थमने का नाम ही नहीं ले रहीं प्राकृतिक आपदाएं!

लिमटी की लालटेन 108

(लिमटी खरे)

साल 2020 के आरंभ से ही लोग बुरी तरह हलाकान ही नजर आ रहे हैं। एक के बाद एक प्राकृतिक प्रकोप से लोग दो चार हो रहे हैं। पहले कोरोना कोविड 19 का कहर, फिर अम्फान की आफत और अब टिड्डी दलों के हमले ने लोगों को आफत में डाल रखा है। यह वाकई चिंताजनक और दुखद माना जा सकता है।

टिड्डी दल का यह हमला लगभग दो दशकों के बाद देश में हुआ है। देश के पांच राज्य टिड्डी दलों के हमले झेल रहे हैं। इन टिड्डी दलों के द्वारा सूरज की तपिश के बीच बची खुची फसलों को भी साफ कर दिया जा रहा है।

देश के अनेक इलाकों में ज्यादातर फसलें कट चुकी हैं। देश का अन्नदाता किसान को ही माना जाता है। आजीविकोपार्जन और परिवार पालने की जद्दोजहद के बीच अधिकांश किसान साल भर अपने खेतों में ही समय देते हैं। इसके साथ ही फल उत्पादक किसानों पर तो मानो टिड्डी दल का नजला ही टूट चुका है।

महाराष्ट्र में संतरा उत्पादकों पर मानो बन आई है। विदर्भ के लगभग एक दर्जन जिलों में अलर्ट जारी किया गया है। इसके अलावा पंजाब, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान में भी किसानों को लगातार ही चेतावनियां जारी की जा रही हैं। इन राज्यों की सरसों, सौंफ, जीरा, आलू, रतनजोत, गन्ना, आम आदि की फसलें इन टिड्डी दलों के निशाने पर ही हैं।

देखा जाए तो कोरोना कोविड 19 के संक्रमण के चलते भी टिड्डी दल को रोकने में नाकामी ही हाथ लगी है। ईरान और पाकिस्तार के रास्ते आने वाले इन टिड्डी दलों को अमूमन इनके हमलों के दौरान पंजाब और राजस्थान जैसे सूबों में ही रोक लिया जाता है, पर इस बार कोरोना के खिलाफ चल रही कवायद के चलते यहां की सरकारें इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई हैं।

देश के दो राज्यों के अलावा अन्य राज्यों के लोगों ने टिड्डी दल के इस तरह का हमला पहले शायद ही देखा हो, पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। टिड्डी दल के हमले की आशंकाएं पहले जताई गईं, किन्तु कोरोना से लड़ने में व्यस्त सरकारों ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और टिड्डी दल को एक मौका मिला और वे दूसरे राज्यों की ओर रूख कर गईं।

केंद्र सरकार भी इस मामले में काफी विलंब से ही सक्रिय हुई है। किसान अपने अपने संसाधनों से इससे जूझ रहे हैं। यह समस्या एक या दो अथवा सौ दो सौ किसानों के बस की नहीं है। इसका कारण यह है कि टिड्डी दल में करोड़ों की तादाद में सदस्य होते हैं।

एक बार फिर आपदा प्रबंधन की कलई पूरी तरह खुली है। चेतावनियों के बाद भी आपदा प्रबंधन हर बार की तरह इस बार भी असफल और असहाय ही साबित होता दिख रहा है। इस तरह की अपदाओं को अवसर बनाने की बात तो कही जाती है पर इस तरह के मामलो में सरकारों का रूख बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं दिखता।

एक अनुमान के अनुसार लगभग बीस से ज्यादा देश हर साल इन टिड्डियों के हमले से दो चार होते हैं। देखा जाए तो इस तरह के देशों को अपना एक संगठन बनाना चाहिए और इस संगठन में अमीर और गरीब देशों को बराबरी से हिस्सेदारी करना चाहिए चाहे वे अफ्रीका जैसे गरीब देश हों अथवा एशिया के कुछ देशों जैसे विकसित देश।

इसके लिए आवश्यक बात यह है कि टिड्डी दल को उनके प्रजनन वाले स्थल पर ही बांध कर रख दिया जाना चाहिए। माना जाता है कि टिड्डी दल के सदस्य रेगिस्तानी इलाकों और नमी वाले इलाकों में ही ज्यादा हाते हैं, इस लिहाज से उन देशों की ज्यादा जवाबदेही बनती है जहां इस तरह की परिस्थितियां हैं। यह भी कहा जा रहा है कि टिड्डी दल के सदस्यों की बहुत बड़ी फौज दक्षिण पश्चिमी पाकिस्तान और दक्षिण ईरान में तैयार हो रही है।

भारत सरकार को चाहिए कि इस मामले में वह आवश्यक पहल जरूर करे, अगर जरूरत पड़े तो इस मुहिम का नेतृत्व भी भारत करे और टिड्डी दल की नई पौध तैयार होने के पहले ही उन्हें उनके मूल स्थान पर ही जाकर करारा जवाब दिया जाए। उन्हें वहीं पर नष्ट कर दिया जाए जहां वे पल रहे हैं।

यह तभी संभव होगा जब भारत सरकार आगे कदम बढ़ाते हुए पाकिस्तान और ईरान की सरकारों को इसके लिए ठोस कार्ययोजना दे। इसके साथ ही आने वाले समय में अगर टिड्डी दल का हमला होता है तो इससे निपटने के लिए अभी से माकूल इंतजाम करने की जरूरत है।

आप अपने घरों में रहें, घरों से बाहर न निकलें, सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरी को बरकरार रखें, शासन, प्रशासन के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए घर पर ही रहें।

(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

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