मंडी से बाहर नए कृषि कारोबार की व्यवस्था में किसान को नहीं मिलेगा MSP का लाभ

नई दिल्ली (साई). मोदी सरकार ने पिछले सप्ताह कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधारों का एलान करते हुए किसानों को उचित मूल्य दिलाने के लिए एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेस ऑर्डिनेंस को लागू कर दिया. किसान संगठन इन दिनों इसकी बारीकियां समझने में जुटे हुए हैं. देश के 62 किसान संगठनों की संस्था राष्ट्रीय किसान महासंघ ने कहा है कि इस अध्यादेश का अध्ययन करने पर पता चल रहा है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली व्यवस्था से धीरे-धीरे बाहर निकलना चाहती है.

महासंघ के संस्थापक सदस्य और कृषि मामलों के जानकार विनोद आनंद कहते हैं कि सरकार ने कृषि उपज मंडी समिति यानी मंडी से बाहर भी कृषि कारोबार का रास्ता खोल दिया है.मंडी के अंदर लाइसेंसी ट्रेडर किसान से उसकी उपज तय एमएसपी पर लेते हैं. लेकिन बाहर कारोबार करने वालों के लिए एमएसपी को बेंच मार्क नहीं बनाया गया है.

किसान को एक तय एग्रीमेंट के तहत दाम मिलेगा. मंडी से बाहर किसान के खेत में, घर पर या फिर कहीं और खरीद करने वाले व्यक्ति या संस्था चाहे तो मंडी के दाम या एमएसपी को अपना बेंचमार्क मान सकता है. उसके लिए इसे मानना जरूरी नहीं किया गया है.मतलब साफ है कि किसान की उपज खरीदने के लिए जो नई व्यव्स्था मंडी परिसर से बाहर लागू की गई है उसमें एमएसपी कोई मानक नहीं है. वहां रेट को बाजार के हवाले कर दिया गया है. आनंद का कहना है कि कम से कम यहां पर एमएसपी जितना दाम देना अनिवार्य कर दिया जाए. ताकि मंडी से बाहर के ट्रेड एरिया में भी किसान का हित सुरक्षित रहे.

सवाल है कि मंडियां बचेंगी तभी तो किसान उसमें एमएसपी पर अपनी उपज बेच पाएगा. मंडियों को खत्म करने की बात सरकार ने कहीं पर भी नहीं की है.

कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने बृहस्पतिवार को एक ट्विट करके लिखा है-वन कंट्री टू मार्केट, मंडियों के अंदर टैक्स का भुगतान होगा और मंडियों के बाहर कोई कर नहीं लगेगा.वो ऐसा लिख रहे हैं क्योंकि अभी मंडी से बाहर जिस एग्रीकल्चर ट्रेड की सरकार ने व्यवस्था कायम की है उसमें कारोबारी को कोई टैक्स नहीं देना होगा. जबकि मंडी के अंदर औसतन 6-7 फीसदी तक का मंडी टैक्स लगता है.

ऐसे में यह तर्क दिया जा रहा है कि व्यापारी अपना 6 फीसदी का नुकसान न करके बाहर खरीद करेगा. जहां उसे कोई टैक्स नहीं देना है. तो इस फैसले से मंडी व्यवस्था हतोत्साहित होगी. मंडी समिति कमजोर होंगी तो किसान धीरे-धीर बिल्कुल बाजार के हवाले चला जाएगा. जहां उसकी उपज का सरकार द्वारा तय रेट से अधिक भी मिल सकता है और कम भी.

पूर्व सांसद एवं वयोवृद्ध किसान नेता भूपिंदर सिंह मान भी कुछ इसी तरह की बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि मंडी वाले व्यापारी ही धीरे-धीरे बाहर व्यापार करेंगे. मुझे लगता है कि मंडी सिस्टम भविष्य में कोलैप्स कर जाएगा. क्योंकि बाहर टैक्स नहीं है. फिर यही व्यापारी बाहर अपना एकाधिकार स्थापित कर सकते हैं. पूरे रिफार्म को देखकर यही लगता है कि हाथी के खाने के दांत कुछ और हैं और दिखाने के कुछ और.

