Coronavirus महामारी के बीच आए 44 हैंड सैनिटाइजर में मिला कैंसर पैदा करने वाला केमिकल

(ब्‍यूरो कार्यालय)
नई दिल्‍ली (साई)। कोरोना वायरस की महामारी के दौरान हैंड सैनिटाइजर्स की मांग बढ़ गई। इस दौरान कई नए सैनिटाइजर भी मार्केट में आ गए। अब एक नए अनैलेसिस में में पाया गया है कि इनमें कैंसर पैदा करने वाले केमिकल कार्सिनोजेन (carcinogen) पाए जाते हैं। कनेटिकेट की ऑनलाइन फार्मेसी वैलिश्योर का कहना है कि उसे कई ब्रैंड्स के सैनिटाइजर्स में बेंजीन मिली है। इसे ऐस्बेटॉस जितना खतरनाक माना जाता है और कई कंपनियों के उत्पाद में अमेरिकी FDA को आठ गुना ज्यादा मात्रा मिली।

वैलिश्योर ने FDA को लिखे खत में कहा है, ‘SARS-CoV-2 वायरस को फैलने से रोकने के लिए बच्चों और बड़ों के इस्तेमाल किए जाने उत्पादों में कार्सिनोजेन बेंजीन का मिलना चिंताजनक है।’ बेंजीन एक तरल केमिकल होता है जो आमतौर पर बेरंग होता है लेकिन सामान्य तापमान पर हल्के पीले रंग का हो जाता है। यह ज्वालामुखियों और जंगल की आग में निकलती है लेकिन डिटर्जेंट, डाई, लूब्रिकेंट और रबर में पाई जाती है।

कई ब्रैंड्स में मिली बेंजीन
ज्यादा बेंजीन से शरीर में रेड ब्लड सेल्स पर्याप्त मात्रा में पैदा नहीं होते हैं और वाइट ब्लड सेल्स को नुकसान से इम्यून सिस्टम कमजोर होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की इंटरनैशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने बेंजीन को कैंसर पैदा करने वाला केमिकल बताया है। FDA ने लिक्विड हैंड सैनिटाइजर्स में दो पार्ट पर मिलियन की इजाजत दे रखी है लेकिन स्प्रेज में ऐसा रिकमेंडशन नहीं है। वैलिश्योर ने 168 ब्रैंड्स की 260 बोतलों का अनैलेसिस किया। इनमें से 17% में बेंजीन की मात्रा मिली।

जो नया ‘डबल म्‍यूटंट’ वैरिएंट है, वो करीब 15-20% सैम्‍पल्‍स में मिला है। यह पहले से कैटलॉग किए गए वैरिएंट्स से मैच नहीं करता। इसे महाराष्‍ट्र के 206 सैम्‍पल्‍स में पाया गया जबकि दिल्‍ली के नौ सैम्‍पल्‍स में। सिंह के मुताबिक, नागपुर में करीब 20% सैम्‍पल इसी वैरिएंट के हैं। हालांकि उन्‍होंने कहा कि इस 20% को मामलों से जोड़कर देखना संभव नहीं है।

किसी भी वायरस का एक जेनेटिक कोड होता है। इसे एक तरह का मैनुअल समझें जो वायरस को बताता है कि उसे क्‍या और कैसे करता है। वायरस के जेनेटिक कोड में लगातार छोटे-छोटे बदलाव होते रहते हैं। अधिकतर बेअसर होते हैं मगर कुछ की वजह से वायरस तेजी से फैलने लगता है या घातक हो जाता है। बदले हुए वायरस को वैरिएंट कहते हैं। जैसे यूके और साउथ अफ्रीका वाले वैरिएंट को ज्‍यादा संक्रामक और घातक माना जा रहा है।

आसान भाषा में कहें तो ‘डबल म्‍यूटेशन’ तब होता है जब वायरस के दो म्‍यूटेटेड स्‍ट्रेन्‍स मिलकर एक तीसरा स्‍ट्रेन बनाते हैं।भारत में जो ‘डबल म्‍यूटंट’ वैरिएंट है वो E484Q और L452R म्‍यूटेशंस का कॉम्बिनेशन है। E484Q और L452R को अलग से वायरस को और संक्रामक व कुछ हद तक वैक्‍सीन से इम्‍युन पाया गया है।वायरस में बदलाव आते रहते हैं मगर अधिकतर की वजह से ज्‍यादा परेशानी नहीं होती। लेकिन कुछ म्‍यूटेशंस के चलते वायरस ज्‍यादा संक्रामक या घातक हो सकता है।डबल म्‍यूटेशन की वजह से वायरस के भीतर इम्‍युन रेस्‍पांस से बचने की क्षमता आ जाती है यानी ऐंटीबॉडीज उसका कुछ नहीं बिगाड़ पातीं।एक बड़ा रिस्‍क ये है कि पहले से बने टीकों का वैरिएंट पर असर होगा या नहीं, यह नहीं पता होता।

अभी तक यही पता लगा है कि नया स्‍ट्रेन असरदार तो है मगर शायद सुपरस्‍प्रेडर नहीं है। घातक है, इसके भी सबूत अबतक नहीं मिले हैं। वैज्ञानिक और डेटा मिलने के बाद कुछ स्‍पष्‍ट करने की बात कह रहे हैं। जहां तक वैक्‍सीन के इस नए वैरिएंट पर असर की बात है तो अभी तक ऐसी कोई वजह नहीं मिली है जिससे ये माना जाए कि टीके इनसे सुरक्षा देने में नाकामयाब होंगे।

ऑनलाइन फार्मेसी के टेस्ट रिजल्ट्स को येल यूनिवर्सिटी की केमिकल बायोफिजिकल इंस्ट्रुमेंटेशन सेंटर ऐंड बॉस्टन अनैलिटिक्स ने वेरिफाई किया है। वैलिश्योर का मानना है कि बेंजीन ऐल्कोहॉल प्यूरिफिकेशन के दौरान सैनिटाइजर में आ गई होगी लेकिन पैकेजिंग से पहले इसे निकालना होता है। वैलिश्योर ने FDA से अपील की है कि इन सभी उत्पादों को वापस बुलाया जाए और अनैलेसिस किया जाए। हैंड सैनिटाइजर्स में बेंजीन की मात्रा को सीमित करने की भी अपील की गई है।