हमे खुद में खुद ढूंढना होगा . . .

सागर नदी आकाश
सूरज चाँद सितारे
फूल जँगल पेड़
अन्न औऱ फल
हवा पानी जमीन
आदि सब तो है
ईश्वर के प्रतीक
ये बात सब जानते है
फिर भी भटक रहे है
ये भटकाने की अदा
भी उसी का खेल है
जान लो
क्यो की उसको
पकड़ पाना
इतना आसान नही
ये जो पकड़ पाने का
दम्भ लिये झूठे सच्चे
दिख रहे है इनसे
जरा बच के
क्योकि जो उसको सच मे
पा लेता है
उसके पास इतना वक्त नही होता
जो तुम्हे उसके सपने
दिखाता फिरे
ये भी सब जानते है
फिर भी भटकते रहते है
चुकी ये भी उसकी अदा है
सबके सामने होते हुए भी
सबके सामने न आने की
वजह भी सब जानते है
कि जो खुद के भीतर है
उसे खुद ढूंढना होगा
हा, हमे खुद में खुद ढूंढना होगा . . .

अनिल शर्मा, सिवनी