हालांकि, जाने-माने कृषि वैज्ञानिक पद्मभूषण प्रो. राम बदन सिंह कहते हैं कि सुधारों से किसानों को फायदा मिलेगा या नुकसान, इसका परिणाम जानने के लिए अभी हम सभी को इंतजार करना चाहिए.

इस बारे में सरकारी पक्ष के लिए डबलिंग फार्मर्स इनकम (DFI) कमेटी के अध्यक्ष डॉ. अशोक दलवई कहते हैं कि यह कुछ लोगों का भ्रम है कि एमएसपी की व्यवस्था खत्म हो जाएगी. ऐसा कुछ नहीं होने वाला है. सरकार एमएसपी पर उपज खरीदती है और उसे खरीदती रहेगी.

वैसे किसान अपनी फसल को बाजार किसी भी भाव पर बेचने की लिए स्वतंत्र है. लेकिन अगर कोई खरीदार नहीं मिला तो सरकार एक न्यूनतम मूल्य पर उसे खरीदती है. किसान को जहां भी उसकी फसल का सही रेट मिलेगा वहां पर उसे बेचेगा. उसे मंडी से अच्छा रेट बाहर मिलेगा तो वो बाहर बेचेगा और मंडी में अच्छा रेट मिलेगा तो मंडी में बेचेगा.

डॉ. दलवई ने कहा, कुछ लोगों का कहना है कि एपीएमसी यानी मंडी को खत्म किया जा रहा है. तो मैं स्पष्ट कर दूं कि एपीएमसी खत्म नहीं किया जा रहा, बल्कि किसान हित के लिए उसमें संशोधन किया गया है.

इस अध्यादेश के बारे में कृषि मंत्रालय का जो बयान आया है उसके मुताबिक किसान प्रत्यक्ष रूप से मार्केटिंग से जुड़ सकेंगे, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और उन्हें अपनी फसल का बेहतर मूल्य मिलेगा. किसानों को पर्याप्त सुरक्षा दी गई है

राष्ट्रीय किसान आयोग के प्रथम अध्यक्ष रहे सोमपाल शास्त्री के मुताबिक शांता कुमार समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि महज 6 फीसदी किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है. देश में सिर्फ 1.6 फीसदी बड़े किसान हैं. बाकी लोग लघु एवं सीमांत में आते हैं. उनमें से ज्यादातर के पास सरप्लस अनाज नहीं होता इसलिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था का लाभ नहीं मिल रहा. मुश्किल से गेहूं और धान के भी एक तिहाई भाग की ही खरीद एमएसपी पर हो पाती है. उधर, केंद्र सरकार का दावा है कि लॉकडाउन के दौरान सरकार ने एमएसपी पर उपज खरीदने के लिए 74,300 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इस वक्त 26 फसलों की उपज का एमएसपी तय है.

किसान अपनी फसल को बाजार किसी भी भाव पर बेचने की लिए स्वतंत्र है. लेकिन अगर कोई खरीदार नहीं मिला तो सरकार एक न्यूनतम मूल्य पर उसे खरीदती है. इससे नीचे उस फसल का दाम कभी नहीं गिर सकता. यानी किसानों को उनकी उपज का ठीक मूल्य दिलाने के लिए एमएसपी की घोषणा करती है. सरकार कमीशन फॉर एग्रीकल्‍चर कॉस्ट एंड प्राइज (CACP) की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय करती है.

फसल लागत नि‍कालने के तीन फार्मूले हैं

ए-2: कि‍सान की ओर से किया गया सभी तरह का भुगतान चाहे वो कैश में हो या कि‍सी वस्‍तु की शक्‍ल में, बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई का खर्च जोड़ा जाता है.

ए2+एफएल: इसमें ए2 के अलावा परि‍वार के सदस्‍यों द्वारा खेती में की गई मेहतन का मेहनताना भी जोड़ा जाता है.

सी-2: लागत जानने का यह फार्मूला किसानों के लिए सबसे अच्छा माना जाता है. इसमें उस जमीन की कीमत (इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कॉस्‍ट) भी जोड़ी जाती है जिसमें फसल उगाई गई. इसमें जमीन का कि‍राया व जमीन तथा खेतीबाड़ी के काम में लगी स्‍थाई पूंजी पर ब्‍याज को भी शामि‍ल कि‍या जाता है. इसमें कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है. यह लागत ए2+एफएल के ऊपर होती है