विश्व में भगवान कृष्ण जी का राधा मदन मोहन मंदिर करौली में

जहां केवल कार्तिक मास में होती है मंगला आरती

(ब्यूरो कार्यालय)
करौली (साई)। औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मूल मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए वृंदावन से करौली राजस्थान में स्थानांतरित कर दिया गया.धर्म के साथ हमारे भारत देश में ऐसे कई मंदिर स्थापित हैं, जो अपने आप में बहुत ही प्राचीन हैं। ऐसे ही भगवान कृष्ण के अनेक मंदिर विख्यात है और उन्हीं में से आज हम बताएंगे एक ऐसे मंदिर के बारे में, जो वृंदावन की धरती पर सबसे पहले स्थापित हुआ था।

वैसे तो वृंदावन धाम में बहुत सारे प्राचीन मंदिर हैं, लेकिन हम बात करेंगे राधा मदन मोहन मंदिर के बारे में।श्री मदन मोहन मंदिर वृंदावन का सबसे पुराना मंदिर है। औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मूल मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए राजस्थान में स्थानांतरित कर दिया गया था और एक प्रतिकृति रखी गई थी, ये मंदिर सनातन गोस्वामी जी के आशीर्वाद से श्रीकृष्ण दास कपूर ने बनाई थी और जिसमें गोस्वामी जी के मदन मोहन के विग्रह को स्थापित किया गया था।
श्रीकृष्ण दास कपूर नामित एक धनी व्यापारी था और व्यापार के लिए मथुरा आए थे। मथुरा आते समय उसकी नाव यमुना में एक रेत मे फंस गई और फिर उसको कुछ समझ नहीं आ रह था कि वह उसे बाहर कैसे निकाले। उसी वक़्त एक छोटा बच्चा उनके पास आया और कहा यंहा ऊचें टीले पर एक बहुत सिद्ध महापुरुष एक भगवान का भक्त रहता है। उनका नाम श्री सनातन गोस्वामी है। उनके पास जाए वो आपकी मदद जरूर करेंगे बस इतना कहना था और वो व्यापारी उनके पास पहुंच गया। साधु का आशीर्वाद लेने के लिए, कृष्ण दास कपूर उनके आश्रम में आए और सनातन गोस्वामी मिल गए।
सनातन गोस्वामी का शरीर बहुत तपस्या के अभ्यास से बहुत पतला हो गया था कृष्ण दास ने अपने दंडवत्ओं की पेशकश की और सनातन गोस्वामी ने बदले में उसे बैठने के लिए एक घास की चटाई की पेशकश की।
कृष्ण दास ने अपने हाथ से चटाई को छुआ और जमीन पर बैठे। उन्होंने गोस्वामी से जी से कहा की, “बाबा, कृपया मुझपे कृपा कर दे।”
सनातन ने उत्तर दिया, “मैं एक भगवन का दास हूं। मैं आप पर दया कैसे करूं?”मैं बस आपके आशीर्वाद चाहता हूं। मेरी नाव यमुना में रेत में फंस गई है, और हम इसे नहीं निकल पा रहे ।”मैं इन सभी मामलों के बारे में पूरी तरह से अनजान हूं आप इसके बारे में मदन गोपाला से बात कर सकते हैं।” उनसे कहिए वो आपकी जरूर सुनेंगे
कृष्ण दास ने मदन मोहनजी को अपने दंडवत्ओं की पेशकश की और उनसे बात की, “हे मदन गोपाल देवा! अगर आपकी दया से मेरी नाव मुक्त हो जाती है, तो इसके माल की बिक्री से जो लाभ होता है, मैं इस गोस्वामी को दे आपकी सेवा में समर्पित कर दूंगा।”इस तरह से प्रार्थना करते हुए, कपूर सेठ ने सनातन गोस्वामी से आज्ञा ले ली। उस वक़्त दोपहर का समय था। अचानक बारिश वो भी इतनी मूसलधार बारिश हुई कि नाव बहुत आसानी से रेत की पट्टी से अलग हो गई और वो मथुरा के लिए निकल गए।कृष्ण दास समझ गए कि यह भगवान मदन गोपाला देव की दया से हुआ है उनके सामान बहुत ही अच्छे लाभ से बेचे गए थे और इस पैसे के साथ उन्होंने एक मंदिर और रसोईघर का निर्माण किया और श्री मदन गोपाल की पूजा के शाही निष्पादन के लिए सभी आवश्यक व्यवस्था की। इस व्यवस्था को देखकर, सनातन गोस्वामी बहुत खुश हुए और कुछ अवधि के बाद कृष्ण दास कपूर को उनके शिष्य के रूप में स्वीकार किया।सनातन गोस्वामी की आज्ञा से उन्होंने मंदिर का निर्माण किया और सनातन गोस्वामी जी के मदन गोपाल के उस विग्रह को श्री मदन मोहन मंदिर में स्थापित कर दिया। इस विग्रह को करौली राजस्थान में ले गया सुरक्षा की कमी के कारण मदनमोहन जी की मूल मूर्ति अब करौली में है। इस मंदिर की खास बात ये भी है कि यहां मंगला आरती केवल कार्तिक के महीने में ही होती है।