महज 250 रुपये में बिका था भगवान शिव का यह ऐतिहासिक मंदिर!

(संजीव प्रताप सिंह)
सिवनी (साई)। आज श्रावण मास का पहला सोमवार है। जिला मुख्यालय में स्थित प्राचीन मठ मंदिर न सिर्फ आस्था की दृष्टि से बल्कि ऐतिहासिक रुप से भी काफी महत्व रखता है। इस मंदिर के निर्माण के बारे में कई आस्थाएं प्रचलित हैं।
कुछ लोग इसे कलचुरी काल का मानते हैं तो कई लोग इसे गोंड शासकों से जोड़ते हैं तो वहीं कुछ का कहना है कि मठ मंदिर का निर्माण आदि शंकराचार्य के द्वारा किया गया था तो इस मत के मानने वालों की संख्या भी कम नहीं है जो कहते हैं कि मंदिर शंकराचार्य से भी प्राचीन है। वर्तमान में मंदिर का जीर्णाेद्धार का कार्य प्रगति पर है।
आदि शंकराचार्य ने की थी पूजा : यह मठ मंदिर काफी प्राचीन है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस मठ में स्थित शिवलिंग की पूजा आदि शंकराचार्य ने भी की थी। चारों पीठों के शंकराचार्य भ्रमण कर इस पवित्र भूमि को पावन कर चुके हैं। वर्तमान में जगतगुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती लगातार इस पीठ में भ्रमण करते रहे हैं।
इतिहास को लेकर हैं मतभेद : मठ मंदिर के इतिहास को लेकर कोई विशिष्ठ मत प्रचलित नहीं है। कल आज और कल शीर्षक की पुस्तक में मठ मंदिर का निर्माण कलचुरी कालीन बताया जाता रहा है। सन 1180 के आसपास एक ओर चंदेल और दूसरी ओर मालवा के पवार तथा घर के भीतर गोंड शासकों ने उथल पुथल मचा दी।
कलचुरी काल महाकौशल में 1000 से 1180 तक रहा है। कलचुरी शैव मत के अनुयायी थे। उन्होंने जबलपुर, नरसिंहपुर और बालाघाट में विशाल मठ स्थापित किये थे। उनके प्रत्येक लेख ऊँ नमरू शिवाय से आरंभ होते थे। (राय बहादुर हीरालाल – जबलपुर ज्योति पृष्ठ 20-21) इस बात से प्रतीत होता है कि यह मंदिर कलचुरियों की देन है।
गोंड शासकों की भी संभावना रू कलचुरी के पतन के बाद गोंड शासकों ने गढ़ा मण्डला में अपना शासन स्थापित किया। 1480 में राजा संग्राम सिंह गद्दी पर बैठे। उनके शासन काल में 52 गढ़ थे। इन्ही गढ़ों में से जिले का एक गढ़ चांवड़ी का गढ़ वर्तमान में छपारा के नाम से जाना जाता है। ये राजा बड़ा देव यानि शिव के भक्त थे। इन्होंने भी कई मठ स्थापित किये।
इन्होंने जहाँ भी मठ बनाये वहाँ तालाब, शिवलिंग और मठ का महंत आवश्यक रुप से पाये जाते थे। सिवनी के मठ मंदिर को इसके लिये भी गोंड कालीन माना जाता है। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि मठ मंदिर के खर्च के लिये जिला मुख्यालय के पास का गाँव मरझोर माफीशुदा गाँव था।
मरझोर के मुकद्दम लक्ष्मी नारायण श्रीवास्तव के यहाँ आज भी दस्तावेज सुरक्षित हैं, जिनके अनुसार 1791 वास्ते खर्च मंदर के देहे राजा साहेब नागपुर (रघुजी द्वितीय) लिखा है। 295 रुपये में खरीदा था मंदिर रू अँग्रेजी शासन पद्धति में (मौजव कानून सात सन 1825ई. में बइलत इजरायडिगरी में मुंसिफी सिवनी छपारा) मालगुजारों ने मरझोर और मठ को 05 फरवरी 1857 को जप्त कर लिया था, जिसे मनके सिंगई सूखा साव वल्द खुशाल साव परवार सा जिवनी छपारा ने बगीचा, तालाब और कुर्वामय अहाता जमीन को 295 रुपये में खरीदा था।
03 अक्टूबर 1867 को निहंस गंगागिर चेला लक्ष्मन गिर ने 350 रुपये में खरीद लिया था। 1870 में इस संपत्ति को लेकर विवाद हुआ। 19 दिसंबर 1873 को महंत हरकेश गिर से लगा ग्राम मालगुजारी का ठेका लाला कालीचरण वल्द बनवारी लाल को बेच दिया। महंत हरकेश गिर की मृत्यु के बाद महंत रुदरगिर, महंत गियान गिर और नाबालिग चेला दरयाब गिर ने अपने कर्जे की मुक्ति के लिये शिवाला और भूमि को 300 रुपये में लाला कालीचरण को बेच दिया था। 1915 से 1917 के बीच लाल बुखार के कारण कालीचरण और उनके पुत्र रामजीवन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नि बिरजा बाई ने सिवनी के जमींदार दादू साहब को बेच दिया।
जीवित समाधि का उल्लेख : वर्ष 2002 में गुरू रत्नेश्वर दिघौरी की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान प्रकाशित मैग्जीन में बताया गया है कि इस मठ में जीवित समाधि भी है, जो अन्य किसी दादू साहब के परिवार से ही थे, जिनके द्वारा शिवलिंग सिर पर रखकर समाधि ले ली गयी।
30 वर्ष पूर्व जलायी गयी थी धूनी : मठ मंदिर परिसर में सिद्ध धूनी का वर्णन भी मिलता है, जो अज्ञात कारणों से बुझ गयी थी। इस धुनी को लगभग 30 वर्ष पूर्व दिवंगत नगर पालिका अध्यक्ष स्व.मूलचंद दुबे द्वारा पुनरू प्रज्ज्वलित करवा दिया गया था।
मोती तालाब है मठ तालाब : इस मठ से लगा हुआ वबहुआ नामक एक तालाब भी है, जिसे मोती तालाब के नाम से जाना जाता था। बाद में यह मठ मंदिर के समीप होने के बाद मठ तालाब के रूप में चर्चित हो गया।