा है वहीं यूरोपीय देशों में मौत के शिकार हुए लोगों में उमर दराज लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है।

इसके अलावा चिकित्सकों के बीच भी यह चर्चा चल रही है कि भारत सहित अनेक देशों में बचपन में ही बीसीजी सहित अनेक टीके लगाए जाने के बाद यहां के निवासियों के शरीर में रोक प्रतिरोधक क्षमता उन लोगों की अपेक्षा अधिक है जिन्हें इस तरह के टीके नहीं लगे हैं।

चिकित्सकों की मानें तो ज्यादातर पश्चिमी देशों में मलेरिया, टीबी जैसी बीमारियां नहीं हैं, इसलिए वहां इन बीमारियों के टीके नहीं लगाए जाते हैं। इसके अलावा बचपन से ही भारत सहित इस तरह के अनेक देशों में तरह तरह की बीमारियों, गंदगी, अनहाईजनिक वातावरण में रहते हुए शरीर अनेक तरह के विषाणुओं, जीवाणुओं से टकराने में सक्षम हो जाता है।

एक धारणा यह भी बनती दिख रही है कि भारत सहित इस तरह के देशों में ईबोला, स्वाईन फ्लू, कोरोना कोविड 19 जैसे वायरस से जूझने में यहां के लोगों का शरीर कम से कम उस तरह से अनजान तो नहीं है, जिस तरह से पश्चिमी देशों के निवासियों का शरीर अनुभव कर रहा होगा।

इस तरह की व्याख्याओं, परिभाषाओं आदि से इंटरनेट, सोशल मीडिया अटा पड़ा है। भारत में केंद्र सरकार और सूबाई सरकारों के द्वारा अपने अपने स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। टोटल लॉक डाऊन के तीन चरणों के बाद चौथा चरण जारी है। आने वाले दिनों में अब केंद्र सरकार की रणनीति क्या होगी, यह कहना फिलहाल मुश्किल ही है, पर देश के हुक्मरानों को अपनी तैयारियों को इस बात को ध्यान में रखते हुए करने की जरूरत है कि जब इसका स्वरूप देश में भयावहतम होगा तब हम इससे किस तरह निपटेंगे!

आप अपने घरों में रहें, घरों से बाहर न निकलें, सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरी को बरकरार रखें, शासन, प्रशासन के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए घर पर ही रहें।

(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

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